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August 30, 2025 2:13 am

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કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

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!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !! ( “सिद्धान्त सुख” – 6 & 7)

!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !! ( “सिद्धान्त सुख” – 6 & 7)

Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!

( “सिद्धान्त सुख” – 6 )

गतांक से आगे –

हे रसिकों ! निकुँज रस प्राप्ति कैसे हो इस ध्येय को लेकर ही हम चल रहे हैं । महावाणी के जो रचयिता हैं श्री श्री हरिव्यास देव जी , जिनका निकुँज में सखीरूप “हरिप्रिया सखी” के नाम से है ….महावाणी रस का आदि ग्रन्थ है ….ऐसा रस ग्रन्थ लिखा नही गया है ….इसमें जो “सिद्धान्त सुख” है …वो “रस सिद्धान्त” का ही मार्ग हमें बताता है …इस मार्ग में कैसे चलना है , क्या क्या कठिनाइयाँ आएँगीं ….और हमें क्या करना होगा । इसके अलावा निकुँज की क्या स्थिति है …..वहाँ कैसे सखियाँ सेवा में हैं …..सखियों का कैसे विभाग होता है निकुँज में …..इन सबका वर्णन है । और स्पष्टता से वर्णन है । रस साधकों को लाभ हो …इसलिए मैं इसे लिखने बैठा हूँ और कोई बात है नही । कल एक साधक , डाक्टर साहब हैं मेरे पास आते रहते हैं भावुक हैं और विशेष निम्बार्क संप्रदाय के अनुयायी हैं ….उन्होंने मुझे कल ही पूछा था ….महावाणी में पाँच सुख हैं ….सेवा सुख , उत्साह सुख , सुरत सुख , सहज सुख और सिद्धान्त सुख । उनका प्रश्न ये था कि – महाराज ! अन्यान्य ग्रन्थों में सिद्धान्त पहले होता है फिर ग्रन्थ के अन्य विषय होते हैं । किन्तु यहाँ ग्रन्थ का विषय पहले लिया गया है और सिद्धान्त बाद में ..ऐसा क्यों ?

मेरा मत ये है कि …रस मार्ग में चलना आवश्यक है …बाकी सिद्धान्त रस का क्या होगा ? रस तो पीने की वस्तु है …जैसे जल पीना आवश्यक है …हाइड्रोजन और ओक्सीजन , एच , टू , ओ , का फ़ार्मूला जानना ज़रूरी नही है …इसलिए श्रीश्री हरिव्यास देव जू ने पहले सिद्धान्त न रखकर सीधे “सेवा सुख” का रस पिलाया । क्यों की इस मार्ग के पिपासु के लिए रस ही प्रथम आवश्यक था, है ।

किन्तु बाद में श्रीश्री हरिव्यास देव जू को लगा होगा कलि के लोग बुद्धि के माध्यम से भी इस रस को समझना चाहेंगे इसलिए उन्होंने अन्तिम में “सिद्धान्त सुख” को रखा । ये मेरे विचार हैं बाकी रसिक समाज क्या कहता है , वो जानें । अस्तु ।

आप लोगों ने कल तक पढ़ा , जाना की श्रीवृन्दावन ही निकुँज है …काम बीज , क्लीं …ही इस निकुँज तक पहुँचने का माध्यम हो सकता है ….वैसे कृपा साध्य है ये श्रीवृन्दावन । जड़ नही चिद है वृन्दावन , ये कब से कब तक है ये बात कोई नही जानता यानि ये अनादि काल से है और अनादि काल तक । वराह पुराण में भी आता है कि पृथ्वी को लाते समय जब सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जल मग्न था उस समय पृथ्वी को श्रीवृन्दावन के दर्शन बराह भगवान ने कराए थे….और ये भी कहा है कि सृष्टि और प्रलय का श्रीवृन्दावन पर कोई प्रभाव नही होता ।

ऐसे दिव्य निकुँज यानि श्रीवृन्दावन का वर्णन हमने कल सुना , पढ़ा ..अब आगे उस श्रीवृन्दावन की भूमि कैसी है ? लता-वृक्ष कैसे हैं ? पक्षी आदि कैसे हैं ? इन सबका वर्णन अब यहाँ हो रहा है ।

आप ये पूछ सकते हो कि ….ये क्या है ? इन पक्षी लता-वृक्ष के वर्णन का हम क्या करें ?

ये ध्यान करने के लिए है ……यहाँ जो वर्णन है वो सिर्फ ध्यान के लिए है ….रस साधक इसको पहले अच्छे से समझ लें , फिर इसका ध्यान करें ।


|| दोहा ||

दिव्य कनक अवनी बनी, जटित मनी बहुभाँति ।
अति विचित्रता सों ठनी, रवनी कवनी काँति ॥

॥ पद ॥

दिव्य कंचनमयी अवनि रवनी । जटित मनि बिबिधि बर चित्रकवनी ॥
बिमल वृक्षन की सोभा बनि सार । पेड़ मनि नील तो हरितमनि डार ॥
पत्र मनि पीत फल अरुन अनुकूल । मधुर सौरभ सुभग सुरंग रंग फूल ॥
बहुत दुम ऐसें रहि जिनकी छबि छाय। फूल फल मूल साखादि बहुभाय ॥
सबहिं आभासि रहे रँग नाना। मनहरन रम्य को कोटि भाना ।।
अतिहि रसीली रही रँग रेली। ललित वृक्षन सों लपटाय बेली ॥
बहुत कै लत्तिका उर्ध्व गवनी। बहुत कै भूमि परि सरित रवनी ।।

*तुम नेत्र बन्द करो ….और इस दिव्य श्रीवृन्दावन के दर्शन करो । विपिन राज की ये जो भूमि है कंचनमयी है ….चमकीली है ….कोमल है ….सुगन्धित है ….और ..मुस्कुराती हुई हरिप्रिया बोलीं ….मादक भी है ये भूमि ….जो भी यहाँ आएगा …वो मत्त हो जाएगा ….वो सब कुछ भूल जाएगा ….इसलिए ये भूमि धतूरे के समान मतवाला बना देती है जो भी यहाँ आए उसे ।

हरिप्रिया ये कहते हुए मुझे फिर अपने नेत्र खोलने के लिए कहती हैं …जब मैं नेत्र खोलता हूँ सामने मेरे दिव्य श्रीवृन्दावन है …..ओह ! वही भूमि , कंचनवत् । मैंने देखा चारों ओर ….वन हैं , उपवन हैं ….पुष्प वाटिका है ….अनेक मार्ग हैं …वो सब मार्ग मणि जटित हैं …मार्ग के निकट निकट सरोवर हैं …अत्यन्त सुन्दर सुन्दर सरोवर हैं । सरोवर के पास पास महल हैं ….उस महल की शोभा कौन कह सकता है । मैं चकित था …मैं विस्मय में पड़ गया था ….श्रीवन की जो भूमि थी उसमें चित्रकारी हो रही थी ……चित्रकारी ? हरिप्रिया हंसीं ….वो मेरे मन को पढ़ रही थीं ….मैंने चित्रकारी शब्द का प्रयोग किया था । तब मुझे सफाई देनी पड़ी …तो क्या कहूँ ? इस भूमि पर जो वृक्ष लताएँ हैं , सरोवर हैं , नहर हैं , महल हैं , मणिमण्डप है ….ये सब ऐसा लग रहा है जैसे – सच में ही किसी चित्रकार ने चित्रकारी की हो , अद्भुत अनुपम । मेरी बात सुनकर हरिप्रिया जोर से हंसीं । फिर मुझ से बोलीं ….इन वृक्षों को देखा ? वृक्षों से लिपटी लताओं को ? आश्चर्य ये था कि ….सखी जी जो जो देखने के लिए कह रही थीं वो दिव्य होता जा रहा था …जैसे – अब उन्होंने कहा था …वृक्ष-लताओं को देखो …मैंने जैसे ही देखा वो अपने दिव्य रूप में आगया था । दर्पण के समान वृक्षावलियाँ थीं ….उन वृक्षों का तना नीलमणि के समान था ….और शाखायें हरित मणि के समान । फूल सुगन्धित , सुन्दर , और सुरंगित भी थे । उन फूलों से जो सुगन्ध का प्रसार हो रहा है उससे निकुँज महक उठा था । फल कैसे लगे थे वृक्षों में ? जैसे अरुण मणि के समान हों …शोभा सुन्दर लग रही थीं । ऐसे ही प्रत्येक फल रंग विरंगे थे वहाँ …किन्तु एक रंग दूसरे रंग का सहायक लग रहा है …ये अद्भुत बात थी ।

अब मेरी दृष्टि गयी लताओं पर ….इनकी सुन्दरता तो देखते ही बन रही थी ….रस पूर्ण लताएँ वृक्षों से लिपटी हुयी थीं …उन लताओं को देखकर लग रहा था कि जैसे – प्रेयसी अपने प्रियतम से लिपट गयी हो । अरे ! ये क्या है ? मुझे ये आश्चर्य लगा कि ….वृक्ष से लिपट कर लता ऊपर की ओर जा रही हैं ….और देखते देखते ही दूसरा कुँज भी तैयार कर दिया था इन लताओं ने । तब मुझे लगा कि यहाँ की लताएँ भी चेतन हैं ….यहाँ का सब कुछ चेतन है । सब यहाँ सखी हैं ….ये कहो ना ! हरिप्रिया की बात सुनकर मैं प्रसन्न हुआ था …हाँ , यहाँ सब कुछ सखी है । मैं बहुत हंसा …अब आनन्द जो बढ़ता जा रहा था । अच्छा , अब आप जानना चाहोगे कि लताएँ कुँज का निर्माण क्यों कर रही थीं ? तो सुनो …युगल की इच्छा के लिए …ये बात मुझे हरिप्रिया ने बताई थी । अब सुनो , कुँज का निर्माण कैसे हो रहा था । वृक्षों से लिपटी लता ऊपर जा रही थी और ऊपर जाते जाते वो दूसरे वृक्ष को ऊपर से पकड़ लेती …फिर वितान बन जाता …छा जाती दोनों वृक्षों के बीच में ….ऐसे वहाँ कुँज बन रहे थे । बीच में दीवार भी लताओं की ही थी ….और दीवार बनाते समय रंध्र भी लताएँ छोड़ रहीं थीं उसमें झरोखे बन रहे थे । मैंने ये भी देखा कि ….कुँज के भीतर पुष्पों की चित्रकारी भी लताओं के द्वारा ही की जा रही थी ….बहुत दिव्य था ये सब । ये सब कुँज थीं लताओं की …किन्तु इतनी चतुराई से बनाया गया था कि मणिमय लग रहा था । मैंने देखा ….श्रीवन के पुष्पों से रंग बह रहे थे …और वो बहते हुए कुँज की भूमि में जाकर फैल जाते इसी से फर्श का निर्माण हो रहा था । और उसी समय उसी फर्श पर पलंग का भी निर्माण हो रहा था ….उसमें फूलों की शैया बिछाई गयी थी …ये सब लताओं के द्वारा ही हो रहा था …इसलिए हरिप्रिया सखी इन्हें “लता सखी” कहकर सम्बोधन कर रहीं थीं ।

पलंग के नीचे एक चौकी बना दी थी …जिसमें युगल अपने चरण रखते । एक चौकी और थी जो सिरहाने की तरफ थी …उसमें यमुना जल से भरी झारी रखी गयी थी जल पीने के लिए । सामने एक बड़ी चौकी थी जिसमें फूलों की डलिया और एक डलिया में फल आदि रखे थे ।

मैंने देखा – लताएँ पाँवड़े बिछा रहीं थीं …..युगलवर जब वन विहार करके आयेंगे तब वे इन पुष्पों में चरण रखते हुए पर्यंक पर विराजेंगे …और जैसे ही युगलवर विराजें तभी लताएँ वृक्षों पर चढ़ देवताओं की तरह ऊपर से पुष्प बरसाने लगतीं ..झुक कर फल आदि देतीं । ये सखियाँ हैं लताएँ ….इनकी सेवा देखकर मेरा मन आनन्द से भर गया था ….इनके विषय में क्या लिखूँ ! ये श्रीवृन्दावन की लताएँ हैं जो चिद हैं ,और आनन्द स्वरूप हैं ।

हरिप्रिया सखी जू ने मेरे सिर में हाथ रखा था । दिव्य श्रीवृन्दावन का ऐसा दर्शन कर और हरिप्रिया सखी जू का स्नेहासिक्त कर कमल अपने सिर में पाकर मैं भी रसोन्मत्त हो गया ।

शेष अब कल –
Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!

( “सिद्धान्त सुख”- 7 )

गतांक से आगे –

कंकनाकार सौढार सरिता । बहति अति सुरस सिंगार भरिता ।।
रंग नाना तरंगें सुपुंजें। कमल-कुल लुब्ध अलि करत गुंजें ॥
हंस सारस चक्रवाक मोरा। कोकिला कीर चातिक चकोरा ॥
आदि कारंड कल सुर रसाला। रटत बर जुगल की नाम माला ॥
उभै तट रत्न बद्धित विराजैं। तिन उपरि तरुन की सुछबि छाजैं ॥
झुकि रही डार फल फूल भारें। परसि बारिहिं बिहारें अपारै ॥
परति नहिं कही बन बनिक जोहैं। अतिहिं सोभा की सोभा बिमोहैं ॥
आपुहीं लुभि रहे दोउ प्यारे । छिनहुँ तहँ तें न है सकहिं न्यारे ॥

हरिप्रिया सखी जू के कर कमल का मेरे सिर में रखना क्या हुआ ….मेरे हृदय में तो प्रेम का दिव्य प्रकाश हो गया , मुझे अत्यन्त रोमांच हो रहा था …तब हरिप्रिया सखी ने हंसते हुए मुझे यमुना जल पान करने के लिए कहा , मैं झुका ….आहा ! निर्मल , अत्यन्त निर्मल , परम पवित्र …यमुना जल !

“गंगा जी के प्राकट्य का इतिहास तो मुझे पता है, किन्तु यमुना जी का प्राकट्य कैसे हुआ”?

मेरे इस प्रश्न को सुनकर हरिप्रिया सखी ने मुझे वो आदि प्रसंग सुनाया जिसमें यमुना जी के प्राकट्य की कथा थी ।

“समय काल मैं बता नही सकती …क्यों की ये “नित्य विहार” कालातीत है ।
एक समय प्रिया प्रियतम विहार कर रहे थे …उनकी सुरत केलि रस रंग से भरी थी ….रति ने अपनी उन्मत्तता दिखाई तो उसी रस में युगल वर खो गये …हरिप्रिया सखी मुझे यमुना जी के प्राकट्य की कथा बता रहीं थीं । मैं भी वहीं यमुना जी के तट में बैठ गया था और बड़े प्रेम से सुन रहा था ।

सुरत केलि के रंग में रंगे युगलवर रस मत्त हो उठे थे ….प्रिया जी विपरीत रति में डूबी थीं ….किन्तु प्रिया जी की उन्मत्तता देखकर लाल जी ने ही सम्भाला …..फिर दोनों आलिंगन बद्ध हो गये ।

श्रीरंगदेवि जू ने उस “रति केलि कुँज” में प्रवेश किया तो देखा – सामने प्रिया जी बैठी हैं और अपने पीताम्बर से लाल जी उनके स्वेद बिन्दु ( पसीना ) पोंछनें जा रहे हैं ….प्रिया जी को “लीला विलास”में अति श्रम हो गया इसलिए इनके पसीने बह चले थे ….और अब इन कोमालांगी के पसीने उनके प्रियतम पोंछने जा रहे थे ….उस पसीने की सुगन्ध से पूरा निकुँज महक रहा था …सुगन्ध मादक थी …..उस सुगन्ध के फैलने से यत्र तत्र जितनी सखियाँ थीं सब सेवा छोड़कर प्रिया जी के पास आगयीं थीं । लाल जी पसीने पोंछने जा ही रहे थे कि – हे स्वामिनी ! हमारी एक प्रार्थना आप मान लो ….रंगदेवि सखी ने आगे बढ़कर प्रिया जी से प्रार्थना की । प्रिया जी ने लाल जी को रोक दिया और सखी की ओर देखते हुए कहा ….क्या कहना है सखी ! कहो ।

ये स्वेद जो आपके सुन्दर देदिव्य भाल पर झलक रहे हैं …हे स्वामिनी ! ये परम पवित्र हैं …शायद इनसे पवित्र और कुछ नही ….क्योंकि ये लाल जी और आप के लीला विलास श्रम से उत्पन्न हैं….क्या अच्छा न होगा कि इस प्रेम बिन्दुजल का लाभ हम सबको मिलता । हरिप्रिया यहाँ कुछ देर के लिए मौन हो जाती हैं …फिर मुझे बताती हैं । श्रीरंगदेवि सखी की बात सुनकर प्रिया जी मुसकुराईं ….और लाल जी की ओर देखा ….प्यारे ! क्यों न एक प्रेम सरिता प्रवाहित हो ?

जय हो , जय हो , जय हो ….

अनन्त सखियाँ प्रिया जी की उदारता करुणा देखकर आनंदित हो उठीं थीं….और देखते ही देखते प्रिया जी ने प्रेम सरिता अपने श्रम बिन्दु से प्रकट कर दिया था ।

उस समय श्रीरंगदेवि जू ने …..उस सरिता में तुरन्त अवगाहन करते हुए कहा ….इस सरिता में जो नहाएगा , आचमन करेगा , जल का सिंचन करेगा …उसे पराभक्ति की सहज प्राप्ति हो जाएगी । और यही प्रेम सरिता “यमुना जी” कहलाईं । ये सखी हैं ….यमुना सखी …युगल की विशेष प्यारी हैं ….ये कहते हुए फिर हरिप्रिया सखी ने यमुना जल का सिंचन अपने ऊपर किया था ।

मैं तो आनन्द में डूबा था ….”यमुना जी”…हाँ , तुम नाम भी लो तो भी तुम्हारा अंतःकरण पवित्र हो जाएगा ….ये यमुना जी हैं । मैं निहारता रहा ……यमुना जी को ….नीला जल ….मैंने फिर जल का पान किया , सच में प्रेम जल है ये । प्रिया जी का प्रेम जल ।

फिर कलिंद नन्दिनी कह कर “कालिन्दी” क्यों कहा गया यमुना जी को ?
मैंने ये प्रश्न भी किया था ।

क्लीं …यानि काम बीज यानि प्रेम बीज ही कलिंद पर्वत है …क्या प्रेम के परिणाम से ये कालिन्दी प्रकटीं नहीं हैं ? और हाँ ….देखो ! हरिप्रिया सखी ने मुझे बताया …..काम बीज यानि कलिंद पर्वत से निकलीं हैं यमुना जी , और अष्ट दल कमल के समान ये श्रीवृन्दावन है ….ये यमुना जी काम बीज से निकल कर अष्टदल कमल रूप श्रीवन की परिक्रमा करती हुई चलती हैं । मैं हरिप्रिया जी की बात सुनकर आनन्द विभोर हो गया था । क्या अद्भुत कालिन्दी के प्राकट्य की कथा सुनाई थी मुझे सखी जू ने ।

अब मैंने ध्यान से देखा …..प्रेम जल हैं ये तो यमुना जी , प्रिया जी के भाल से प्रकटीं हैं …ये बात आते ही मेरे मन में और भाव का वर्धन होने लगा था …मैंने मत्त होकर अंजलि में भर भर कर उस प्रेम जल का पान किया ।

देखो , ये कंगन के आकार की हैं ना ? सखी जू मुझे दिखा रही थीं ।

हाँ , किन्तु ये कैसे ? मैंने ये भी पूछ लिया ।

जब श्रम बिन्दु से प्रिया जी यमुना प्रकट कर रही थीं तो उनका कंगन भाल में लग रहा था …बस प्रिया जी के कंगन का आकार बनी यमुना जी । ये बात मेरी तब समझ में आयी जब हरिप्रिया जी ने मुझे ये कहकर चुप कराया कि …मैंने तुम्हें पूर्व में बताया है कि यहाँ कोई जड़ नही हैं …न कंगन न यमुना जी । कंगन भी नही ? नही , “प्रिया जी के आभूषण भी प्रिया जी ही हैं”… हरिप्रिया सखी ने ये बात जोर देकर कही थी ।

मैंने अब यमुना जी की शोभा को निहारना आरम्भ किया था ….कंगन के आकार की यमुना जी …निकुँज की परिक्रमा कर रही हैं ….”उनका मंगलमय शृंगार है”…( ये बात मैं कैसे समझाऊँ आपको ) हाँ सुनिए अब ……यमुना जी के तट में कमल पुष्पों की भरमार है ….एक रंग के कहाँ हैं ये पुष्प …भिन्न भिन्न रंग हैं सबके । इतना ही नही ….मैं चकित तब रह गया , जब कमल हर रंग के तो थे ही …किन्तु कोई अष्टदल कमल थे तो कोई त्रिकोण कमल थे …कोई षट्कोण कमल भी थे …इन सब रंग बिरंगे कमलों को देखकर आपको भी लगेगा कि यमुनाजी ने शृंगार किया है ।

अच्छा , प्रत्येक कमल में भौंरों का झुण्ड था …ये लोभी भ्रमर रस पीने के लिए कमल पर टूट पड़े थे …उनकी गुंजार संगीत का भान करा रही थी । मैंने दर्शन किए …कमलों के रंग यमुना पर पड़ रहे थे, जिससे यमुना के जल की शोभा रंगीन हो उठी थी , यमुना की तरंगे रंग से भर गयीं थीं ।

और मैं आह्लाद से भर गया था ।


हंस , सारस , चक्रवाक , मोर , कोयल , तोता ,चातक , चकोर …..

ये सब पक्षी कलरव कर रहे हैं …मोर तो नाच रहें हैं …तोता यमुना के तट पर खड़े वृक्षों में बैठकर गा रहे हैं …कोयल गा रही है …क्या गा रहे हैं ये सब ? हरिप्रिया ने हंसते हुए कहा …सुनो । मैंने सुना तो आनन्द आगया …सब गा रहे थे …युगल नाम मन्त्र…..

राधे कृष्ण , राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे ।
राधे श्याम राधे श्याम श्याम श्याम राधे राधे ।।

इन सबका उद्देश्य है ….”प्रिया प्रियतम को सुख पहुँचाना”।

अब मेरा ध्यान फिर गया ….यमुना के तट में …..दोनों तट मणि माणिक्य से भरे थे …वो चमक रहे थे …अद्भुत चमक थी उन सबकी । घाट थे सुन्दर सुन्दर …वो घाट भी मणियों से बने हुए थे …मुझे हरिप्रिया सखी ने बताया कि यही घाट है ….जहाँ युगल सरकार का स्नान होता है …मैंने देखा उस घाट पर स्वर्ण अक्षरों से लिखा भी था …”युगल घाट”। मैंने देखा …युगल घाट की जो सीढ़ियाँ थीं पंचरंगी मणि से निर्मित थीं ….वो चमक भी रही थीं ….घाट में जो बुर्जियाँ थीं उनकी तो शोभा ही अलग । वृक्षावलियाँ इतने घने और बड़े बड़े थे …कि उनकी लताएँ यमुना को छू रही थीं ….हवा जब चलती रहे ….उससे यमुना जल में कंपन हो जाता ….वो बड़ा ही सुंदर लगता ।

कैसा लगा श्रीवृन्दावन ? हरिप्रिया जी ने मुझ से पूछा ।

“अनिर्वचनीय”…..मैं इतना ही बोला ।

देखो …..श्रीहरिप्रिया के कहने पर जब मैंने सामने देखा तो एक सुन्दर युवती अवनी पर दृष्टि गढ़ाए खड़ी है । ये कौन है ? मैंने पूछा तो हरिप्रिया जी ने उत्तर दिया …ये सुन्दरता की देवि हैं …किन्तु श्रीवन की सुन्दरता देख कर लज्जित हो उठीं हैं ।

मैं कुछ नही बोला …क्या बोलता ….निकुँज बहुत सुंदर है …बहुत …मैं इससे ज़्यादा क्या कहूँ ? वर्णन करने की क्षमता मुझ में नही है । ओह ! “श्रीवृन्दावन” मैंने यही कहा था ।

शेष अब कल –

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