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August 30, 2025 12:33 pm

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महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (020) : Niru Ashra

महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (020) : Niru Ashra

महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (020)


(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )

रास की दिव्यता का ध्यान

अरे बाबा! यह जो संसार का दुःख है, वासना है, जो विक्षेप है, जो अनाचार है, उससे बचाने की जो दवा है, वासना है, जो विक्षेप है, जो अनाचार है, उससे बचाने की जो दवा है, चिकित्सा है, उससे काहे को बचते हो? कहो- कि दुकान तो व्यवहार है। हम कहते हैं भक्ति भी व्यवहार है। इसमें क्या बात है- जैसे शारीरिक व्यवहार होता है वैसे मानसिक व्यवहार होता है। सौदे का हिसाब-किताब करने में तुम्हारे मन को कुछ परिश्रम नहीं पड़ता है और भगवान का भजन करने में परिश्रम पड़ता है।

धाम का चिन्तन ! यह धाम क्या है? कि साक्षात् सच्चिदानन्दघन है। यह पञ्चभूत का बना नहीं है, प्रकृति का बना नहीं है, माया का बना नहीं है- ये सब तो वेदान्त की प्रक्रिया है, प्रक्रिया माने तरकीब है, युक्ति है, बात समझाने के लिए बिलकुल सच्चिदानन्दघन है धाम, सच्चिदानन्दघ है रूप, सच्चिदानन्दघन है चेष्टा और लीला। लीला में शिशुलीला, कुमारलीला, किशोरलीला। शिशुलीला होती है घर में, कुमारलीला होती है गोष्ठ में, वन में और किशोरलीला होती और निकुञ्ज में। यह इसका विवेक है। लीला का दर्शन होने में भी जरा अपने को उसमें मिलाओ तो सेवा होगी। क्या सेवा? ये देखो- भगवान के कपोल पर हम कस्तीरी से, गोरोचन से, केशर से बेलबूटा बना रहे हैं, चन्दन से भगवान के कपोल पर बेलबूटा बना रहे हैं, उनके सिर पर चंदन लगा रहे हैं, उनके बाल सँवार रहे हैं, उनको माला पहना रहे हैं, उनको भोजन करा रहे हैं। यह क्या हुआ? यह सेवा हो गयी।

कई लोगों को धाम का दर्शन होता है रूप का नहीं, कई लोगों को रूप का नहीं, कई लोगों को रूप का दर्शन होता है चेष्टा का नहीं, कई लोगों को चेष्टा का दर्शन होता है लीला का नहीं, कई लोगों को लीला का दर्शन होता है, सेवा का नहीं, और कई लोग लीला भी देखते हैं और सेवा भी करते हैं, पर वह सेवा लेने में अनन्त कोटि ब्रह्माण्डाधिपति होने पर भी हमारे हाथ का ग्रास लेते हैं। इस सेवा में- भगवान का जो वात्सल्य है, जो कारुण्य है, उस गुण का पता उनको नहीं चलता है- ‘मुख्यं तु तस्य कारुण्यम्।’

तो कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण, नाम लेकर भगवान को पुकारो। वे आवें, उनसे कहो- हे प्रभो! अपना धाम साथ लेकर आओ। हमारे हृदय में वृन्दावन का प्रकाश हो, हमारे नेत्रों में वृन्दावन का दर्शन हो। उसमें फिर भगवान के रूप, लीला, सेवा, गुण और नाम का आविर्भाव हो, भगवान में ममता बढ़े, संबंध बढ़े।*

भक्ति माने बाहरी चीज नहीं है। पाँव में नुपूर बाँध लेने से भक्ति नहीं होती भाई! केवल जोर से चिल्ला लेने से भक्ति नहीं होती। भक्ति का भाव है और इसमें जो ध्यान है, वह ऐसे है जैसे माँ अपने बच्चे का ध्यान करती है, जैसे मित्र अपने मित्र का ध्यान करता है, जैसे पत्नी अपने पति का ध्यान करती है। भक्त लोग पत्नी का दृष्टान्त ज्यादा नहीं देते हैं, प्रेयसी का दृष्टान्त देते हैं- जैसे प्रेयसी अपने प्रिय का ध्यान करती है।

परव्यसनिनी नारी सक्ताऽपि गृहकर्मणि ।
तदेवास्यादयत्यन्त: परसंगरसायनम् ।।

विद्यारण्य स्वामी ने कहा- कि ध्यान दुर्लभ का ज्यादा होता है और सुलभ का कम। पत्नी के लिए पति सुलभ होता है; परंतु प्रेयसी के लिए प्रिय दुर्लभ होता है। अतः दृष्टान्त प्रेयसी द्वारा प्रिय का जैसा प्रगाढ़ ध्यान किया जाता है उसका दिया जाता है। देखो जो पैसा आपकी तिजोरी में बंद हो जाता है या बैंक के खाते में जमा हो जाता है, उसको रोज-रोज सम्हालने की जरूरत नहीं रहती है लेकिन जो पैसा रोज आता है उसको सम्हालने की जरूरत पड़ती है। तो भगवान को भी सम्भालने के लिए जैसे- प्रेयसी अपने प्रियतम को नित्य निरन्तर सम्हालती है वैसे सम्हालने की आवश्यकता पड़ती है यह जान-बूझकर दृष्टान्त दिया गया है-

प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा मनोरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम् ।

तो अब चलो, यह वृन्दावन धाम है। यह ब्रह्मात्मक है- ‘यद्गत्वा न निर्वतन्ते तद्धाम परमं मम।’ वृन्दावन में भगवान ने क्या देखा? तो पहले काल का वर्णन है- ‘ता- रात्रीर्वीक्ष्य’ मैंने तीन विभाग सुनाया आपको- ‘ताः गोपीर्वीक्ष्य, ताः रात्रीर्वीक्ष्य’ और ‘ताः शरदोत्फुल्ल मल्लिकाः वीक्ष्य’। वीक्ष्य का भी दो भाव है- देखा भगवान ने; और रमण का संकल्प उठा। तो पहले ऐश्वर्य की बात सुनाता हूँ, पीछे माधुर्य की। किन्हीं का ऐश्वर्य में दिल ज्यादा नहीं खुलता। इसीलिए यहाँ गोपियों को रात्रि कहा गया है। रात्रि माने देनेवाली- ‘रा’ दाने; और रात्री अर्थात् रमयित्री है। इसलिए गोपियों को रात्री कहा गया है। प्रेम में दो बात होना अनिवार्य है- एक तो अपने प्रियतम से अतिरिक्त सब कुछ का त्याग और दूसरे जो अपने पास रस है उसका अपने प्रियतम को देना।**

रस अपनी ओर खींचने से अहंकार से दूषित हो जाता है और रस परमात्मा की ओर कर देने से अहंकार का जो कलुष है, कल्मष है, वह उसमें से छूट जाता है। दुनियाँ में मैंने देखा है- प्रेम में असफल कौन हुआ? लोगों का गृहस्थ जीवन देखा है। कौन पत्नी प्रेम में असफल हुई, दुःखी कौन हुई? जिसने आजीवन अपने पति पर अपनी इच्छा चलाने का आग्रह जोड़ा। तो जीवन में परमात्मा की इच्छा के अनुसार चलना, कि परमात्मा को अपनी इच्छा के अनुसार चलाना? भक्ति पर रहस्य है इसमें, शरणागति का रहस्य है, प्रेम का रहस्य है इसमें। प्रेम का यह रहस्य है कि अहंकार का कलुष उसमें न हो। उसके लिए क्या करें? उसके लिए सब कुछ छोड़ सको, यह तैयारी होनी जरूरी है, छोड़ना जरूरी है। ‘रात्री’ शब्द में ये दोनों बातें ध्वनित होती है। गोपियाँ कृष्ण के सिवाय और सबके त्याग के लिए तत्पर हैं। यह तत्पर शब्द जो है न, यही तैयार है- ‘प’ का ‘य’ किसी लेखक के प्रमादवश हो गया है। तैयारी, तात्पर्य-तत्परता। और दूसरे गोपियों के रस का आस्वादन अपने लिए नहीं, उनके लिए है। गोपियों के प्रेम की विशेषता यही है।

एक दिन अर्जुन से कृष्ण से पूछा- श्रीकृष्ण, तुम ‘गोपी-गोपी’ पुकारते रहते हो, क्या हमलोग तुम्हारे कुछ नहीं होते, कुछ नहीं लगते? अरे बाबा! हम भी तुमसे प्रेम करते हैं। श्रीकृष्ण बोले- करते तो हो अर्जुन, लेकिन तुम्हारे प्रेम में और गोपी के प्रेम में फर्क है। क्या फर्क है?

निजांगमपि या गोप्यो, ममेति समुपासते।
ताभ्य: परं न मे किञ्चिन्नगूढप्रेमभाजनम् ।।

अर्जुन, ‘निजांगमपि या गोप्यो ममेति समुपासते’ गोपि कहती हैं- हमारे बाल स्वच्छ रहने चाहिए। क्यों? कि हमारे प्रियतम देखेंगे तो खुश होंगे, उनको खुश रखने के लिए हमने बाल रखा है, हम बहुत सुन्दर लगें, हम खुश हों, इसके लिए हमारे बाल नहीं है। हमारी आँखें प्रसन्न रहें, निर्मल रहें, इसलिए कि कृष्ण कभी देखेंगे कि आज इसकी आँख में खुशी है तो खुश हो जाएंगे, वे हमारी मुस्कान देखेंगे तो मुस्कुरा देंगे। वे शरीर में साबुन क्यों लगाती हैं, तेल क्यों लगाती हैं, साड़ी क्यों पहनती हैं, बाल क्यों सम्हालती हैं, क्यों बन-ठनकर निकलती हैं?

क्रमशः …….

प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹

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