Niru Ashra: 🌲🌻🌲🌻🌲🌻🌲
!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 129 !!
रुक्मणी ! मोहे “राधा” कि याद सतावे
भाग 2
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आप आज ज्यादा ही भाव में डूबे जा रहे हैं……..क्या हुआ नाथ !
उद्धव नें भी पूछ लिया ।
कृष्ण चन्द्र नें लम्बी साँस ली ………उद्धव ! अर्जुन श्रीधाम वृन्दावन होकर आया है………इतना ही बोल पाये थे कृष्ण…….आँखें चढ़ गयीं ……साँसें रुक रुक के चलनें लगीं……देह भान ये भी भूल गए ….उद्धव नें सम्भाला…..और महल में रुक्मणी के कक्ष में ।
रुक्मणी चरणों में बैठी पँखा करती ……..कभी चरण चाँपतीं ।
उद्धव से पूछा भी था रुक्मणी नें ……..क्या हुआ उद्धव ! मेरे प्राण नाथ को , क्या हुआ ?
पर उद्धव नें कोई उत्तर नही दिया था ।
श्रीराधा ! श्रीराधा ! श्रीराधा ! श्रीराधा ! श्रीराधा ! श्रीराधा !
अर्धरात्रि को एकाएक कृष्ण चन्द्र बिलख उठे थे ।
रुक्मणी नें सुना, तो उनके हृदय में पीडा हुयी ……..ये मेरे होते हुए उस ग्वालिन राधा का नाम ले रहे हैं ? हम रानियाँ दिन रात इनकी सेवा करती हैं ………और रूप गुण में भी कम नही है किसी भी अप्सरा से ………फिर इन्हें ये राधा क्यों याद आरही है !
पर ये श्रीराधा नाम अभी तक तो कृष्ण चन्द्र जू के मुखारविन्द से ही निकल रहा था ………पर अब तो रोम रोम से …….श्रीराधा ! श्रीराधा !
श्रीराधा ! श्रीराधा ! ……..स्वाभाविक है किस पत्नी को अच्छा लगेगा जो रुक्मणी को अच्छा लगता ।
जगा ही दिया कृष्ण चन्द्र जू को रुक्मणी नें ………….
जब कृष्ण जागे…..तब कुछ लज्जित से हुए थे…..पर बड़ी चतुराई से इस बात को छुपानें लगे । और बोले – नींद लग रही है ….सो जाऊँ ?
पर नाथ ! ये श्रीराधा कौन है ? रुक्मणी नें पूछा ।
मुझे बहुत नींद आरही है ……..मैं सो रहा हूँ ………..कृष्ण चन्द्र फिर सोनें लगे …………..
मुझे आपनें बताया नही ……..कि ये श्रीराधा कौन है ?
हम सब अत्यन्त सुन्दरी हैं ……शायद स्वर्ग की अप्सरायें भी हमारे सामनें कुछ नही …….फिर आपको ये राधा ही क्यों याद आरही हैं ?
बताइये ! रुक्मणी नें जिद्द की ……….उठ कर बैठ गए थे कृष्ण ।
इधर उधर देखनें लगे ………..रुक्मणी नें कहा …….मेरी ओर देखिये …..अब बताइये …..कौन है ये राधा ?
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –
❤️ राधे राधे❤️
Niru Ashra: !! दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री !!
( श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव )
!! रस विलास रस विलस रहे !!
गतांक से आगे –
“रस ही रस में विलस रहे हैं”
क्या अद्भुत बात है ।
यहाँ रस तत्व ही है …श्याम सुन्दर रस, उनकी प्रिया श्रीराधा रानी रस , सखियाँ रस , श्रीवृन्दावन रस , यहाँ के पक्षी रस , यमुना रस , लता पत्र सब रस । रस ही रस का खेल चल रहा है इस निकुँज में । ब्याहुला उत्सव पूर्ण हुआ ….अब मिलन की वेला है ….रति रस में दोनों डूबेंगे ..द्वैत मिटेगा अद्वैत हो जाएँगे ….एक ही रह जाएगा …कौन ? रस , केवल रस रह जाएगा ।
॥ दोहा ॥
संग प्रिया पिय बिलसहीं, रस रंग बरखि बरखि ।
बड़भागिनि बलि जाय अलि, सोभाजु निरखि निरखि ॥
निरखि निरखि श्रीहरिप्रिया, हिलि मिलि हिय हरषंत ।
नवल बिसाखा सहचरी, नवल रंग बरषंत ॥
|| पद ||
नवल रंग बरषै बिसाखा सहेली नवल बर महल की चहल लागी ।
अतिहि आनंद उत्साह में रगमगी जगमगी उरनि अनुराग रागी ॥
नवल कमलासनासीन दोउ लाड़िले केलि कलवेलि अंग अंग बाढ़े।
झेलि रस झूलि रहे फूल मधुमहमहे डहडहे गहगहे गुननि गाढ़े।
माधवी मालती चंद्रलेखा चपल कुंजरी सुरभि सुभ आनना हरनी ।
एकतें-एक मंगल सनी अनगिनी बरतनी बनी नहिं जाति बरनी ॥
मंजरी सुंदरी सखी अरु सहचरी अहल महली फिरैं फूलि फूली।
गीत गावैं बिहँसि रहसि रसरीतिसों प्रीतिनिधि मगन सुधि सकल भूली ॥
फैलि रह्यौ बितन तन विपिन सौरभ सु मिलि, हितन हिलि मिलि रली बिमल बिमली।
निरखि श्रीहरिप्रिया हरखि बारति तनै, को गनै भाग महिमा फलीअली ॥ १७१ ॥
रति रस में भींगें दोनों युगलवर ….सुंदर शैया में विराजमान हैं …..सखियाँ चारों ओर हैं …कोई सखी गीत गा रही है तो कोई नृत्य से युगल वर को रिझा रही है । सब रस से भरी हैं …युगलवर को देख देख कर ये सब बलि बलि जा रही हैं । इस तरह चारों ओर बस रस ही रस का खेला आरम्भ हो गया है ।
हरिप्रिया सखी मुग्ध हैं …वो कुछ बोल नहीं रहीं ..क्या बोलें ….जब रस सिन्धु में बाढ़ आगयी हो और उसमें हम सब डूब जायें ….तो क्या कुछ भी बोल पायेंगे ? बस मुस्कुरा रही हैं और अपलक निहार रही हैं अपने युगल सरकार को । तभी विशाखा सखी जू हाथों में कमल की माला लिए युगल सरकार के पास आयीं ….श्रीरंगदेवि जू ने पूछा भी था ….कि एक ही माला क्यों ? विशाखा सखी जू बस मुसकुराईं थीं ….ओह ! श्रीरंगदेवि जी ने अब समझा था ….विशाखा सखी जू की माला इतनी बड़ी थी कि एक ही माला दोनों को पहना दी । अब तो ये और सुन्दर लग रहे हैं ….श्रीरंगदेवि जू ने कहा था । जी ! सौन्दर्य पल पल बढ़ता ही रहता है इनका तो …अभी देखो तो जो होगा, कुछ ही पल में सौन्दर्य की बाढ़ आ जाएगी , सौन्दर्य बढ़ता ही रहेगा …विशाखा सखी ये कहते हुए नृत्य करने लगीं थीं …जिससे श्याम सुन्दर बड़े ही प्रसन्न हो गये थे …प्रिया जी उनका नृत्य देखकर वहीं झूमने लगीं , अपनी प्रिया को इस तरह झूमते देखना लाल जू को बड़ा अच्छा लगता है ….वो अपनी प्रिया जू को निहारने लगे थे । विशाखा सखी अति आनन्द से भरी हैं ….अनुराग उनके नेत्रों से टपक रहा हो मानों । प्रिया जू को इधर झूमता देख लाल जू स्वयं रस सिक्त हो अपनी प्रिया जी को हृदय से लगा लेते हैं ….प्रिया जी शरमा जाती हैं और लाल जू को दूर कर देती हैं …चूनर गिर गयी है ….लाल जू ने देखा उस गिरे हुए चूनर को और गिरा दिया ….उफ़ ! फिर क्या था ….लाल जू आहें भरने लगे थे ….प्रिया जी का अंग अंग रति केलि के लिए लाल जू को मानौं निमन्त्रण दे रहे हों …अद्भुत विलक्षण रस बिखर रहा था । रस रुकता नही है इसने रुकना जाना नही है …रस तो बढ़ता है …बढ़ता ही जाता है …..
तभी सबके देखते ही देखते ..अनगिनत सुन्दरी वहाँ आ गयीं …ये सब मंगल गीत गाती और रति रस को बढ़ाने वाले गीत गा रही थीं ….इनके पद चाल एक समान थे …इन सबने जो साड़ी पहनी थी वो पीले रंग की थी …..इनकी चोटी नागिन की तरह इनके कमर तक झूम रही थी …गजरा लगाया था , उससे चोटी और सुन्दर लग रही थी । ये सब हंस रहीं थीं इनकी हँसी भी मन मोहनी थी । इनके नाम हरिप्रिया सखी ने बताये ….माधवी , मालती , चन्द्रलेखा , चपला , कुंजरी , सुरभि ,शुभानना आदि आदि सखियाँ ये सब बड़ भागिन हैं तभी तो इस उत्सव में आ पाईं , ये कहते हुए हरिप्रिया फिर मौन दर्शन करने लगीं थीं । ये जो नाचती खेलती सखियाँ थीं ….वो तो युगलवर को निहारते निहारते सुध बुध खोने लगीं । सम्पूर्ण वन में रस केलि की आभा विपिन के सौरभ से मिलकर बिखर रही थी ….सम्पूर्ण सखियाँ आनन्द मग्न होकर अब धीरे धीरे एक होने लगीं थीं …यानि सबकी चाल ,सबका लय , स्वर और यहाँ तक की रूप एक जैसा ही सबका हो गया था , क्यों न हो …हरिप्रिया समाधान करती हैं ….यहाँ द्वैत दिखाई देता है किन्तु है अद्वैत …..हे सखी ! यहाँ सारा खेल रस का है ….देखो ना , रस से भरी ये सब रस रूप युगलवर , और रस श्रीवृन्दावन , लता आदि भी रस …इसलिए मूलतः ये रस रूप युगलवर के रस का ही विलास है …विस्तार है । इस रस का जो पान कर रहा है उसके भाग की बढ़ाई कौन कर सकता है । ये कहते हुए हरिप्रिया फिर रस मग्न होकर युगलवर को निहारने लग जाती हैं ।
क्रमशः….
Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (082)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
‘लौट-जाओ’ सुनकर गोपियों की दशा का वर्णन
गोपी का स्वभाव है इंद्रियों के द्वारा भगवत-रस का पान करना। यह स्वभाव सांख्यों और योगियों का भी नहीं है और वेदान्तियों का भी नहीं है। उनके अध्यात्मशास्त्र में तो इन्द्रिय और विषय के संयोग में जो सुख मिलता है वह अनित्य है, असत्य है। योगी के इन्द्रिय का विषय संसार हैं, सांख्ययोगी के इन्द्रिय का विषय तो साक्षात् नराकृति परब्रह्म है। इसलिए यहाँ इन्द्रिय और विषय के संयोग में जो रस का दान और आदान है वह कोई लौकिक रस का दानादान नहीं है, वह तो भगवत रस का ही दानादन है।
गोपी शब्द का अर्थ देखो- ‘गोः इन्द्रियं पान्ति रक्षन्ति इति गोप्यः’ जो लौकिक विषय के इंद्रियों के सेवन से अपने को बचाती हैं उनका नाम गोपी है। जो इंद्रियो को बचाती हैं वे गोपी। और ‘गोभिः कृष्णरसं पिबन्ति इति गोपी’- जो अपने स्वरूपभूत परमार्थ परमात्मा हैं श्रीकृष्ण, उनके रस का पान इंद्रियों के द्वारा करती हैं वे गोपी। इसलिए गोपीपने में दोनों बात हैं, इंद्रियों से भगवत रस का पान और लौकिक विषय सेवन से इंद्रियों की रक्षा। भगवत-रस का पान किसको प्राप्त होगा, जो विषयरस से अपनी इंद्रियों को बचावेगा और जो विषयरस में अपनी इन्द्रियों को लगावेगा उसको भगवत – रस नहीं मिलेगा। अगर परपुरुष के द्वारा इंद्रियरस का पान होवे तो नरक में जाना पड़ेगा और स्वपुरुष के द्वारा इन्द्रियरस का पान करे तो धर्मानुकूल होने से स्वर्ग की प्राप्ति होगी। परंतु यह भगवत- रस नरक-स्वर्ग दोनों में ले जाने वाला नहीं है।
भगवत-रस वह होता है जो सर्वदेश में, सर्वकाल में, सर्ववस्तु में, और सर्वप्रक्रिया के द्वारा उपलब्ध होता है। क्योंकि जब भगवान उपलब्ध हैं तो उनकी उपलब्धि की प्रक्रिया भी सर्व है। समझो भगवान सब है तो इसमें मिलेगा कि नहीं मिलेगा? भगवान सर्वकाल में हैं तो अब मिलेगा कि नहीं? भगवान सर्वदेश में है तो यहीं मिलेगा कि नहीं मिलेगा? जो इस समय न हो वह भगवान नहीं, और जो यहीं न हो सो भगवान नहीं, और जो यही हो सो भी भगवान नहीं? भगवान किसी से व्यतिरिक्त नहीं होता। ब्रह्मैवेदं सर्वम्। +
अब कृष्ण ने जब यह कहा कि लौट जाओ तो यह तो उनके गोपीपने के नाश का प्रसंग उपस्थित हो गया। क्योंकि गोपी तो वह है इंद्रियवृत्ति से भगवत-रस का पान करें। यदि भगवान् उनको लौटा दें तो इंद्रियवृत्ति से भगवत-रस का पान नहीं होगा और तब उसके गोपीपने का नाश हो जायेगा। गोपी जिन्दा नहीं रह सकती, मर जावेगी, और हमेशा के लिए मर जावेगी।
गोपी नाम की चीज न कभी हुई और न होगी, अगर उसको उसकी इन्द्रियों के द्वारा भगवत्-रस की प्राप्ति न हो और न होगी, अगर उसको उसकी इन्द्रियों के द्वारा भगवत्-रस की प्राप्ति न हो और उस भगवान् को जाने दो जो इन्द्रियों के सामने आने से डरता है कि हम दृश्य हो जाएंगे, जड़ हो जाएंगे, विकारी हो जाएंगे, अनित्य हो जाएंगे, दुःख हो जाएंगे, उस डरे हुए भगवान् को जरा हिमालय की ओर रहने दो। इस भगवान् को जो वृन्दावन में है, इसको डर नहीं लगता है। यह जानता है कि हम इंद्रियों के सामने आवेंगे तब भी जड़ नहीं होवेंगे, चेतन ही रहेंगे। दृश्य होने पर भी दृंङ्मात्र रहेंगे। जन्म और मरण हमारे अन्दर दिखने पर भी हम अविनाशी रहेंगे? हमारी वजह से लोगों को दुःख होगा, त ब भी हम रस-स्वरूप ही रहेंगे। यह कोई डरने वाला भगवान् नहीं है, अभय है, स्वतंत्र ब्रह्म है।
‘गोविन्दभाषितं’- गोपी के लिए यह कहना कि तुम कृष्ण के सामने मत रहो, लौट जाओ, यह गोपी के स्वरूप के वितरित है; और गोविन्द का यह कहना कि तुम लौट जाओ यह गोविन्द के स्वरूप के भी विपरीत है। क्योंकि गोविन्द किसको बोलते हैं? गोविन्द ने हाथ पर गोवर्धन पर्वत उठाकर गौ और व्रज की रक्षा की थी। इसलिए उनका नाम गोविन्द है। इंद्र ने श्रीकृष्ण को गोविन्द संज्ञा दी है। व्याकरण से यह सिद्ध है- ‘गां पृथ्वीं विन्दति, गां व्रजववासिनं विन्दति, गां इंद्रियवृत्तिं विन्दति।’ ‘विद् लाभे’ से गोविन्द शब्द का अर्थ होगा- जो लोगों की इंद्रियों को अपनी ओर खींच ले। जो लोगों की इंद्रियों का विषय बन जाय। शब्द हो जाय कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण; स्पर्श हो जाय- आकर छुए रूप हो जाय- आँख से आँखें मिले; गंध बनकर आवे, नाक में समा जाय। रस बनकर आवे, जिह्वा में समा जाय! यह भगवान् ऐसा गोविन्द है, सर्वात्मक है। जो लोग ज्यादा पढ़े-लिखे होते हैं उनके मन में ईश्वर के निराकार होने का संस्कार थोड़ा प्रबल हो जाता है। ++
पहले तो वे ईश्वर मानें ही नहीं, क्योंकि ज्यादा पढ़-लिख जायँ तो उनके सिरधर डारविन सवार होते हैं, उनके सिर पर मार्क्स सवार होते हैं, उनकी आत्मा बैठ जाती है। तो पहले तो वे ईश्वर को मानते नहीं और मानें तो थोड़ा-सा असर बाइबिल का, थोड़ा असर आर्यसमाज का अपनी बुद्धि पर लेकर ईश्वर को निराकार ही मानते हैं, साकार मानते ही नहीं और जो पढ़े-लिखे वेदान्ती हो जाते हैं वे भी वेदान्त पूरा समझ में न आने से वह जो प्रक्रिया वाली बात नेति-नेतिवाली वह दिमाग में बैठ जाती है। वे गोविन्द शब्द का क्या अर्थ है यह नहीं जानते। ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठं सर्वं खल्विदं ब्रह्म, आत्मैवेदं सर्वं, सद्धीदं सर्वं, चिद्धीदं सर्वम्- इन श्रुतियों के अर्थ को तो वे भूल ही जाते हैं।
तो गोविन्द का गोविन्द नाम इसलिए पड़ा है कि वह लोगों की आँख को अपनी ओर खींच ले, कान को खींच ले, और लोग भी बड़े प्रेम से खिंच जायँ, यह समझें कि कान पकड़कर जो खींचता है वह प्रेम से खींचता है। दुश्मनी से नहीं खींचता है। ये इंद्रियाँ जो संसार में जानेवाली हैं उनको अपनी ओर खींच लें, इसलिए उसको गोविन्द कहते हैं। अब यह आज उल्टा हो गया। उल्टा कैसे हो गया कि गोविन्द ही कहता है कि लौट जाओ। जब उसने बाँसुरी बजाकर के क्लींनाद करके अपनी य जादूगरी दिखायी कि सब गोपियों को यह मालूम पड़ा कि हमारा ही नाम लेकर बुला रहा है, तब तक तो वह गोविन्द था, परंतु आने के बाद उसने कहा कि लौट जाओ, तो उसमें गोविन्दपना कहाँ रहा? तो लौट जाओ ऐसा कहना गोपी के स्वरूप के भी विपरीत हुआ और गोविन्द के स्वरूप के भी विपरीत हुआ।
अब जरा देखो दूसरी बात ‘विषण्णा भग्नसंकल्पाश्चिन्ता-मापुर्दुरत्ययाम्’- आपको देखे एक शाश्वत नियत बताता हूँ। जिसके लिए आपको दुःख नहीं होगा। उसके मिलने से आपको सुख भी नहीं होगा- यह शाश्वत नियम है, भला! यह नियम कहाँ से बना इस बात का गुर हम जानते हैं। चाहे ईश्वर को निर्गुण मानो, चाहे सगुण, वह सर्वदेश में, सर्वकाल में, सर्ववस्तु में एकरस है। अतः ईश्वर तो नित्य मिला-मिलाया है, उसके मिलने में सुख कहाँ से आवेगा? असल में सुख पैदा करना पड़ता है, यह सिद्धांत है। एकरस वस्तु में इतना दुःख है और इतना सुख है, यह बात स्वाभाविक नहीं हो सकती; इतनी दूर सुख है, इतनी दूर दुःख है, इतनी देर सुख है, इतनी देर दुःख है, इतने वजन का दुःख है, इतने वजन का सुख है- ये बातें परमेश्वर के सहज स्वरूप में स्वाभाविक नहीं हो सकतीं। तब सुख पहले पैदा करना पड़ता है।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (083)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
‘लौट-जाओ’ सुनकर गोपियों की दशा का वर्णन
कैसे? जैसे अगर छाया का सुख लेना हो तो धूप में चलना पड़ता है, वैसे जिसको पहले भगवान् के वियोग में दुःख होगा उसी को भगवान् के संयोग में सुख की उपलब्धि होगी। नहीं तो उपलब्धि में दुःख और सुख, दोनों समान ही हैं। दुःखात्मक उपलब्धि भी वही है, और सुखात्मक उपलब्धि भी वही है। उपलब्धि वही है। नारायण! सुख की उपलब्धि करनी हो तो पहले दुःख की उपलब्धि करो। यदि कभी-कभी मिलते हैं तो बड़े प्रेम से मिलते हैं और रोज-रोज मिलें तो लड़ते हैं। लड़कर पति-पत्नी अलग-अलग हो जाते हैं और फिर पंद्रह दिन, बीस दिन, एक महीने के बाद अगर मिलते हैं तो बड़े प्रेम से मिलते हैं। यही प्रेम बढ़ाने का तरीका है।श्रीकृष्ण ने कहा कि गोपियों को अधिक से अधिक सुख मिले इसका क्या उपाय है? कि बोले बाबा, अब थोड़ी गर्मा-गर्मी होनी चाहिए। इसलिए गोपियों से कह दिया कि लौट जाओ।
विषण्णा- गोपियों में विषाद आ गया। क्यों आ गया? क्योंकि यह प्रसाद बाप है। जैसे गीता के दूसरे अध्याय में वर्णित सांख्ययोग का बाप था पहले अध्याय का अर्जुन का विषाद, वैसे ही रासपञ्चाध्यायी के पहले पकरण में गोपियों का विषाद है। विषाद के बाद प्रसाद है और विषाद ही न हो तो प्रसाद कहाँ से आवे? ‘विषण्णा भग्नसंकल्पाः’ गोपियों का संकल्प टूट गया, उनके दिल में तो था कि चाँदनी रात है, यमुना का विशाल पुलिन है, वहाँ हरे-भरे वृक्ष फूले हुए फल लगे हुए, मोर नाचते रहे, कोयल कुहुक-कुहुक कर रही- ऐसे वातावरण में हम कृष्ण से रूठेंगी और कृष्ण हमको मनायेंगे कि प्रसन्न हो जाओ। यह जो उन्होंने अपने दिमाग में एक झाँकी बनायी थी, उसकी जगह पर कृष्ण ने एक खँडहर खड़ा कर दिया। भग्न संकल्पा जैसे भग्न मंदिर होते हैं, भग्न महल होते हैं वैसे गोपियों के संकल्प का महल भग्न हो गया। यह क्यों हुआ, इसमें भी एक रहस्य है। काम के बाप का नाम आप लोगों को मालूम है? काम के बाप का नाम है संकल्प। महाभारत में एक मंकी गीता है। वहाँ महात्मा ललकारता है-
काम जानामि ते मूलं संकल्पाद् किल जायसे ।
न त्वां संकल्पयिष्यामि तेन मे न भविष्यसि ।।
अरे ओ काम। मैं तेरी जड़ जानता हूँ। क्या? संकल्पादिक जायसे, तुम संकल्प से पैदा होते हो। जब किसी के बारे में समत्व की कल्पना होती है कि यह बड़ा बढ़िया है, यह बड़ा मीठा है, यह बड़ा सुन्दर है, तब तुम इस संकल्प से पैदा होते हो। मैं कभी तेरा संकल्प ही नहीं करूँगा। तो फिर तू मेरे साथ कहाँ से आवेगा? +
जब श्रीकृष्ण ने कहा कि लौट जाओ तो गोपियों के चित्त में जो काम का संकल्प था, जो भोग का संकल्प था, वह टूट गया माने काम का बाप मर गया। गोपियों के हृदय में काम का जो भी संस्कार शेष था, उसको भगवान ने लौटाने की बात कहकर समाप्त कर दिया। भगवान प्रेम से मिलते हैं, भगवान काम से नहीं मिलते। अपने सुख के लिए कोई भगवान के पास जाय तो वह काम से जाता है। और भगवान को सुख देने के लिए जाय तो वह प्रेम से जाता है। अभी तक गोपियों की अपनी मर्जी थी, अब भगवान की मर्जी प्रारम्भ हो गयी। इसलिए ‘भग्नसंकल्पा’- संकल्प तोड़कर भगवान ने बहुत बढ़िया किया। बाद में उनका अहंकार भी भगवान ने तोड़ दिया। कैसे? कि जब अन्तर्धान हो गये तो गोपियों को मालूम हो गया कि हमारे सौंदर्य, हमारे माधुर्य, हमारे रसास्वादन के लोभ से श्रीकृष्ण हमारे साथ विहार नहीं करते।
तीसरी बात क्या हुई कि ‘चिन्तामापुर्दुरत्ययाम्’ निरन्तर चिन्तन होने लगा। देखो, गोपियों का श्रवण हुआ, उसका फल हुआ वैराग्य और वैराग्य के बाद भगवान के न मिलन का दुःख हुआ, काम की निवृत्ति हुई और अब श्रीकृष्ण के बारे में चिन्तन की धारा बहने लगी जिससे उनके हृदय में विक्षेप भी समाप्त हो गया। यह रासलीला का प्रारंभ है। अब आपको सुनाते हैं।
कृत्वा मुखान्यव शुचः श्वसनेन शुष्यद् बिम्बाधराणि चरणेन भुवं लिखन्त्यः।
अस्त्रैरुपात्तमषिभिः कुचकुंकुमानि तस्थुर्मृजन्त्य उरुदुःखभराः स्म तूष्णीम् ।।
‘कृत्वा मुखान्यव’ मुँह लटक गया। अरे भाई, आये तो भगवान के दर्शन के लिए मुँह लटक गया। टीका में चालीस-पचास बात इस पर लिखीं कि मुँह क्यों लटक गया। गोपियाँ स्वयं भगवान के अभिमुख आयी थीं और भगवान के अभिमुख होने की आशा कर रही थीं। इस आशा पर कुठाराघात हुआ, आशा टूट गयी, मुँह लटक गयाय़ आगे क्या हुआ कि ‘शुचः श्वसनेन शुष्यद् विम्बाधराणि’ होंठ सूख गये। काम रस है जो उनके शरीर में सूख गया। शरीर की क्या गति हुई- ‘चरणेन भुवं लिखन्त्यः’ बायें पाँव से धरती खोदने लगीं। इन सबका एक-एक की पाँच-पाँच प्रकार की उत्प्रेक्षाएँ हैं। ++
अब देखो शरीर की ये दशा हुई कि पाँव से धरती खोदने लगीं और इंद्रिय की क्या दशा हुई- ‘अस्त्रैरुपात्तमषिभिः’ आँखों में आँसू आ गये और काजल जो लगाया हुआ था वह कपोल पर बहने लगा। और जो मन में आनन्द था उसकी जगह अब दुःख छा गया। बेहोशी होने लगी, अपने होश खो बैठीं। ये बेहोशी का चिह्न नहीं है, प्रेयसी का चिह्न है। श्रीकृष्ण से मिलन की तीव्र आकांक्षा। बोलना बन्द हो गया। आनन्द की जगह दुःख छा गया आँखों में आँसू आ गये, श्रृंगार बह गया, पाँवों से धरती खोदने लगीं, होंठ सूखने लगे, लम्बी-लम्बी श्वास चलने लगी, मुँह लटक गया। ये गोपियों की दशा हुई।
जब कृष्ण ने कहा कि लौट जाओ, तो गोपियों के मन में आया कि श्यामसुन्दर, मुरलीमनोहर, पीताम्बरधारी, जो हमारा परम प्रियतम है, उसका स्वभाव तो बड़ा कोमल है, हमारे हृदय में उसके लिए जितना प्रेम है उससे भी हजारगुना, लाखगुना, करोड़गुना, प्रेम उसके हृदय में है; आज यह इतना कठोर क्यों हो रहा है? इसमें उसका दोष तो नही हो सकता, हमारा ही दुर्भाग्य है, हमारी ही बदकिस्मती है, कोई न कोई दोष हमारा ही होगा। तब क्या करना चाहिए? एक ने कहा- आओ इसका पाँव पकड़ते हैं, दूसरी ने कहा- नहीं सखी पाँव मत पकड़ो, किसी भी तरह शिर ऊपर उठाओ, आँख से आँख मिलेगी तो मुस्कुरा देगा। तीसरी बोली- आओ, प्रतिव्रतम् करें। अरे, जब यह बोलने पर उतारू है, तो हम भी बोल लें, अथवा यह जब हमारे साथ कटुबर्ताव बरत रहे हैं तो हम भी कटुता बरतें, आओ, व्रज में लौट चलें। देखो, फिर ये दौड़कर हमको मनाते हैं कि नहीं मनाते। पता तो चल जाय कि उनके दिल में क्या है? एक ने कहा प्राण ही त्याग दें! उनके सामने प्राण त्याग करें, अथवा इनको परोक्ष में त्याग करें?
कहीं ऐसा तो नहीं है कि इसने हमको टकराया हो? क्या हम किसी दूसरी तरह की तो नहीं लग रही हैं? एक गोपी कहती हैं कि बात ऐसी तो नहीं है। क्या फर्क पड़ गया हमारे? भाई! सोच-समझकर कदम उठाना चाहिए कि हमको क्या करना चाहिए। इतनी कठोर वाणी सुनने के बाद भी हम जिन्दा रहती हैं या नहीं- क्या यह देखने के लिए ऐसी बात करते हैं? आज मालूम होता है हमारे मुख पर जो सौन्दर्य-माधुर्य रहता है था वो आज नही है। उसी को देखकर रीझ जाते थे, प्रसन्न हो जाते ते। आज क्या हो गया? आज हमने अपना मुँह ही कहाँ देखा?
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 5 : कर्मयोग – कृष्णभावनाभावित कर्म
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श्लोक 5 . 19
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इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः |
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः || १९ ||
इह – इस जीवन में; एव – निश्चय ही; तैः – उनके द्वारा; जितः – जीता हुआ; सर्गः – जन्म तथा मृत्यु; येषम् – जिनका; साम्ये – समता में; स्थितम् – स्थित; मनः – मन; निर्दोषम् – दोषरहित; हि – निश्चय ही; समम् – समान; ब्रह्म – ब्रह्म की तरह; तस्मात् – अतः; ब्रह्मणि – परमेश्र्वर में; ते – वे; स्थिताः – स्थित हैं |
भावार्थ
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जिनके मन एकत्व तथा समता में स्थित हैं उन्होंने जन्म तथा मृत्यु के बन्धनों को पहले ही जीत लिया है | वे ब्रह्म के समान निर्दोष हैं और सदा ब्रह्म में ही स्थित रहते हैं |
तात्पर्य
जैसा कि ऊपर कहा गया है मानसिक समता आत्म-साक्षात्कार का लक्षण है | जिन्होंने ऐसी अवस्था प्राप्त कर ली है, उन्हें भौतिक बंधनों पर, विशेषतया जन्म तथा मृत्यु पर, विजय प्राप्त किए हुए मानना चाहिए | जब तक मनुष्य शरीर को आत्मस्वरूप मानता है, वह बद्धजीव माना जाता है, किन्तु ज्योंही वह आत्म-साक्षात्कार द्वारा समचित्तता की अवस्था को प्राप्त कर लेता है, वह बद्धजीवन से मुक्त हो जाता है | दूसरे शब्दों में, उसे इस भौतिक जगत् में जन्म नहीं लेना पड़ता, अपितु अपनी मृत्यु के बाद वह आध्यात्मिक लोक को जाता है | भगवान् निर्दोष हैं क्योंकि वे आसक्ति अथवा घृणा से रहित हैं | इसी प्रकार जब जीव आसक्ति अथवा घृणा से रहित होता है तो वह भी निर्दोष बन जाता है और वैकुण्ठ जाने का अधिकारी हो जाता है | ऐसे व्यक्तियों को पहले से ही मुक्त मानना चाहिए | उनके लक्षण आगे बतलाये गये हैं |
