🙏🥰 #श्रीसीतारामशरणम्मम 🥰🙏
#मैंजनकनंदिनी…. 2️⃣2️⃣
भाग 3
( #मातासीताकेव्यथाकीआत्मकथा )_
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#देखतरामबिआहुअनूपा….._
【 📙 #रामचरितमानस 📙】
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#मैवैदेही ! ……………._
बस भोले भण्डारी तो हैं हीं श्री राम ………..मान लिये अपनें छोटे भाई की बात …..लम्बी डग भरनें लगे थे ।
अब कैसे लग रहे हैं ये दूल्हा राम !
…………छेड़नें के लिये पीछे से फिर दूसरी सखी नें कहा था …..।
सिया जू ! मैने तुरन्त कहा …..ऐसे लग रहे हैं ……..जैसे बकरा बन्धन से मुक्त होते ही भागता है …………।
रुक गए छोटे दूल्हा……….रघुनन्दन नें कहा भी तुम जितना ज्यादा इनके मुँह लगोगे …..ये उतना ही बोलेंगी …..लक्ष्मण ! चुप रहो ।
पर लक्ष्मण कहाँ माननें वाले थे …………….क्या कहा ? लाल लाल आँखें दिखा बोले ।
देखो लखन भैया ! यहाँ कोई परसुराम तो है नही ….जो डर जाएगा ……..यहाँ तुमसे कोई नही डरनें वाला ।
सिया जू ! मैने कहा ये सब लक्ष्मण भैया से ।
तो क्या तुम्हारे मन में जो आएगा वही कहोगी ? हद्द है !
लक्ष्मण भैया ! हमनें गलत तो कहा नही ……………….
हमनें यही तो कहा ………कि रघुनन्दन दूल्हा, तेज़ चाल में ऐसे लग रहे हैं ……जैसे बकरा बन्धन से छूट कर भागे ।
ये बकरा हैं ? लक्ष्मण जी गम्भीर होकर बोले थे ।
मै ही आगे थी.. ……तो मैने ही समझाया बड़े प्रेम से लक्ष्मण भैया को ………ये कहते हुये उर्मिला के पीठ में धीरे से हाथ मारते हुए चन्द्रकला बोली थी ………….
अच्छा बताओ लक्ष्मण जी ! बकरे का बेटा कौन होता है ?
ये क्या प्रश्न हुआ ? बकरे का बेटा बकरा ही होता है ……….लक्ष्मण जी नें उत्तर दिया ।
अच्छा ………..बकरे का पोता क्या होता है ?…………मैने हँसते हुए फिर पूछा …………
ये क्या प्रश्न है ? नाराज हो गए लक्ष्मण जी ।
उत्तर दीजिये ……….बकरे का पोता कौन होता है ?
बकरा ही होता है …………ये कोई पूछनें की बात है ! लक्ष्मण जी का उत्तर था ।
सिया जू ! मैने पूछा …………..आपके दादा जी का क्या नाम है ?
लक्ष्मण जी बोले ……अज !
अच्छा …..”अज” को संस्कृत में क्या कहते हैं ?
राम जी तुरन्त बोले ……………..इन सखियों से ज्यादा न उलझो ।
पर हम सखियाँ भी कम कहाँ थीं …………..
“अज” का अर्थ तो बताइये छोटे दूल्हा सरकार ?
बकरा …………यही है ना अज का अर्थ …..आपके दादा जी का नाम “अज”..है ना ! ….अच्छा जब दादा बकरा तो पोता भी बकरा …………….
यह सुनते ही सारी सखियाँ खूब हँसनें लगीं थीं ………।
इस बार तो मुझे भी हँसी आगयी थी …………..मै भी हँसी ……..
अच्छा ! फिर क्या हुआ ? मैने ही पूछा ………
अब तो सिया जू ! रघुनन्दन दूल्हा को भी गुस्सा सा आगया था ……ये तो बाप दादा सबको गाली दे रही हैं ……………
तो रघुनन्दन खड़े हो गए …….चलना बन्द कर दिया ………..बीच में ही खड़े हो गए …………….
मैने इस छबि को भर नयन निहारा ………आहा ! क्या लग रहे थे ।
पर सिया जू ! दूसरी सखी नें मुझे फिर छेड़ा ………
अब बताओ ……..ये खड़े कैसे लग रहे हैं ……?
मैने तुरन्त उत्तर दिया ………..ऐसे लग रहे हैं …..जैसे मध्य में नील मणि का कोई खम्भा गाढ दिया हो …………
हद्द है ……………आपको ससुराल यही मिली थी बनानें के लिए ?
छोटे दूल्हा नें बड़े दूल्हा से झुंझलाते हुए कहा ।
अब सुन ले भाई ! ………क्या करेगा ………..ससुराल है ……बोलोगे तो और सुनना पड़ेगा …..इसलिये चुप रहो । बड़े दूल्हा बोले थे ।
मेरी सखी बहुत चतुर है ……….हाँ मेरी सखी चन्द्रकला ………..
वो बोली ……सिया जू ! मुझ से अन्य मिथिला की प्रबुद्ध नारियों नें पूछा …..चैतन्य राम हैं…..राम चैतन्य हैं ……..पर खम्भा तो जड़ है …तुम चैतन्य की उपमा जड़ से दे रही हो ?
तुरन्त लक्ष्मण बोले ………इनकी बुद्धि जड़ है ….इन्हें क्या पता श्री राम कौन हैं …………ये क्या जानें ?
लक्ष्मण जी इतना बोल कर चुप हो गए थे ।
मैने कहा ……मै नही जानती ……मुझे और कुछ जानना भी नही है ……..
मै तो इतना जानती हूँ की जड़ और चैतन्य ….सब में यही राम हैं …..
क्या मेरी बात गलत है ? बोलो छोटे दूल्हा सरकार !
क्या चैतन्य में ही राम हैं ? …….जड़ में नही हैं ?
जड़ , चैतन्य सबमें राम ही तो हैं …………..सबमें राम ही तो समाये हैं ।
राम के सिवाय और है ही क्या !
मैने जैसे ही इतना कहा…….लक्ष्मण जी मुस्कुराये मुझे देखकर …..
मै भी मुस्कुराई उन्हें देखकर …………..
फिर बड़े दूल्हा सरकार यानि श्री रघुनन्दन मेरी और ही देख रहे थे ।
मै ज्यादा वहाँ खड़ी नही हो सकती थी…….क्यों की मेरे सामनें श्री राम थे…छैल छबीले दूल्हा श्रीराम !…और मुस्कुरा और रहे थे ….उफ़ ।
मै भाग के आगयी आपके पास …………अब तो मण्डप में चले गए होंगें ……..सिया जू ! तैयार हो जाइए …….कभी भी बुलावा आसकता है ।
मेरी सखी चन्द्रकला मुझे सजानें में लग गयी थी …………….
मै दुल्हन बन रही थी …..अपनें श्री राम की ……………
#शेषचरिञ_अगलेभागमें……….
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जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥
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Niru Ashra: भक्त नरसी मेहता चरित (37)
🌇🌸अमृत है हरि नाम जगत में,
इसे छोड़ विषय विष पीना क्या
हरि नाम नही तो जीना क्या
काल सदा अपने रस डोले
ना जाने कब सर चढ़ बोले*
भगवान श्रीकृष्ण ने नर्सिरूप धर विधि पूर्वक श्राद्ध सम्पन्न किया
*’भगवान के आज्ञा अनुसार घर पर श्राद्ध की सब सामग्री तैयार थी । भगवान श्राद्ध करने बैठ गये । भगवान का स्पर्श पाने मात्र से मूर्ख ब्राह्मण समस्त वेद-शास्त्र का प्रकण्ड विद्वान बन गया और उसने अत्यंत विधि पूर्वक श्राद्ध का काम पूरा कराया ।
जो भगवान ‘मूक करोति वाचालं पंगु लड़घयते गिरिम’ की शक्ति रखते हैं , उनके लिए इसमें आश्चर्य ही क्या था ?
श्राद्ध समाप्त हो जाने पर भगवान ने ब्राह्मण को पचास स्व॔ण मुद्राएँ दक्षिणा में दीं और बड़े आदर के साथ भोजन कराया । नागर-वेष धारी भगवान के अनुचरों ने समस्त नागर-जाति को बुलाकर अत्यंत प्रेम और आदर के साथ भोजन कराया , सबको एक एक स्वर्णमुद्र भी भेट की । सब लोग अत्यंत सन्तुष्ट हुये । इस प्रकार सँध्या समय तक भक्त राज का सारा कार्य समाप्त कर अपने अनुचरों के साथ भगवान अन्तर्हित हो गये ।’*
सारा कार्य समाप्त हो जाने पर अन्त में माणिकबाई प्रसाद पाने बैठी । ठीक इसी समय भक्त राज ने हाथ में घृत का पात्र लेकर घर में प्रवेश किया । वह अत्यंत देर हो जाने तथा श्राद्ध न करने के कारण मन ही मन संकुचित हो रहे थे । उन्हें देखते ही आश्चर्च के साथ माणिकबाई ने प्रश्न किया – “स्वामिन ! ब्राह्मण भोजन समाप्त करके आप यह क्या ला रहे हैं ?”
नरसीराम ने विस्मय से साथ कहा – “अरे तू क्या कहती है ? ब्राह्मण भोजन और श्राद्ध हो गया ? मैं तो प्रातःकाल ही जो घृत लेने के लिए गया सो अभी आ रहा हूँ । रास्ते में एक भक्त मिल गये , उन्हीं के यहाँ थोड़ा भजन करके मैं अभी आ रहा हूँ । इसी से मुझे देर भी हो गयी।”
चकित होकर माणिक बाई ने कहा – “तो फिर विधिवत श्राद्ध करके हजारों मनुष्यों को भोजन किसने कराया ? मैंने तो स्पष्ट देखा कि आप ही सब कुछ कर रहे हैं । आप मुझसे मजाक क्यों कर रहे हैं ।”
‘प्रिये ! मैं मजाक नहीं कर रहा हूँ ; मै तो अभी आ रहा हूँ ।
‘अवश्य ही यह सब मेरे प्रियतम श्री कृष्ण का कार्य हैं । मेरा स्वरूप बनाकर स्वयं मनमोहन ने ही मेरे धर्म की रक्षा की है । भगवान की कितनी महती दया है ।’
इतना कहते -कहते दोनों पति -पत्नी के नेत्रों से प्रेमाश्रु बरसने लगे । वे अत्यंत प्रेम प्रसाद ग्रहन करके दोनों पति-पत्नी मग्न होकर भगवद भजन करने बैठ गये.
सांवरो कन्हैया मेरो मन में वसो है,
मुरली बजाने वालो मन में वसो रे,
मन में वसो रे कान्हा तन में वसो रे,
कारो कन्हैया मेरो मन में वसो रे,
अरे तिर्शी नजरियां वालो मन में वसो रे,
माखन चुराने वालो मन में वसो रे ,
सांवरो कन्हैया मेरो मन में वसो है,
यमुना किनारे वो तो मुरली भजाये,
गोपियाँ संग वो तो रास रचाये,
मीठी मीठी तान सुनाये जग प्यारे,
अरे पीले पीताम्भर वारो मन में वसो रे,
सांवरो कन्हैया मेरो मन में वसो है,
गोकुल नगरिया में माखन चुराए,
वृन्दावन में वो रास रचाये मथुरा नगरियां को वो धीर बँधाये,
धेनु चराने वारो मन में वासो रे,
मधु को रिझाने वरो मन में वसो रे
सांवरो कन्हैया मेरो मन में वसो है,
क्रमशः ………………!
Niru Ashra: “ब्रह्मा द्वारा अपराध”
भागवत की कहानी – 36
ब्रह्मा ऊपर से उतर कर श्रीवृन्दावन आये हैं …ये बेचैन हैं ….चारों ओर देख रहे हैं ….ये क्या ! इन्हें यहाँ के वृक्ष स्वर्ग के कल्पतरु से भी श्रेष्ठ दिखाई दे रहे हैं …..यहाँ की भूमि परम पावन है …जहाँ तहाँ अवनी में भगवान के चरण चिन्ह छपे हैं । ब्रह्मा बैठ जाते हैं ….अब इन्हें थकान हो रही है …इन्हें डर है कि मेरे अपराध का दण्ड श्रीकृष्ण क्या देंगे ? ब्रह्मा को इतनी बेचैनी है कि कुछ देर के लिए वो अपनी आँखें बन्द कर लेते हैं …..मात्र आँखें बन्द करना ही समाधान नही था …वो फिर अपनी आँखें खोलते हैं ….और जब श्रीवृन्दावन को देखते हैं ….ओह ! ये है श्रीवृन्दावन ?
वृक्ष ब्रह्म हैं , वृक्ष के पत्ते ब्रह्म हैं …रज यहाँ की ब्रह्म है …पक्षी यहाँ के ब्रह्म हैं ….यमुना के रूप में ब्रह्म ही बह रहा है …..चारों ओर ब्रह्म ही ब्रह्म के दर्शन । तभी – भैया ! मनसुख ! श्रीदामा! मधुमंगल ! कहाँ गये तुम ? ओह ! ब्रह्मा अपनी आँखों से देख रहे हैं ….वही नन्हा सा कन्हैया हाथों में माखन लिए ….अपने सखाओं को खोज रहा है …..ब्रह्मा उसे देख रहे हैं ….नन्हा सा कन्हैया पूर्णब्रह्म है …..पूर्णब्रह्म परमात्मा ……कन्हैया ही पूर्ण ब्रह्म है ……ब्रह्मा चकित हैं …..वो देख रहे हैं …..तभी उधर से ग्वाल बाल ….कन्हैया ! कन्हैया ! कहते हुए दौड़े हुए आरहे हैं ….बछड़े भी उछलते हुए आरहे हैं …..ब्रह्मा के कुछ समझ में नही आरहा ….इन ग्वालों बछडों को तो मैं चुराकर अपने ब्रह्म लोक में ले गया था ….फिर ये यहाँ कैसे ? तभी ब्रह्मा को दिखाई देता है …सृष्टि का रहस्य । कन्हैया से जो बछडे मिल रहे थे ….ब्रह्मा ने देखा वो बछडे ब्रह्म हैं …..ग्वाले ब्रह्म हैं ….ग्वालों के हाथों में जो लाठी है वो लाठी ब्रह्म है …कन्हैया की पीताम्बरी ब्रह्म है , ब्रह्मा को सब कुछ ब्रह्ममय दिखाई देता है ….ब्रह्मा को चक्कर आरहे हैं “सुधि ब्रह्मा की सुधि बिसर गयी है”। किन्तु ब्रह्मा ने ऐसा किया क्या है ? क्या अपराध हो गया इनसे ? शुकदेव से परीक्षित ने प्रश्न किया ।
अपराध तो बहुत बड़ा है ….ब्रह्मा ने जो अपराध किया , उसे कन्हैया तो क्षमा कर ही नही सकता ।
श्रीकृष्ण से , श्रीकृष्ण के प्रेमियों को दूर किया ब्रह्मा ने ।
ये बहुत बड़ा अपराध है ….शुकदेव का कहना है । ये कन्हैया प्रेमी है ….इसे प्रेम ही प्रिय है …कर्मकाण्ड इसे कहाँ रुचता है । ये पहले प्रेम देखता है , शुद्धि अशुद्धि तो ये बाद में देखता है …और अगर प्रेम है …तो इसे शुद्ध अशुद्ध कुछ मायने नही रखते । अब सुनो ! हुआ क्या था ….शुकदेव सुनाने लगे ।
आज नभ में देवों का मेला लगा है …भगवान का अवतार है ये …चलो दर्शन करके आते हैं …ये देवियों का आग्रह था अपने पतियों के प्रति । तो देवों ने उनकी बात मान ली थी और वो सब नभ में आगये थे ….गौ चारण के लिए कन्हैया जाते हैं वन में , आज भी अपने सखाओं के साथ गए हैं ….देवों की अपेक्षा देवियों को अधिक रुचि है श्रीकृष्ण में । देखिए ! वो हैं श्रीकृष्ण …देवियों ने बड़ी श्रद्धा से प्रणाम किया था …देवों ने भी हाथ जोड़ ही लिए । सिर में मोर पंख है ..कण्ठ में वैजयन्ती माला है …कानों में कनेर खोंस लिए हैं ….देवियाँ इनके रूप को देख देखकर निहाल हैं ….तभी हंस में बैठे सृष्टिकर्ता भी वहाँ आपहुँचे ….उनको देखते ही देवों ने प्रणाम किया था और आगे उनके हंस को स्थान दिया था । यहाँ क्या हो रहा है ? ब्रह्मा ने पूछा ….वो परब्रह्म लीला कर रहे हैं …देखिए ..देवों ने ब्रह्मा को नीचे दिखाया । ब्रह्मा ने ध्यान से देखा …हाथ में दहीभात लिए हुए एक सुन्दर सा संवारा कन्हैया है ….वो दहीभात खा रहा है …उसके चारों ओर सखा बैठे हैं ….वो भी अपने अपने हाथों में कुछ न कुछ लिए ही हुये हैं …वो पहले खाते हैं …अपनी वस्तु अच्छी लगती है तो वो उसी झूठे को कन्हैया के मुख में दे देते हैं । इस लीला को देखकर देवता तो मुग्ध हो रहे हैं …उनकी देवियाँ तो देहसुध ही भूल रही हैं ….किन्तु विधाता ब्रह्मा ? उन्होंने नाक भौं सिकोड़ लिए हैं …ये कोई परब्रह्म है ? जूठा खाने वाला कभी आदर्श की स्थापना कर सकता है ? अगर ये ब्रह्म हैं तो इन्हें वेद मार्ग की प्रतिष्ठा रखनी चाहिए थी ….कर्मकाण्ड के बिना जीवन सुलझता नही है …जीवन में पवित्रता नही आपाती । ब्रह्मा इतना कहकर हंस में बैठकर उड़ गये थे …लेकिन ….ये पृथ्वी में गये ….और परीक्षा लेने के उद्देश्य से कन्हैया के ग्वाल बालों को एकाएक चुरा लिया …और ले गए थे ब्रह्म लोक में । ग्वालों को ही नही चुराया था बछड़ों को भी चुरा लिया था । अब तो कन्हैया उठे …अभी अभी सब थे लेकिन अब कहाँ गये ? कन्हैया इधर उधर देखने लगे थे ….ये इस समय छ वर्ष के हैं ….दही भात हाथ में है …और पुकार रहे हैं ….श्रीदामा ! भैया ! कहाँ गये तुम ।
अब देखता हूँ ….वो परब्रह्म है तो करे पता कि उसके सखा कहाँ गए । ब्रह्मा ने छुपा लिया है कन्हैया के सखाओं और बछडों को । और बड़े प्रसन्न होकर अभिमान में भरकर विधाता ऊपर से नीचे की ओर देखने लगते हैं ….ये क्या ? लीला तो वैसी ही चल रही है ….सखा बैठे हैं , मध्य में कन्हैया हैं …ब्रह्मा का सिर चकराया …वो नीचे ध्यान से देखते हैं …नहीं इन ग्वालों को तो मैंने अपने लोक में बन्द कर रखा था ….ब्रह्मा के कुछ समझ में नही आता तो वो श्रीवृन्दावन में आते हैं ….और जैसे ही श्रीवन में ये अपने पैर रखते हैं ….इन्हें प्रेम का आभास होता है …चारों ओर प्रेम फैला हुआ है यहाँ ….यहाँ के वृक्ष भी ब्रह्मरूप दिखाई देते हैं ब्रह्मा को …..सब कुछ ब्रह्म है …ब्रह्म ही बना है । तभी ….श्रीदामा ! मनसुख भैया ! वही कन्हैया हाथ में दही भात लिए अपने सखाओं को खोज रहा है ….तभी ….उसके सखा भी वहाँ आजाते हैं …..ये देखकर ब्रह्मा का सिर चकराता है …वो तुरन्त ब्रह्म लोक में जाते हैं और वहाँ ग्वाल वालों को देखते हैं तो चकित हो जाते हैं …..वहाँ भी हैं ग्वाल बाल और यहाँ भी हैं ? ये समझ जाते हैं कि ये कन्हैया तो कोई सामान्य नही …साक्षात् परब्रह्म हैं …..वो अब दौड़े दौड़े आते हैं श्रीवृन्दावन में ग्वालों को लेकर और बछडों को लेकर …सीधे आकर ये विधाता ब्रह्मा साष्टांग प्रणाम करते हैं नन्हे कन्हैया के चरणों में । शुकदेव कहते हैं ….किन्तु ये कन्हैया भी बड़ा हठीला है ….विधाता ब्रह्मा की ओर देखता ही नही है …..अपराध अक्षम्य है इस प्रेमी कन्हैया की दृष्टि में ब्रह्मा का । सही है ….प्रेमियों से अलग कर देना प्रेमी को , ये प्रेममार्ग में बहुत बड़ा अपराध है ….ब्रह्मा अपने चारों मस्तकों को कन्हैया के चरणों में रख देते हैं …लेकिन ..कन्हैया मुँह फेरे रहता है सृष्टिकर्ता ब्रह्मा से ।
Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
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श्लोक 10 . 6
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महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा |
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः || ६ ||
महा-ऋषयः – महर्षिगण; सप्त – सात; पूर्वे – पूर्वकाल में; चत्वारः – चार; मनवः – मनुगण; तथा – भी; मत्-भावाः – मुझसे उत्पन्न; मानसाः – मन से; जाताः – उत्पन्न; येषाम् – जिनकी; लोके – संसार में; इमाः – ये सब; प्रजाः – सन्तानें, जीव |
भावार्थ
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सप्तर्षिगण तथा उनसे भी पूर्व चार अन्य महर्षि एवं सारे मनु (मानवजाति के पूर्वज) सब मेरे मन से उत्पन्न हैं और विभिन्न लोकों में निवास करने वाले सारे जीव उनसे अवतरित होते हैं |
तात्पर्य
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भगवान् यहाँ पर ब्रह्माण्ड की प्रजा का आनुवंशिक वर्णन कर रहे हैं | ब्रह्मा परमेश्र्वर की शक्ति से उत्पन्न आदि जीव हैं, जिन्हें हिरण्यगर्भ कहा जाता है | ब्रह्मा से सात महर्षि तथा इनसे भी पूर्व चार महर्षि – सनक, सनन्दन, सनातन तथा सनत्कुमार – एवं सारे मनु प्रकट हुए | ये पच्चीस महान ऋषि ब्रह्माण्ड के समस्त जीवों के धर्म-पथप्रदर्शक कहलाते हैं | असंख्य ब्रह्माण्ड हैं और प्रत्येक ब्रह्माण्ड में असंख्य लोक हैं और प्रत्येक लोक में नाना योनियाँ निवास करती हैं | ये सब इन्हीं पच्चीसों प्रजापतियों से उत्पन्न हैं | कृष्ण की कृपा से एक हजार दिव्य वर्षों तक तपस्या करने के बाद ब्रह्मा को सृष्टि का ज्ञान प्राप्त हुआ | तब ब्रह्मा से सनक, सनन्दन, सनातन तथा सनत्कुमार उत्पन्न हुए | उनके बाद रूद्र तथा सप्तर्षि और इस प्रकार भगवान् की शक्ति से सभी ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों का जन्म हुआ | ब्रह्मा को पितामह कहा जाता है और कृष्ण को प्रपितामह – पितामह का पिता | इसका उल्लेख भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय (११.३९) में किया गया है |


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Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877