!! एक अद्भुत काव्य – “प्रेम पत्तनम्” !!
( प्रेम नगर 30 – “और जहाँ असन्तोष ही सन्तोष है” )
गतांक से आगे –
यत्रासन्तोष एव सन्तोष : ।।
अर्थ – जहाँ ( प्रेम नगर में ) असन्तोष ही सन्तोष है ।
*”हे रसिकों ! प्रेम की उल्टी रीत” इसे ही कहते हैं ….अधर्म ही जहाँ धर्म माना जाता हो , असत्य ही जहाँ सत्य माना जाता हो , अनाचार ही जहाँ आचार माना जाता हो , अनादर को ही जहां आदर का स्थान प्राप्त हो और असन्तोष को सन्तोष, ये प्रेम नगर में ही सम्भव है और कहीं नही ।
अच्छा , प्रेम में अगर सन्तोष हो जाये …तो क्या उसे आप प्रेम कहोगे ? नही , प्रेम में तो सन्तोष है ही नही , असन्तोष के कारण ही प्रेम आगे बढ़ता बढ़ता जाता है ।
प्रीतम मुखचन्द्र को निहारते रहने पर भी क्या तृप्ति मिलती है ?
“अरब रात मिलवे को निसिदिन , मिले रहत मानौं कबहुँ मिले नाँ”
ये युगलचन्द्र दिन रात मिले ही रहते हैं ….कब से मिले हैं ? तो हमारे रसिक जन कहते हैं ….अरब रात….यानि कोई गिनती ही नही है …अनन्तकाल से …मिल ही रहे हैं …फिर भी इनमें अतृप्ति इतनी है कि ….लगता है कि मिले ही नही हैं । उनको देखने में अतृप्ति , उनको सुनने में अतृप्ति ।
भागवत में लिखा है ….भगवान की कथा भक्त को ऐसे सुननी चाहिए …जैसे कोई कामुक व्यक्ति स्त्री की चर्चा को पूरे मन से सुनता है फिर भी तृप्त नही होता । । ये अतृप्ति आवश्यक है इस प्रेम नगर में ।
अच्छा , तेने “उसको” देखा क्या ? अपनी सखी से पूछ रही है कोई प्रेयसी ।
हाँ देखा , सखी के मुख से ये सुनते ही उनका रोम रोम पुलकित हो उठा ….अच्छा ! उसने भी तुझे देखा क्या ? हाँ , उसने भी देखा …..ओह ! कैसा लग रहा था वो ? ये तीसरा प्रश्न । अच्छा , अच्छा लग रहा था । तुझे देखकर मुस्कुराया ? हाँ , मुस्कुराया । कैसे मुस्कुराया ? अब ये क्या प्रश्न हुआ सखी ने झुँझलाकर कहा । नही , मैं ये पूछ रही हूँ कि पहचान के मुस्कुराया या ? हाँ , पहचान के ही मुस्कुराया । उसकी मुस्कुराहट में मैं थी ? मतलब ? सखी ने प्रतिप्रश्न किया ।
नही , संकेत होता है ना ! कि वो कैसी है ? ओह ये तो उसकी सखी है ….ऐसा कोई भाव ?
लम्बी साँस लेकर उसकी सखी बोली …..हाँ , ऐसा ही कुछ । नही बता ना ! उसकी मुस्कुराहट में क्या था ? अच्छा , कैसे मुस्कुरा रहा था ?
अब पूरी रात ऐसे ही प्रश्नों में बीत जायेगी ….किन्तु क्या उस प्रेयसी को इससे सन्तोष मिलेगा ? नही जी ! और और असन्तोष बढ़ेगा ही । ये प्रेम है ही ऐसा ।
हे रसिकों ! ये असन्तोष रहेगा ……ये नही रहा जिस दिन उस दिन प्रेम ही नही रहेगा ।
भागवत के आरम्भ में ही ….प्रथम स्कन्ध के प्रथम अध्याय में ही ….जब शौनक ऋषि सूत जी ने छ प्रश्न करते हैं ….और बड़े उत्साह से प्रश्न करते हैं ….प्रश्न को स्पष्ट भी करते हैं ….किन्तु बाद में अपने हृदय की बात ऋषि बता देते हैं …..और बड़े प्रेम से बताते हैं …..वो कहते हैं ….मुझे आपका उत्तर नही चाहिए …..आप क्या उत्तर देंगे वो भी मुझे पता है …..सूत जी मुस्कुराते हुए कहते हैं …फिर क्यों पूछ रहे हो ? तब ऋषि शौनक कहते हैं …”प्यारे श्रीकृष्ण की कथा सुनने के लिए” …..ये कहते हुए उनके नेत्र सजल हो उठते हैं ।
कथा भी तो सुनी होगी पहले ? ये बात जब सूत जी अपने श्रोता शौनक जी से पूछते हैं …..तब कुछ देर के लिए ऋषि शौनक मौन हो जाते हैं …उन्हें रोमांच हो उठता है ….कुछ देर के लिए श्रीकृष्ण उनकी दृष्टि के सामने प्रकट हो जाते हैं …..तब बोलते हैं ऋषि शौनक ……
वयं तु न वितृप्याम उत्तम श्लोक विक्रमे ।
यच्छृण्वन्तां रसज्ञानां स्वादु स्वादु पदे पदे ।।
मुझे तृप्ति नही मिल रही है , हे सूत जी ! मैंने कितनी बार उन श्रीकृष्ण की कथा सुन ली है ..फिर भी आज मुझे असन्तोष है । इसका कारण जानते हो ? इसका कारण है श्रीकृष्ण कथा में मात्र रस ही रस है । और रस उसे कहते हैं जिससे कभी तृप्ति न मिले । इसलिए मुझे श्रीकृष्ण की चर्चा ने सदैव असंतोषी ही बना रखा है …हे सूत जी ! मैं क्या करूँ ?
“मुझे सन्तोष नही है”……व्यास देव ने अपने गुरु देवर्षि नारद जी से भी कहा ।
हंसते हैं नारद जी ….कहते हैं …..असन्तोष तुम्हें ही नही है यहाँ सब ही असंतोषी हैं । बस इसी असन्तोष की गहराई में जाओ हे व्यासदेव ! नारद जी प्रेमनगर का मार्ग दिखाने लगे थे ।
देखो , अपने असन्तोष की गहराई नापों हे व्यास देव ! …..जाओ , उतरो गहरे …..तुम जितने गहरे जाओगे तुम्हें काला गहरा गड्डा मिलेगा …डर लगेगा पहले, किन्तु असन्तोष को जानना आवश्यक है । नारद जी पता नही क्या पहेली बुझा रहे थे । हाँ , उसमें तुम्हें अनुभव होगा की असन्तोष तब तक बना रहेगा जब तक अपने आप से न मिल लो ….अपने आप से मिलने की तड़फ है ये और कुछ नही । तो क्या अपने आपसे मिलने पर ये असन्तोष समाप्त हो जाएगा ? व्यासदेव ने प्रश्न किया । नहीं व्यासदेव ! नही ! असन्तोष तो कभी समाप्त होगा ही नही …किन्तु धीरे धीरे तुम समझने लगोगे कि इस “सृष्टि लीला” के मूल में तो ब्रह्म का असन्तोष ही है । तभी तो वो लीला कर रहा है ….अपने असन्तोष को मिटाने के लिए ….वो भी असन्तोष से ग्रस्त है …तभी तो वो कभी यशोदा का लाल बनकर ऊखल से बंध जाता है …तो कभी माया मृग के पीछे धनुष वाण लेकर दौड़ पड़ता है ….फिर अपनी ही आदिशक्ति के विरह में रोता हुआ घूमता है । फिर वही कभी शबरी के जूठे बेर खाता है तो कभी गोपियों की मटकी फोड़ कर भाग जाता है । ये सब क्या है ? नारद जी व्यासदेव को समझाते हैं ….ब्रह्म असन्तोष के कारण ही लीला करता है …उसे अपने आप से मिलना है ….फिर वो श्रीराधा को प्रकट करता है …जो उसी की आह्लाद है ..फिर उससे मिलता है …बिछुड़ता है ..लीला करना – ये सब असन्तोष के कारण है ..इस बात को समझो ।
तुम असन्तोष से ग्रस्त हो तो कोई बड़ी बात नही …उसका उपयोग करो …प्रेम नगर में यही असन्तोष चलता है …इसी के कारण प्रेम की तरंगे उठती और चंचल होती रहती हैं ।
हे रसिकों ! व्यासदेव को यही तो समझाया था ना नारद जी ने ।
सब को असन्तोष है इस प्रेमनगरी में …प्रीतम की चर्चा हो रही है …और वही बात …एक ही बात है …पर उसी को सुन रहे हैं …बारम्बार सुन रहे हैं …देख रहे हैं किन्तु असन्तोष बना ही हुआ है …उसी को देखना है …अरे देख तो लिया कितना और देखोगे ? ना , सन्तोष करना ही नही है ….सन्तोष होगा ही नही ….अजी प्रेम में कहाँ सन्तोष ?
तुम्हें देखूँ , तुम्हें सोचूँ , तुम्हें पाऊँ तुम्हें मानूँ ।
तुम्हारे सिवा मेरा कोई मुद्दा नही है ।
अब शेष कल –


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