!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 100 !!
श्रीराधारानी का यह विलक्षण रूप….
भाग 2
मैं आपके कहनें से वृन्दावन गया था ….मजबूरन गया था …..आपकी आज्ञा मेरे लिये सब कुछ है …..इसलिये गया था …….
आप बिलख रहे थे ………….मेरे लिये वो असह्य था ।
मैं जब वृन्दावन गया ………..सन्ध्या की वेला थी ……….ग्वालों से मिला ..”नन्दमहल” मुझे बता दिया था ………..मैं महल में जाकर मैया बाबा सबसे मिला ……रात भर आपकी ही चर्चा होती रही ।
प्रातः सूर्योदय से पूर्व मैं बाहर निकला……….तब मैने जो स्थिति देखी वृन्दावन की …….वो मुझे विचित्र लगी थी …….
क्यों की मैने गोविन्द !
आपको बिलखते , रोते देखा था …..पर वृन्दावन की स्थिति ?
वो पहला दिन था वृन्दावन में मेरा –
रंगोली सब गोपियों नें अपनें अपनें घरों के बाहर निकाले थे ……….
आँगन को गोबर से लीप रही थीं गोपियाँ ………उनकी सुन्दर चोटी धरती को छू रही थी ……….सुहागिन का पूरा श्रृंगार की हुयी ……गीत गाती ……..कोई आँगन लीप रही है …….कोई माखन निकाल रही है ।
ये सब दृश्य मैने देखा गोविन्द ! मुझे अजीब लगा ……आप इनके लिये रो रहे हो ….पर ये लोग अपनें आप में खुश हैं…….सारे कार्य इनके हो ही रहे हैं……..रुक तो आप गए हो ………..
मेरे वृन्दावन का वह प्रथम दिन था ………..मुझे ऐसा ही लगा ।
किन्तु मैं जब धीरे धीरे “प्रेमतत्व” को समझनें लगा ………श्रीराधारानी की वो सखी, ललिता सखी, उन्होंने मेरे ऊपर बड़ी कृपा की ……….
उद्धव कह रहे हैं – एक दिन, बरसानें के ब्रह्मांचल पर्वत में हम दोनों बैठे अपनी अपनी चर्चा कर रहे थे……..मैने ये बात कह दी ललिता सखी से……कि……..”उधर गोविन्द रो रहे हैं……बिलख रहे हैं……और आप लोगों का तो मैने देखा …..सब कुछ व्यवस्थित चल रहा है ……..आँगन भी लीपा जा रहा है …….आँगन में रंगोली भी काढ़ी जा रही है …..माखन भी निकाला जा रहा है ……..केश सज्जा भी की जारही है ।
मैं अपनी बात पूरी कर भी नही सका था कि …..ललिता सखी उठ कर खड़ी हो गयीं ……….मैं भी उठ गया ।
पुरे ब्रह्माचल पर्वत की ओर दृष्टि घुमाई थी ललिता नें ।
उद्धव ! ये वृन्दावन जल जाता कृष्ण के विरह में ………..
हाँ ……यहाँ की ये गोपियाँ , गोप, पशु पक्षी वृक्ष सब जल कर राख हो जाते …………पर हमारी स्वामिनी नें सब को बचाकर रखा है ………
ललिता नें अपनें आँसू पोंछे ये कहते हुए ।
उद्धव ! तुम जो देख रहे हो ना ! ये आँगन लीपना , गोपियों द्वारा नित्य पहले की तरह रंगोली काढ़ना ………गृह कार्य करना ……….
इस की प्रेरणा देनें वाली भी हमारी स्वामिनी श्रीराधारानी हैं ।
ललिता सखी नें उद्धव को वह घटना सुनाई थी……जब वृन्दावन से चले गए थे कृष्ण ……और उस समय जो दशा हुयी वृन्दावन की ।
भोजन करना छोड़ दिया था गोप , गोपी वन्य जीवों नें भी……..
उद्धव ! तुम नही समझोगे विरह के कष्ट को…….प्राण चले जाएँ ……वह ठीक है …..पर प्रियतम न जाएं…..ललिता सखी नें कहा ।
दस दिन हो गए …………बस रो रहे हैं …….गोपियाँ बेसुध हैं …….गोप बालक मथुरा की सीमा में पागलों को तरह खड़े देखते रहते ……..गौओं नें भी घास चरना छोड़ दिया था………
ऐसी स्थिति वृन्दावन की हो गयी थी उद्धव ! उस समय हमारी स्वामिनी श्रीराधा नें इस वृन्दावन को सम्भाला ………..
हम अष्ट सखियाँ नित्य श्रीजी की सेवा में लगी रहती हैं ……….
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –


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