!! एक अद्भुत काव्य – “प्रेम पत्तनम्” !!
( प्रेम नगर 32 – “जहाँ अनलंकृति ही अलंकृति है” )
गतांक से आगे –
यत्रानलंकृतिरेवालंकृति : ।।
अर्थ – जहाँ ( प्रेम नगर में ) अनलंकृति को ही अलंकृति माना जाता है ।
****हे रसिकों ! अलंकार ( गहनों ) का इस प्रेमनगर में कोई स्थान नही है ….अलंकार रहित होना ही यहाँ अलंकृत माना जाता है । क्यों की इस नगर में बाहरी आभूषण का कोई महत्व नही……महत्व तो आपके हृदय का है …उसमें प्रेम का पुष्प खिला है या नही ! ये बात बड़ी अद्भुत कही है ।
प्रेम योग है , प्रेम महायोग है , प्रेम तो योगियों के द्वारा अति दुर्लभतम योगों का भी योग है ।
फिर क्यों इस प्रीतम द्वारा छूये जाने वाले सुन्दर देह को पीले धातु या चमकते पत्थरों से सजाया जाए ? ये देह तो स्वयं ही सुन्दर हो उठेगा – प्रीतम को याद तो करो …उनके द्वारा खेले जाने वाले सुरत केलि का ध्यान तो करो , उनके द्वारा “नख क्षत और अधर खण्डित” स्थिति को अपनी साधना तो बनाओ…फिर देखो तुम्हारे रूप में वो अलंकार सुशोभित हो उठेगा ….जिसकी तुमने कल्पना भी नही की थी । तुम्हें फिर आभूषणों द्वारा सजने की जरुरत ही नही पड़ेगी …प्रेम तुम्हें निखार देगा ….तुम्हारे बिखरे केश भी सुन्दर लगेंगे ….बिना लाली के ही तुम्हारे अधर लाल हो उठेंगे , तुम्हारा बिना शृंगार का रूप भी शृंगार को पराजित कर देगा । आभूषण की क्या आवश्यकता ? यहाँ अलंकार व्यर्थ हैं । तुम्हारा हंसना, तुम्हारी खिलखिलाहट , तुम्हारा रोना , तुम्हारा चलना , उछलना , तुम्हारा अल्हड़पना कुछ भी सुन्दर लगेगा । क्यों की तुम्हारे अंग अंग में प्रीतम की अभिव्यक्ति हो रही है …तुम्हारे अंग अंग से वही झाँक रहा है । ओह !
हे रसिकों ! अलंकार – आभूषण ( गहनों ) को कहते हैं ….और उनके द्वारा सजावट को “अलंकृति” कहा जाता है …और , कोई सजावट नही है तो उसे “अनलंकृति” कहा गया है ।
इस प्रेमनगर में गहनों द्वारा नही सजना , सजना है तो “सजना” के द्वारा और “सजना” के लिए ।
जब प्रेम का उन्माद चढ़ता है ना, तो कहाँ आभूषण की सुध रहती है , कि ये लगाऊँ या ये पहनूँ !
प्रीतम को कष्ट होगा , उतारना पड़ेगा , तो अच्छा न हो की इस कष्ट से उन्हें बचा लूँ !
अब देखिये इस झाँकी को …
…बाँसुरी बजी श्रीवृन्दावन में तो सारी की सारी गोपियाँ भागने लगीं उसी बाँसुरी की धुन के पीछे । उस समय कोई गोपी सज रही थी …आभूषण धारण कर रही थी …सब कुछ उलटा सीधा हो गया । कान के कुण्डल कोई पहन रही थी उसने बाँसुरी सुनी तो एक ही कान में कुण्डल पहने और भाग गयी । कोई गोपी पाँव में पाजेब पहन रही थी उसे हाथों में पहन लिये और हाथों के कंगन पाँव में पहन कर भाग गयी । किसी ने आँखों में काजल लगाये किसी ने अधरों की लाली आँखों में और आँखों का काजल अधरों में लगाकर भाग गयी श्यामसुन्दर के पास ।
अद्भुत देश है ये प्रेम देश ।
पर इसी शृंगार से ये सुन्दर भी लग रही हैं ….क्यों की सुन्दरता आपके सजने से नही है ….सुन्दरता तो हृदय प्रेम के उमड़ने पे प्रकट होता है ।
आपके हृदय में अगर प्रेम है तो बेकार के बोझा हैं ये सब आभूषण । और अगर प्रेम नही है …तो इन आभूषण से तो प्रीतम रीझने से रहे ।
एक प्रेयसी अपनी सखी से कहती है …..हे सखी ! मुझे सजा दे …उसकी सखी सजाने लगी …और वो प्रेयसी खो गयी अपने प्रीतम में ….समय बीता ..उसकी सखी ने कहा ….हे सखी ! तुम्हारा शृंगार हो गया । उस प्रेयसी ने अपने हाथों को छूआ तो बड़ा सा कड़ा था ….कमर में छूआ तो करधनी थी जो उसके क्षीण कटि को और दुःख दे रही थी ….बाहों में रत्न जटित बाजू बन्द थे ….और गले में बड़ा सा हार था ।
ये क्या है ? पूछती है प्रेयसी अपनी सखी से ।
ये अलंकार हैं , आपको इसी से अलंकृत किया गया है ।
नही , उतारो इसे ….सुरत केलि में इनका क्या काम । ये बोझ हैं …ये मेरे हाथों का कड़ा मेरे प्रीतम को कष्ट ही देंगे …..मेरे गले का हार मेरे प्रीतम को चुभेंगे , ये करधनी किस काम की ….जिसे अभी मेरे प्रीतम उतार फेकेंगे , सखी ! ये सब तो हटा ही दो ….और मैं तो कहती हूँ इस दीये को भी बुझा दो …क्यों ? क्योंकि – आज हमारे मिलन की रात है ……
“सब्बे मोहताव है बुझा दो इन चिराग़ों को । वस्ल की रात में क्या काम है जलने वालों का”।
ये क्या कर रही हो ललिते !
कुँज में अभिसार के लिए जाती हुई श्रीराधा ललिता से पूछती हैं ।
कुछ नही हे राधे ! बस थोड़े आभूषण आपको धारण करा रही हूँ …
किन्तु श्रीराधा तुरन्त बोल उठती हैं ….ललिता ! मेरा देह सुन्दर है ….ये मैं नही कह रही मेरे प्राणप्रीतम कह रहे थे ….कि मेरा देह सुन्दर है …फिर इस देह को कुरूप क्यों बना रही हो ? मेरे प्राणधन कल कह रहे थे दोष रहित देह मुझे बहुत सुन्दर लगता है ….उन्हें ऐसे ही प्रिय है ललिता !
इन आभूषणों को पहना कर देह को दूषित मत करो । उनको जैसा अच्छा लगता है वही मुझे भी अच्छा लगता है । इतना कहकर श्रीराधारानी मौन हो गयीं ….ललिता भी मौन है …उसने भी आभूषणों को रख दिया है ।
ललिता ! कुछ देर बाद श्रीराधा फिर कहती हैं ।
आख़िन में अंजन लगा दो , केश संवार दो , उज्ज्वल वस्त्र पहना दो …बस इतना ही पर्याप्त है …मैं किसी की नही कह रही …मेरे प्रीतम को यही प्रिय है इसलिये मुझे भी यही प्रिय है ।
तभी रंगदेवि कुँज में पधारती हैं …स्वामिनी ! श्याम सुन्दर आगये हैं …अब चलिये कुँज में ।
ललिता श्रीराधिका जू के नयनों में अंजन लगा रही हैं …..तभी रंगदेवि बोलीं …..आभूषण धारण मत करना । रंगदेवि के मुख से ये सुनते ही श्रीराधा चौंकी ….रंगदेवि की ओर देखा ..मनौं पूछ रही हों …..क्यों ? रंग देवि कहती हैं – अगर अपने अंगों को इन तुच्छ भूषणों से भूषित करोगी …तो उन ब्रजभूषण को कहाँ भूषित करोगी ? ये सुनते ही – हा श्याम सुन्दर ! कहते हुए श्रीराधा कुँज की ओर दौड़ पड़ी थीं ।
आभूषण तो धारण करो , एक सखी ने अपनी सखी से कहा ।
प्रीतम को कष्ट होगा । उन्हें उतारने पड़ेंगे । उस सखी का ये उत्तर था ।
तो फिर ये कंचुकी , साड़ी आदि भी क्यों पहनती हो …उसको भी उतारने में प्रीतम को कष्ट होगा ।
वो प्रेमिन बोली …मैं तो इन्हें भी न पहनूँ …..किन्तु संसार की नज़र गन्दी है …उन नज़रों से अपने इस सुन्दर अंगों को बचाने के लिए मैं ये वस्त्र पहनती हूँ । बाकी मुझे और कोई मतलब नही है ।
अब बताओ क्या कहोगे ?
हे रसिकों ! इतना समझो कि प्रेमी महायोगी होता है ….वो सारे नियम आदि को लांघ कर यहाँ तक पहुँचा होता है …उसे क्या कहोगे तुम ? वो देहातीत है …देह के बंधन से वो बहुत परे जा चुका है ….इसलिये इस प्रेमनगर में “न सजना ही सजना है”….सजना के लिए ही सजना है ।
उफ़ ! अब क्या लिखें …….
शेष अब कल –


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