महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (024)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
योगमाया का आश्रय लेने का अर्थ
यहीं कहूँ श्याम काहू कुंज में फिरत ह्वै हैं
भुज हरि भेंटब को हिय उमगत है।
यहीं होंगे, यही मिलेंगे, उस पेड़ पर, उस कुञ्जा में। हृदय में जब तक संयोग का सुख और वियोग की पीड़ा उदय नहीं होती, तब तक यह संसार का दुःख दूर नहीं होता। प्रेम का जो दर्द है वह दुनिया के, संसार के दुःख को दूर करता है।
तो वीक्ष्य- ऐसी-ऐसी चीजें भगवान् ने बनायीं। वृन्दावन की रात देखकर, वृन्दावन की गाय देखकर, वृन्दावन की ग्वालिन देखकर, कृष्ण के मन में भी रास की तीव्र लालसा होती है। भगवान् ने बनाया, इसलिए है और ‘रन्तुं मनश्चक्रे योगमाया मुपाश्रितः।’ अब देखो भगवान् ने सबकुछ तो बना दिया लेकिन मन ही न हो तब क्या बनेगा? तो एक ऐश्वर्य- पक्ष का अर्थ बताया और एक इसमें माधुर्य- पक्ष का। वृन्दावन ऐसा है कि कृष्ण को लुभा दे। आपको कृष्ण के जीवन के बारे में एक बात सुनाता हूँ। सबसे बड़ी माया उनके जीवन में यही है। वह क्या माया है?– यह जो दुनिया को दिखाया कि हम बलरामजी के साथ अक्रूर के साथ मथुरा जा रहे हैं, यह सबसे बड़ी छलना है। कृष्ण खुद नहीं गये, खुद तो ऐसे मामूली बन गये, जैसे कोई गोपियों का सेव हो। रोज-रोज गाय चरावें, रोज-रोज माखन चोरी करें, रोज-रोज मैया का दूध पीयें, रोज-रोज गोपियों के साथ खेलें, अपना कृष्ण नाम ही बदल दिया। अपना नाम छैला रख दिया, छैलचिकनिया रख लिया; वसुदेव के जो बेटे मथुरा से आये थे उनको अक्रूर के साथ भेज दिया और स्वयं गोपियों को छोड़कर कभी मथुरा नहीं गये। दुनियाँ ने समझा कि कृष्ण मथुरा चले गये और कृष्ण रह गये वृन्दावन में।*
वृन्दावनं परित्यज्य पादमेकं न गच्छति ।
पकड़ लिया कृष्ण को वृन्दावन ने! ईश्वर है तो क्या हुआ? प्रेम हो तो ऐसा- सौन्दर्य हो तो ऐसा, माधुर्य हो तो ऐसा। प्रेम बिना रस्सी का बन्धन है। अब देखो- ‘रन्तुं मनश्चक्रे’ का अर्थ है कि हैं अपने आपमें परिपूर्ण परन्तु रमण के लिए मन बनाया। ‘मनः कर्म भूतं चक्रे।’ जैसे कोई कहे ‘कुम्भकारः घटं चक्रे, निर्मितवान्’- ऐसे भगवान् अपना मन बनाया।
अब उस मन में पीड़ा का अनुभव किया। मन कहता है कि चलो जमुना किनारे, मन कहता है कि चलो रमण रेती में, मन कहता है कि चलो वृन्दावन में, मन कहता है कि चलो निकुञ्ज में, मन कहता है कि चलो कदम्ब वृक्ष के नीचे वहाँ चलकर बाँसुरी बजाओ। दुनियाँ में कुछ अच्छा नहीं लगता- जब तक गोपियाँ हमारे पास नहीं आएंगी और जब तक रास नहीं होगा तब तक हमको सृष्टि अच्छी नहीं लगती है। अब देखो ‘चक्रे चकार’। एक परस्मैपद होता है, एक आत्मने पद होता है ‘जहाँ सुख दूसरे को मिलने वाला होता है वहाँ चकार बोलते हैं और जहाँ सुख अपने को मिलने वाला होता है वहाँ चके बोलते हैं। कर्म का फल जब अपने को मिलता है तब आत्मने पद ‘चक्रे’ और क्रिया का फल, कर्म का फल जब दूसरे को मिलता है तब परस्मै पद, ‘चकार’।
कृष्ण कहते हैं कि राधे। तुम्हारे बिना मैं दुःखी हूँ, तुम्हारे लिए मैं जीवित हूँ। प्रेम के रास्ते में चलें और पीड़ा नहीं हो तब कैसे होगा? पीड़ा तो प्रेम का पूर्व रूप है। अरे भाई। जो सुख देता है उसके लिए दर्द भी होता है, जिससे सुख मिलता है, उसके लिए पीड़ा भी होती है। और जो दुःख देता है उससे बचने की इच्छा होती है। यह मन का स्वभाव है कि जो दुःख देता है उससे बचने की इच्छा होती है जो सुख देता है उससे मिलने की इच्छा होती है। यही तो प्रेम का कुल रहस्य है। तो ‘मनश्चक्रे’- जो भगवान को भी सुख दे उसके भीतर कितना सुख होगा। यशोदा मैया ने भगवान् को यश दिया और गोपियों ने भगवान् को सुख दिया।**
जब मन में तीव्र वेग होता है, शरीर ऐंठने लगता है, यह जो नृत्य है न, यह रस का विलास है, इतने वेग से रस का उदय होता है कि मनुष्य नाचने लग जाता है। तो भला भगवान् ने इस मन का निर्माण कैसे किया? ‘मनश्चक्रे’- अर्थ इसका है कि संकल्प किया अपने सुख के लिए। मन माने संकल्प इसका दूसरा अर्थ है कि पहले मन नहीं था, अब बनाया और तीसरा अर्थ यह है कि गोपियों में इतना सौन्दर्य, इतना माधुर्य, इतना रस है कि रमण का संकल्प किया कि भाई- यह सुख तो हम लेकर रहेंगे. इनका सुख तो लेकर रहेंगे- ‘रन्तुं मनश्चक्रे’।
कैसे यह संकल्प लिया तो उसके लिए अंतिम पद है- योगमायामुपाश्रितः। अब पहले वेदान्ती अभिप्राय सुनो। मनश्चक्रे अयोगमायामुपाश्रितः- वेदान्ती कहते हैं कि चक्र के बाद और योग के पहले एक आकार है इसलिए अयोगमाया हो जाएगा। अयोगमाया क्या है कि संसार में सबसे हँसो, सबसे खेलो, सबसे मिलो, परंतु योग होने न पावे। इसको वेदान्ती लोग अस्पर्श- योग कहते हैं। हे नारायण! जैसे संसारी लोगों की बन्धन होता है, जैसे संसारी लोगों को आसक्ति होती है, जैसे वे अपना स्वरूप ही खो बैठते हैं, अपने स्वरूप से च्युत हो जाते हैं, वैसे कृष्ण नहीं हैं। अयोगमायामुपाश्रितः।
अब दूसरा अर्थ देखो- बोले भाई यह वृन्दावन, रात्रि का समय और कृष्ण बाँसुरी मात्र उपकरण लेकर आ गये। अब यहाँ श्रृंगार कौन करेगा? कुन्दमाला बनाकर कौन पहनावेगा? कमल की माला कौन पहनावेगा? यहाँ बाजे बजेंगे तो कौन ले आवेगा गोपियों को। कहा- गोपियाँ तो घर से भाग-भागकर आवेंगी। ‘अन्योन्मलक्षितोद्यमा’- सब गोपियों ने कोशिश की कि हमारा जाना किसी को मालूम न पड़े- ‘अन्योन्यलक्षितोद्यमा’। पहले जब चीर हरण के लिए जाती थीं, मालूम न पड़े- ‘अन्योन्मलक्षितोद्यमा’। पहले जब चीर हरण के लिए जाती थीं न, कात्यायनी व्रत के लिए, यमुना स्नान के लिए तो- ‘उषस्युत्थाय गोत्रैः स्वैः’ प्रातः काल उठतीं- ‘अन्योन्यबद्धवाहवः’ परस्पर गलबहियाँ डालती और ‘कृष्णमेव जर्गुयान्त्यः’ कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण रक्ष माम्, कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण पाहि माम्, कृष्ण केशव, कृष्ण केशव, कृष्ण केशव रक्षमाम्, कृष्ण केशव, कृष्ण केशव, कृष्ण केशव पाहि माम्। सब एक साथ मिलकर बोलती हुई जाती हैं।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹


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