!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 134 !! Part 1 & 2 : Niru Ashra

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] Niru Ashra: 🍁🙏🍁🙏🍁

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 134 !!

“कीर्ति मैया और श्रीवृषभान” – कुरुक्षेत्र जानें की तैयारी
भाग 1

🦚🌻🌻🌻🦚

सुनिये ! क्या आपको पता है पूरा वृन्दावन कुरुक्षेत्र जा रहा है ?

बरसानें की महारानी श्रीकीर्ति नें अपनें पति वृषभान जी से पूछा था ।

धीमी आवाज में बृषभान जी नें कहा ……..हाँ रानी ! मुझे पता है ……नन्दराय नें मुझे कल ही सूचना दी थी ।

फिर क्या सोचा है आपनें ? कीर्ति रानी नें फिर पूछा ।

क्या सोचना ? सब जायेंगें कुरुक्षेत्र …….श्रीदामा जाएगा …….उसका सखा सौ वर्ष बाद मिलनें वाला है………..बरसानें की सब गोप कन्याएं , गोप सब जायेंगें ………और हमारी लाडिली राधा भी जायेगी ।

बृषभान जी नें लगभग सारी बात ही कह दी थी ।

क्या हम नही जायेंगें ? कीर्तिरानी नें शान्त भाव से पूछा ।

तुम जा सकती हो ……अगर जाना चाहो तो ……..पर मैं नही जाऊँगा ।

वृषभान जी नें ये क्या कह दिया था……कीर्तिरानी चकित हो गयीं !

क्यों ? आप ऐसा क्यों कह रहे हैं ? क्या आपको इच्छा नही होती कि उस नीलमणि के दर्शन करें ……….सौ वर्ष हो गए हैं ……..

मैने कब मना किया तुम्हे जानें के लिये ….जाओ ना कीर्तिरानी !

पर मैं नही जाऊँगा …………वृषभान जी नें फिर मना किया ।

मत जाइए ………ठीक है मत जाइए ……..पर क्यों नही जाना चाहते ?

वृषभान जी कुछ नही बोलते हैं ……..बस कोने में जाकर अपनें आँसुओं को पोंछ लेते हैं …………पर बोलते कुछ नही हैं ।

हे वज्रनाभ ! मुझे तो कभी कभी लगता है ……इस बरसानें की भूमि से ही ……..प्रेम का निःस्वार्थ रूप जगत नें देखा हैं ।

ना ! ना वज्रनाभ ! मात्र ये निःस्वार्थ भाव, श्रीराधारानी में ही नही…..उनके पिता वृषभान जी…….उनकी माँ कीर्तिरानी ……और बरसानें की सखियाँ………बरसानें का कण कण निःस्वार्थ प्रेम की सुगन्ध से महका रहता है………ये भूमि है ही ऐसी ।

महर्षि शाण्डिल्य नें वज्रनाभ को समझाया ।


क्यों नही जायेंगें आप ?

कभी तेज़ आवाज में बोलीं नही थीं ये कीर्तिरानी …….पर आज थोड़ी आवाज में तेज़ी थी ।

बताइये ना ! कहते हैं पूरा संसार जा रहा है कुरुक्षेत्र स्नान करनें के लिये ………..ठीक है ना ! आपको श्याम सुन्दर से मतलब नही तो कोई बात नही …….पर पुण्य की दृष्टि से भी तो बहुत महिमा है सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र स्नान की ।

कीर्तिरानी के मुख से ये सब सुनते ही ………….हिलकियों से रो पड़े वृषभान जी ………….कीर्तिरानी ! तुम्हे क्या लगता है ……श्याम सुन्दर को देखनें की मेरी इच्छा नही होगी ? मेरी लाडिली का जो प्राण है …….उसे निहारनें की मेरी इच्छा नही होगी ? आज सौ वर्ष हो गए ……मैने तिल तिल घुटते हुए देखा है अपनी लाडिली को ………अभी भी देख ही रहे हैं हम सब …………वो नटखट …….वो प्यारा साँवरा …….किसे प्रिय नही होगा कीर्ति !

क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –

🌲 राधे राधे🌲
Niru Ashra: 🍁🙏🍁🙏🍁

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 134 !!

“कीर्ति मैया और श्रीवृषभान” – कुरुक्षेत्र जानें की तैयारी
भाग 2

🦚🌻🌻🌻🦚

क्यों नही जायेंगें आप ?

कभी तेज़ आवाज में बोलीं नही थीं ये कीर्तिरानी …….पर आज थोड़ी आवाज में तेज़ी थी ।

बताइये ना ! कहते हैं पूरा संसार जा रहा है कुरुक्षेत्र स्नान करनें के लिये ………..ठीक है ना ! आपको श्याम सुन्दर से मतलब नही तो कोई बात नही …….पर पुण्य की दृष्टि से भी तो बहुत महिमा है सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र स्नान की ।

कीर्तिरानी के मुख से ये सब सुनते ही ………….हिलकियों से रो पड़े वृषभान जी ………….कीर्तिरानी ! तुम्हे क्या लगता है ……श्याम सुन्दर को देखनें की मेरी इच्छा नही होगी ? मेरी लाडिली का जो प्राण है …….उसे निहारनें की मेरी इच्छा नही होगी ? आज सौ वर्ष हो गए ……मैने तिल तिल घुटते हुए देखा है अपनी लाडिली को ………अभी भी देख ही रहे हैं हम सब …………वो नटखट …….वो प्यारा साँवरा …….किसे प्रिय नही होगा कीर्ति !

फिर चलिये ना कुरुक्षेत्र !

कीर्तिरानी नें अपनें पति के आँसू पोंछते हुए कहा ।

नही कीर्ति ! नही ……..नन्दराय जी को जाना चाहिये ……यशोदा भाभी को भी अपनें लाला को देखनें जाना ही चाहिये ……….

पर कीर्ति ! सब वृन्दावन से चले जायेंगें तो इस “वन वैभव” की रक्षा कौन करेगा …..हमारे भरोसे ही तो वो द्वारिका में निश्चिन्त बैठा है ना ।

अरे ! काहे का वन वैभव ? कीर्तिरानी कुछ कहनें जा रही थीं ।

पर वृषभान जी नें उन्हें रोक दिया ।

समझो कीर्ति ! सब चले जाएंगे तो कौन देखेगा इस वृन्दावन को ?

हम वनवासी हैं मूल रूप से …….हम “नागरी सभ्यता” वाले लोग नही हैं …..वन वासी हैं हम …….इसलिये मात्र अपना स्वार्थ देखना ये हमारे लिये उचित नही होगा ……श्याम सुन्दर को निहारनें की इच्छा किसे नही होगी ? पर इस वृन्दावन के बारे में तो कुछ सोचो !

यहाँ के वन्य जीव, यहाँ के लता पत्र ……यहाँ के सरोवर ….अन्य कृषि कार्य ……..ये कौन देखेगा कीर्ति ?

क्रमशः …
शेष चरित्र कल –

🌲 राधे राधे🌲

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