!! एक अद्भुत काव्य – “प्रेम पत्तनम्” !!
( प्रेमनगर 29 – “नगर में अनादर ही आदर है”)
गतांक से आगे –
यत्रानादर एवादर: ।
अर्थ – यहाँ ( प्रेम नगर में ) अनादर ही आदर माना गया है ।
यही रीत है , यही प्रीत है । इस प्रेम नगर में “आप” कहना ही “पाप” है ।
हे रसिकों ! हमारी बृजभाषा प्रेम की भाषा है इसमें “तू” शब्द का ही ज़्यादा प्रयोग है ….मैया को भी “तू” और बाबा को भी “तू”……हाँ, कोई ऐसा आगया “बाहर” का ….तो उसको ज़्यादा ज़्यादा “तुम” बोल दिया जाएगा ….”आप” तो हमारे बृजभाषा के शब्दकोश में ही नही है ।
जहां प्रेम होता है …जहां प्रेम सिक्त हृदय होता है …वहाँ “आप” कहाँ !
जहां प्रेम झरता है ….वहाँ तो “तू” ही प्रकट होता है ।
ये जो आपको बताया जा रहा है …ये प्रेम की विचित्रता हैं ।
आदर नही होता यहाँ …अनादर को ही इस नगर में आदर कहा गया है ।
“तेरे” कारण ही आज मेरी ये दशा हुई है । ये बात प्रेमी कहते रहते हैं ।
दूर के जन को “आप” कहा जाता है ….किन्तु जो हृदय में बसा है उसको “तू”कहना ही …इस प्रेम नगर में “आप” कहना है ।
अब आप प्रेम की विचित्रता का दर्शन करें ।
प्रगाढ़ प्रेम में – “आप आगये” …ये कहना अनादर है …..प्रेम से सिक्त प्रेमी अगर , प्रेमी के आने पर उठता है तो यह उसका अनादर है ….आदर वो है …जब आपके मुख से ….”तू आगया” ….ये निकले …तो ये आदर है । उसे भी अच्छा लगेगा । प्रेम में डूबे अपने प्रेमी के आने पर बैठा रहे …तो ये आदर है । “दो दिन हो गये, तू अब आया है” ये कहकर लड़े प्रेमी से तो ये आदर है ….और “नाथ ! आपने अच्छा किया कि दो दिन से नही मिले ….हाँ , क्यों मिलना ! आपने ठीक ही किया” …हे रसिकों ! अब तो आप समझ ही गये होंगे ….कि ये तो महाअनादर है …आदर नही है । उफ़ ! विचित्र है यहाँ कि रीत तो ।
हट्ट ! हे मधुप ! तू जा यहाँ से ।
श्रीराधारानी उस भ्रमर को उड़ा रही हैं । किन्तु भ्रमर है कि बारम्बार श्रीराधा के चरणों को छू रहा है …इस झाँकी को लता में से छुप कर उद्धव देख रहे हैं ….ये प्रथम भेंट थी उद्धव की श्रीजी से । वो उनकी बातें सुनने लगे …वो जानना चाहते हैं कि इनमें ऐसी क्या बात है ….जो हमारे पूर्णब्रह्म श्रीकृष्ण इनके लिए रोते रहते हैं ।
हट्ट ! हट्ट ! मुझे मत छू …..मेरा स्पर्श मत कर जा तू यहाँ से । क्यों आया है रे ! जा ।
श्रीराधारानी चिल्ला रही हैं ..उनकी वो मीठी रोषपूर्ण बोली वनों में गूंज रही है, उद्धव सुन रहे हैं ।
तू उसी काले का यार है ना ? श्रीराधा बोलीं । हाँ मैं जानती हूँ …उसी ने तुझे भेजा है मेरे पास ….है ना ? हे मधुप ! मैं तुझे देखते ही पहचान गयी ….तू काला वो भी काला , तू कपटी वो भी कपटी …..उद्धव चौंक गयें ….ये क्या कह रही हैं ? अपने नाथ को कोई स्त्री ऐसा कहेगी क्या ? किन्तु उद्धव क्या जानें ….ये प्रेम नगर की भाषा ही ऐसी है ।
कुछ देर तक श्रीराधारानी उस भ्रमर को भगाती रहीं …..किन्तु जब नही माना …तो बोलीं …बिल्कुल अपने यार में गया है ….वो भी बात बात में मेरे पाँव पकड़ता था और तू भी …ओह ! अब समझी….ये उपाय उसी ने बताकर तुझे भेजा होगा , है ना ? किन्तु अब हम सब समझ गयीं हैं …अब नही आने वाली तेरी बातों में …..हट्ट ! हट्ट छू मत मुझे ।
उद्धव चकित होकर देख रहे हैं …..वो श्रीकृष्ण चन्द्र हैं …भूपति तो उनकी स्तुति करते ही हैं ….किन्तु देव लोग भी तो उन्हीं के प्रार्थना में लगे रहते हैं ….कौन है ऐसा सज्जन पुरुष त्रिभुवन में जो इन श्रीकृष्ण की स्तुति न करता हो ! किन्तु ये श्रीराधा ? इनकी बोली तो देखो …कैसे “रे” (तू) कहकर बोल रही हैं । पर उद्धव को क्या पता यही इस नगर का आदर है ।
अब आगे और सुना उद्धव ने ।
कपटी है ? कैसे ? ललिता सखी ने पूछा ।
श्रीराधारानी तुरन्त बोलीं …और क्या इस जन्म का ही कपटी नही ..जन्म जन्म का कपटी है …इसकी सारी लीलाएँ , हर अवतार की लीलाओं को देख लो , बस कपट ही कपट तो भरा है ।
उद्धव कान लगाकर सुन रहे हैं …….
अरे ! देखो रामावतार की लीलाएँ ! कपट से भरा हुआ है । बेचारे बाली को छुप कर वाण मारा ….क्यों ? अरे ! सामने आकर मारते ….नही …आदत ही है ना कपट की …कहाँ जाएगी । श्रीराधारानी बोल रही हैं । फिर एकाएक हंसने लग जाती हैं …..बेचारी सूर्पणखा आयी थी इसके पास ….क्या गलत कह रही थी …अरे ! प्रेम का प्रस्ताव ही तो लेकर आयी थी …..यही तो कह रही थी मैं विवाह करना चाहती हूँ । अरे ! मना कर देते …उसे भगा देते ….किन्तु उसकी सुन्दरता ही नष्ट कर दी …..नाक कान काट दिये ….हे भगवान !
ये कहते हुए श्रीराधारानी आश्चर्य से अपना मुँह हाथ से छुपा लेती हैं ।
किन्तु ये भ्रमर तो विचित्र है …..
गुन गुन ही करता जा रहा है ….बस गुन गुन ।
ओह ! अब मैं समझी ये हमें उस कपटी की कथा सुनाकर प्रसन्न करना चाहता है ….श्रीराधारानी हंसती हैं …..हमें क्या सुनाएगा भ्रमर ! हमने उसकी लीलाओं को देखा है …बड़े निकट से देखा है ….इसलिए हमें मत सुना ….सुनाना है तो मथुरा की उन नारियों को सुना ….वो कुछ नही जानतीं उस कपटी के विषय में । हम तो सब जानती हैं । इसलिए तू यहाँ से जा ! और मथुरा की नारियों की चाटुकारिता कर । इतने पर भी वो भ्रमर नही माना …और गुनगुन करता ही रहा तो श्रीराधा फिर बोलीं ….हे मधुप ! कहा ना , उसकी बातें मत सुना ! श्रीराधारानी कुछ देर के लिए मौन हो गयीं …फिर बोलीं – हाँ , उस कपटी की बातों में मादकता तो भरपूर है ……मादक तो है वो ….उसकी चर्चा की एक बूँद भी कोई पी ले ….तो बस …वो तो गया …संसार उसका छूट गया ….पत्नी रो रही है …मत जाओ ….बच्चे बिलख रहे हैं …पिता जी ! हमें छोड़कर मत जाओ ….किन्तु वो किसी की सुनता है क्या भला ? वो तो निकल जाता है ….उसी कपटी कृष्ण के लिए वो सब कुछ छोड़ देता ….हे मधुप ! ये मात्र एक बूँद कृष्ण कथा का प्रभाव है …..अब श्रीराधारानी अपनी ठसक में आजाती हैं …और कहती हैं ….एक बूँद कृष्ण कथा का ये प्रभाव है …तो विचार करो …जिसने घड़ा का घड़ा पीया हो …उसको कितनी आग लग रही होगी …उसकी क्या दशा होगी ! श्रीराधारानी कहती हैं ..हमारी क्या दशा हो रही होगी मधुप !
हमें तो उस कपटी ने बर्बाद ही कर दिया ।
उद्धव ये सब सुनकर स्तब्ध हैं …..कि इनकी ये भाषा ! अनादर पूर्ण भाषा !
किन्तु हे वृहस्पति शिष्य !
ये प्रेम नगर है ….यहाँ यही भाषा चलती है । अनादर ही यहाँ का आदर है ।
इस पथ का उद्देश्य नही है , शान्ति भवन में टिक रहना ।
किन्तु पहुँचना उस सीमा पर , जिसके आगे राह नही ।।
अब शेष आगे कल –


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