Explore

Search

August 30, 2025 6:40 am

लेटेस्ट न्यूज़

કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

Advertisements

श्रीसीतारामशरणम्मम(23-3), “काम-विजय लीला”(39),भक्त नरसी मेहता चरित (40) & श्रीमद्भगवद्गीता : नीरु आशरा

श्रीसीतारामशरणम्मम(23-3), “काम-विजय लीला”(39),भक्त नरसी मेहता चरित (40) & श्रीमद्भगवद्गीता : नीरु आशरा

🙏🥰 #श्रीसीतारामशरणम्मम 🥰🙏

#मैंजनकनंदिनी…. 2️⃣3️⃣
भाग 3

( #मातासीताकेव्यथाकीआत्मकथा )_
🌱🌻🌺🌹🌱🌻🌺🌹🥀💐

#सखिनमध्यसियसोहतिकैसे…..
📙( #रामचरितमानस )📙

🙏🙏👇🏼🙏🙏

#मैवैदेही ! ……………._

चलो ! मण्डप में जाना है ………….सिया जू को बुलवाया है ……

पद्मा और चारुशीला सखी आगयी थीं ………

और सखियाँ बाहर ही खड़ी थीं ……………….

चन्द्रकला से तो बातें ही करवा लो !…………सिया जू ! चलिये ……सब अब आपकी ही प्रतीक्षा में ही बैठे हैं ……………

नयनों से बह रहे आनन्दाश्रुओं को पोंछा चन्द्रकला नें …………..अन्य सखियाँ भी आगयीं ……………।

मै मध्य में थी ……………..मेरे चारों और सखियों का झुण्ड था ।

और मेरी सखियाँ भी कोई साधारण नही थीं ……….अरे ! शची, सावित्री, इन्दिरा, उमा इन सबसे सुन्दर थीं ………….

मुझे याद आरहा है वो गीत ………….जब मुझे लेकर मण्डप की और चली थीं …मेरी सखियाँ …………….और उस समय गा रही थीं ।

धीरे चलो सुकुमार, सुकुमार सिया प्यारी धीरे चलो सुकुमार ।

( सीता जी यहाँ कुछ देर के लिए उसी गीत को गुनगुनाती है …..और उसी गीत के ये भाव हैं …………..जो अब यहाँ लिखा है )

“चारों और नर नारी बैठे हैं……जब सीता जी आती हैं…….तब सब लोग “जनकदुलारि की – जय जय जय”……कहकर पुष्प बरसाते हैं ।

जब किशोरी जी मण्डप की और चल रही हैं …….तब उनके कंकण, किंकिणि नुपुर बाजूबन्द कुण्डल इनसे जो ध्वनि निकल रही है …..वो वेद की ऋचाओं से भी ज्यादा पवित्र है ।

आहा ! अपनी सिया कैसी लग रही हैं …..सखियों के मध्य में ?

अरी सखी ! सिया जू तो ऐसी लग रही हैं ……..जैसे अनेक तारों के मध्य में पूर्ण चन्द्रमा चल रहा हो ।

अरी सखी ! दुल्हन का श्रृंगार तो वैसे ही सुन्दर लगता है……और उसमें भी जब हमारी सिया जू ! …..जिनके सुन्दरता की तो कोई उपमा ही नहीं है …………ऐसी किशोरी जू आज नवल साडी में …….ओह ! मै आगे वर्णन नही कर सकती …………..।

( सीता जी गीत गा रही हैं ……..विवाह के प्रसंग को याद कर रही हैं )

अपनें नेत्रों को सफल बनाओ………किशोरी जू के रूप को निहारो !

ये करुणा की मूर्ति हैं ……ये दयालुता की राशि हैं ………………..राम जी के सामनें झुको तब वह अपनें हृदय से लगाते हैं …….पर हमारी किशोरी जू …….! इनके आगे तो झुकनें की भी जरूरत नही है …….सजल नयन, हृदय में प्रेम रखकर इनके सन्मुख चले भी जाओ ना तो इतनें में ही ……….ये अपना हृदय निकाल कर दे देती हैं ।

और इनके हृदय में तो श्री रघुनन्दन ही हैं ना ………….ये श्री रघुनन्दन को ही दे देती हैं ……………।

देखो सखी ! हमारी सिया जू नें चुनरी कितनी सुन्दर ओढ़ रखी है ……

काश ! हम इस चुनरी में लगनें वाले झालर ही बन जाते ……….तो कमसे कम अपनी सिया सुकुमारी के आँचल की छायाँ में तो रहते !

आहा ! क्या बात कही है सखी ! हमारी सिया जू के आँचल की छायाँ में तो असीम करुणा भरी है …….सखी ! इनकी छायाँ में रहनें पर तो विश्व् ब्रह्मांड का दुःख कष्ट भी सहज लगता है ……….।

और मेरी किशोरी जू के नयन तो देखो ……….आहा ! और इन नयनो में लगनें वाले काजल !…………..

अरी सखी ! सुन सुन ……..ये नयन नही हैं………ये तो कटार हैं ……..तुम्हे याद नही है ………..यही कटार तो चले थे राम जी के ऊपर पुष्प वाटिका में …….तब क्या दशा हुयी थी इन रघुनन्दन की …….

अब देखो …………..इन्हीं कटार को धार और दिया गया है …….ताकी इससे कटनें वाला पानी भी न माँगे …….उफ़ !

ये अवध के दूल्हा राम जी तो गए अब काम से …………….।

( सीता जी गाती है इस गीत को , याद करके )

कहती चन्द्रकला दुहुँ कर जोर हे ,
आबु सिया हिया बीच, हमर निहोर हे …..

कितना सुन्दर गीत गाती हुयीं मेरी सखियाँ मुझे विवाह मण्डप पर ले गयीं थीं ……..उस समय मैने अपनें प्राण धन श्री रघुनन्दन को देखा था ……..नील मणि ………..आकाश का रँग ………..उनके वो नेत्र !

उफ़ …….उनके पास मुझे बिठा दिया था ……………..मै तो देह सुध भूलनें लगी थी ……………….

शेष चरिञ अगले भाग में……….


💐🥀🌹🌺🌻🌱💐🥀🌹🌺🌱
जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥

ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥
💐🥀🌹🌺🌻🌱💐🥀🌹🌺🌱

[lNiru Ashra: “काम-विजय लीला”

भागवत की कहानी – 39


जो इस कथा को सुनेगा उसके हृदय से “काम रोग”नष्ट हो जाएगा । रास लीला , जो शृंगार रस का एक अनुपम प्रसंग है …..इसको सुनाने के बाद शुकदेव कहते हैं ….जो इस कथा को सुनेगा उसके हृदय से काम रोग नष्ट हो जाएगा । परीक्षित आश्चर्य से भर गए हैं ….अधर से अधर लगे हैं , वक्ष से वक्ष सटे हैं ….कपोल कपोल से चिपके हैं …..आलिंगन इतना गहन है कि दोनों ही भूल गये हैं कि कौन पुरुष है कौन स्त्री । गोपियों को पूर्ण तृप्त किया है श्याम सुन्दर ने । परीक्षित हंसे …….ये क्या है ? क्यों रास किया श्रीकृष्ण ने ? इससे धर्म की स्थापना कहाँ हुई ? योगेश्वर हैं श्रीकृष्ण …फिर ऐसी लीला क्यों ? परीक्षित हंसते हैं और कहते हैं इसके बाद आपका ये कहना तो और हास्यास्पद है कि जो इन कथाओं को सुनेगा उसके हृदय से काम रोग समाप्त हो जाएगा ? गुरुदेव ! काम रोग और बढ़ेगा ।

शुकदेव गम्भीर हैं …वो महारास का प्रसंग सुना चुके हैं ….किन्तु ये कैसा प्रश्न उठा दिया आज परीक्षित ने …..

क्यों ? योगेश्वर श्रीकृष्ण गोपियों के साथ क्यों नाचें ?

शुकदेव उत्तर देते हैं – श्रीकृष्ण परब्रह्म हैं और गोपियाँ ब्रह्म की ही तो हैं , की नही ? हे परीक्षित ! ब्रह्म अपने जीव से विहार करे ….मिले …एक हो ..तो इसके गलत क्या है ? जीव और ब्रह्म का मिलन ही तो ये रास है …और यही रास ही जीव को अभीष्ट है ।


हे देवर्षि! मेरे साथ युद्ध कीजिए । नारद जी आ रहे थे गोलोक धाम से तो बीच में ही कामदेव ने उन्हें पकड़ लिया था ….और अहंकार में भरकर बोला था …मेरे साथ युद्ध कीजिए ।

नारायण , नारायण , नारायण , क्यों कामदेव ! मैं ही मिला हूँ क्या तुम्हें युद्ध करने के लिए ?

भगवान भूतभावन के साथ युद्ध करो ….नारद जी ने हंसते हुए कहा ।

आप जिसे भगवान भूत भावन कह रहे हैं …उनसे मैं लड़ चुका हूँ …उनको मैंने छटी का दूध याद दिला दिया है । अहंकार चरम पर है कामदेव का । किन्तु कब ? नारद जी ने पूछा ।

जब मोहनी का रूप नारायण भगवान ने धारण किया था तब भगवान भूतभावन मेरे चंगुल में फंस गये थे । कोई और शक्तिशाली बताइये ….या कोई बचा ही नही ? अहंकारी के अहंकार को देखकर नारद जी को आनन्द आता है ….इन्हें लगता है भगवान का भोजन अहंकार है अब भगवान इसके अहंकार को खायेंगे । “भगवान राम के पास भी तो तुम गये थे वहाँ क्या हुआ”? कामदेव सिर खुजाने लगा – राघवेंद्र ? वो तो एक “पत्नीव्रत” हैं उन्होंने तो अपनी पत्नी के सिवा किसी को उस भाव से देखा ही नही है …फिर मेरा प्रभाव उन पर कैसे चले । कामदेव की बात सुनकर मन ही मन नारद हंसे …किन्तु बाहर से गम्भीर होने की लीला करते हुए बोले ….तुम्हारी समस्या तो गम्भीर है कामदेव ? अब क्या करोगे तुम ? कामदेव बोला …या तो किसी शक्तिशाली व्यक्ति का नाम बताइये या आप ही लड़िए । नारद जी बोले …नही , मैं तो नही …किन्तु एक शक्तिशाली व्यक्ति हैं ….तुम उनसे लड़ो । कौन हैं वो ? मैं विश्व-ब्रह्माण्ड विजेता बनना चाहता हूँ …भगवान कामदेव । मेरे नाम के आगे अब भगवान लगे । कामदेव ने अट्टहास किया था ।

गोलोक बिहारी श्रीकृष्णचन्द्र । नारद जी ने नाम बता दिया ।

कहाँ मिलेंगे ? गोलोक में …अभी जाओ , मिल जायेंगे ।
नारद जी ने भेज दिया कामदेव को गोलोक ।

कामदेव अपने हाथों में पुष्प धनुष लेकर गोलोक पहुँचा था ।


जय हो गोलोक बिहारी की । कामदेव ने गोलोक धाम पहुँचकर सीधे यही कहा था …सिंहासन में स्वयं श्रीकृष्ण विराजे हैं ….कामदेव ने जाकर हाथ भी नही जोड़ा न झुका …बस बातों में ही ….जय हो गोलोक बिहारी की । मुस्कुराते हुए श्याम सुन्दर बोले …कहो क्यों आए हो यहाँ ? मैं मनोज । हाँ , हाँ , मैं तुम्हें पहचान गया तुम मन्मथ कामदेव हो ना ?

कामदेव तो और अहंकार में फूल गया …तुम्हें कौन नही जानता ….ये और कह दिया श्रीकृष्ण चन्द्र जू ने ।

मेरे आने का कारण है कि मैं आपसे युद्ध करना चाहता हूँ ….कामदेव ने अपनी बात रखी ।

ओह ! मुझ से युद्ध ? हाँ , आपसे युद्ध …क्यों की अब कोई ब्रह्माण्ड में बचा ही नही है जिससे मैं लड़ूँ …क्यों पुष्पधन्वा ने सबको पराजित कर दिया है ? गोलोक बिहारी मुस्कुराए ..फिर बोले – अच्छा , अच्छा , तो कामदेव ! कब युद्ध करना चाहोगे ? जब आप कहें ? कहाँ ? जहाँ आपको उचित लगे । कौन सा युद्ध ? किले का या मैदान का ? कामदेव सोचने लगा …किले का युद्ध यानि विवाह करके काम यानि मुझे जीतना …और मैदान का यानि हजारों सुन्दरियों के मध्य बैठकर मुझे यानि काम को जीतना । कामदेव सोचता है …विवाह करके पत्नी के साथ काम को जीतना कोई बड़ी बात तो है नही, लेकिन हजारों सुन्दरियों के मध्य बैठकर काम को जीतना ये कठिन है ।

मैदान का युद्ध । कामदेव ने कहा ।

तो सुनो कामदेव ! मैं अवतार लेकर आरहा हूँ बृज में …..श्रीवृन्दावन मैं महारास करूँगा ….तुम आजाना …और हाँ , पूरे अस्त्र शस्त्र के साथ आना ….कहीं बाद में ये ना कहना कि मेरे पास मेरे अस्त्र नही थे इसलिए हार गया । कामदेव मुस्कुराया और गोलोक से चलते हुए बोला ….चलो, अब तो श्रीवृन्दावन में ही मिलना होगा । वहीं युद्ध होगा । श्रीकृष्ण केवल मुस्कुराए थे ।


सन्ध्या की वेला , आज शीघ्र ही श्रीकृष्ण गिरिराज के लिए निकल गये थे ….वहाँ पहुँचकर एक गिरवर की शिला में बैठ गये…..फेंट में से बाँसुरी निकाली ……तभी सामने कामदेव दिखाई दे गया ….श्रीकृष्ण मुस्कुराए ….तुम आगये ? हाँ , कामदेव ने भी कहा । लेकिन गलती हो गयी कामदेव से …वो सोचने लगा एकान्त , रात्रि की वेला ….वन प्रदेश , चारों ओर से मादक सुगन्ध बह रही है । कामदेव हंसा ….यहाँ तो एक ही बार में ये कृष्ण ढेर हो जाएगा । लेकिन …..मुझे अप्सराओं को लेकर आना चाहिए था ….अप्सरा आतीं तो ये अभी मुझ से हार जाता । कामदेव ये सोच ही रहा था कि ….श्याम सुन्दर ने अपनी बाँसुरी अधरों पर रख ली थी …और उसमें मंद मंद फूंक मारने लगे थे …कामदेव बाँसुरी को सुनकर एक बार तो मुग्ध हुआ …लेकिन उसने अपने को सावधान कर लिया था ….तभी सामने देखा कामदेव ने …हजारों सुंदरियाँ भागती दौड़ती गिरती पड़ती आरही हैं …..कोई शृंगार नही है …बल्कि शृंगार तो इनका बिखर और गया है …पर सुन्दर कितनी हैं …ओह ! मैं अप्सराओं को लाने की सोच रहा था …लेकिन अप्सरा इनके आगे तुच्छ हैं …इन गोपियों का अद्भुत सौन्दर्य ! चलो अच्छा किया इसी ने बुला लिया …अब तो मेरे बाण खूब चलेंगे …कामदेव यहाँ अट्टहास करता है । किन्तु ये क्या ? इन सुन्दरियों को रुला दिया था श्रीकृष्ण ने …कामदेव अब गम्भीरता के साथ श्रीकृष्ण की बातें सुनने लगा था । श्रीकृष्ण कह रहे हैं गोपियों को – तुम जाओ , यहाँ इस तरह तुम्हारा आना उचित नही । बस अपने प्रिय के मुख से ये सुनकर गोपियाँ तो रोने लगीं थीं । तभी कामदेव ने देखा कि श्रीकृष्ण हंस रहे हैं और गोपियों से कह रहे हैं – मैं तो विनोद कर रहा था …इतना कहकर इन गोपियों को श्रीकृष्ण आलिंगन करने लगे थे …कामदेव प्रसन्न हुआ …ये अवसर उचित है …ये अवसर ठीक है ….कामदेव ने अब युद्ध की तैयारी की ….युद्ध भूमि कामदेव ने गोपियों के देह को बनाया था । तभी श्रीकृष्ण मुस्कुराये और फिर आलिंगन करने लगे …आलिंगन में गोपियों को रोमांच हो रहा है …किन्तु श्रीकृष्ण अपने स्वरूप में स्थित हैं …वो विचलित नही हो रहे । कामदेव गोपियों के वक्ष में जाकर बैठ गया ..श्रीकृष्ण ने गोपियों के वक्ष का स्पर्श किया , उफ़ ! गोपियाँ चीत्कार कर उठीं नही नहीं गोपियाँ ही नहीं श्रीकृष्ण के स्पर्श से तो कामदेव भी सिसकियाँ भरने लगा था । किन्तु श्रीकृष्ण शान्त हैं ….उन्हें कुछ नही हो रहा । कामदेव नीवी बंधन में जाकर बैठ गया ….श्रीकृष्ण गोपियों के नीवी बंधन को खोल देते हैं …नख से आघात करते हैं ….कामदेव चीख उठा ….किन्तु श्रीकृष्ण शान्त हैं ….उन्हें कुछ नही हो रहा । अब तो कामदेव गोपियों के पूरे अंगों में व्याप गया ….श्रीकृष्ण गोपियों के अंगों को चूमने लगे ….कामदेव हाय हाय कर उठा …लेकिन श्रीकृष्ण शान्त हैं ….उन्हें कुछ नही हो रहा ….वो अपने नित्यानन्द स्वरूप में विराजित हैं । कामदेव अब मूर्छित हो गया ….उसके सारे बाण व्यर्थ चले गये ….कितनी कोशिश की थी अपने बाणों से श्रीकृष्ण को पराजित करने की …लेकिन ये भी कन्हैया है ….रास बिहारी है ….रस ही रस में खेलने वाला है …ये कामदेव इसका क्या बिगाड़ता । श्रीवृन्दावन की भूमि में कामदेव को श्रीकृष्ण ने आज पराजित कर दिया था ।


हे परीक्षित ! ये काम-विजय लीला है ….इसलिये तो कह रहा हूँ रास को समझो ….रास को बिना समझे आलोचना उचित नही है । ये योगेश्वर हैं ..नही नही , ये योगेश्वरों के भी ईश्वर है । ब्रह्म हैं , परब्रह्म हैं ….गोपियाँ जीव हैं ….जीव को अगर काम वासना आदि से बचना है तो ब्रह्म की शरण में ही जाना चाहिए अन्यथा काम से कौन बचा है ? हे परीक्षित ! हृदय रोग से ये श्रीकृष्ण की रास लीला ही जीव को बचाती है …न दमन , न स्खलन …ऊर्ध्व रेता बने जीव । शुकदेव तो यही कहते हैं ।

Niru Ashra: भक्त नरसी मेहता चरित (40)


माणिकबाई का मर्त्य लोक से नाता छोड़ना

जिस स्थान पर भगवान का भजन होता है , वह साक्षात वैकुण्ठलोक ही है । जो मनुष्य भगवान का नाम लेता है वह हीन–जाति का होने पर भी देव समान है और जो मनुष्य भगवद भजन के प्रभाव को जानकर भी भगवान से विमुख रहता है , वह उच्च कुल में उत्पन्न होने पर भी आत्म हत्या के महान पाप का भागी बनता है । भगवान का भजन करने तथा श्रवण करने का ब्राह्मण से लेकर चाण्डाल पर्यन्त सबको समान अधिकार है ।

*’श्रीमदभागवत गीता में तो ब्राह्मण, गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदृष्टि रखने वाले ही सच्चे ज्ञानी बतलाये गये है । सामाजिक आचार -विचार में भेद है और वह रहना भी चाहिए, इसी से भगवान ने समान दृष्टि रखने की बात कही है । सब बातों में समान बर्ताव की नहीं । परंतु भजन का तो सभी को अधिकार है ।

अःत तुम अपने आँगन में तुलसी -चबुतरे के समीप गोबर से जमीन को लीप-पोतकर भजन की तैयारी करो । मैं तुम्हारे इच्छानुसार आज रात को तुम्हारे आँगन में ही भगवान का भजन करूँगा ।’*

इस प्रकार अन्त्यज भक्त को वचन दे नरसिंह राम अपने घर आये । अन्त्यज भक्त ने भी आज्ञानुसार सब तैयारी की तथा अन्य साधु-सन्तों और भक्तों को भी आमंत्रित किया । नरसिंह राम अपने घर पर भगवान का पूजन करके, करताल -मृदंग आदि भजन की सामग्री लेकर अन्त्यज भक्त के आँगन में उपस्थित हुए और भजन करने लगे ।

सब बाहरी संसार को पूर्ण रूप से भूल कर भगवत्प्रेम में मस्त हो गये थे । उनके आस-पास बैठे हुए श्रोता मन्त्र मुग्ध सर्प की भाँति एकाग्र होकर भजनानन्द लूट रहे थे । उस समय वहाँ पर मानों शान्ती, पवित्रता और आनंद का ही साम्राज्य फैल रहा था । इस प्रकार रात भर भक्त राज भजन करते रहे ।

उधर घर में *’माणिकबाई ज्वर ने धीरे -धीरे भीषण रूप धारण कर लिया । उस समय उनकी परिचर्या करने वाला घर में कोई नहीं था । वह भी निरन्तर भगवान्नाम की ही रट लगाये हुए थी , यहाँ तक की बेहोश की हालत में भी उसकी जिव्हा भगवान को ही पुकार रही थी, मानो उसने संसार से सारा सम्बनध तोड़ कर समाधिस्थ अवस्था में केवल भगवान से ही सम्बनध जोड़ लिया था ।

प्रातः काल भजन समाप्त कर जब नरसिंह राम घर आये तो देखा कि पत्नी मरणासन्न अवस्था में है , केवल अन्तिम साँसे गिन रही हैं । नरसिंह जी पत्नी की यह हालत देखकर उसकी सेवा में लग गये और भगवान्नाम सुनाते हुए उसकी शुश्रूषा करने लगे; परंतु भगवान का विधान कुछ और था । पति के आने पर उसने एक बार आँखें खोलकर उनके दर्शन किए और अन्तिम बार भगवान के नाम का जोर से उच्चारण करके इस ”मर्त्यलोक ” से सदा के लिए नाता तोड़ लिया ।’*

उस समय का दृश्य वज्रहर्दय मनुष्य को भी पिलाने की शक्ति रखता था । फिर इकलौते *”नव विवाहित युवक पुत्र की मृत्यु तथा प्रौढ़ आना संसार में दुःख की परमावधि ही कही जाती है ।

परंतु फिर भी वीतराग भक्त प्रवर नरसिंह मेहता एकदम स्थिर और शान्त थे । वह वास्तव में इस जन्म -मरम्मय संसार में रहते ही कहाँ थे ,जो यहाँ के दुःख शोक उन्हें स्पर्श करते ? वह तो सदा किसी दूसरे ही दिव्य लोक में निवास करते थे, जहाँ निरन्तर एकरस आनंद प्रवाहित होता रहता है ।”*

ज़िंदगी श्याम की ईमानत है,
संवारा करे हिफ़ायस्त है ,
ज़िंदगी श्याम की ईमानत है

रिश्तो की कीमत समझना जरुरी,
इनके बिना है जिंगदी अधूरी,
जिंदगी श्याम की इनायत है,
संवारा करे हिफ़ायस्त है ,
ज़िंदगी श्याम की ईमानत है

मुश्किल से पाया मानव जन्म है,
अपना पराया बस ये भरम है,
जिंगदी श्याम से सलामत है,
संवारा करे हिफ़ायस्त है ,
ज़िंदगी श्याम की ईमानत है

मुख जिंदगी से ना मोड़ना तू ,
मोहित भरोसा न छोड़ना तू,
बस यही श्याम हिदायत है ,
संवारा करे हिफ़ायस्त है ,
ज़िंदगी श्याम की ईमानत है

क्रमशः ………………!


Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता

अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
🌹🌹🌹🌹🌹🌹
श्लोक 10 . 9
🌹🌹🌹🌹
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् |
कथयन्तश्र्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च || ९ ||

मत्-चित्ताः – जिनके मन मुझमें रमे हैं; मत्-गत-प्राणाः – जिनके जीवन मुझ में अर्पित हैं; बोधयन्तः – उपदेश देते हुए; परस्परम् – एक दूसरे से, आपस में; च – भी; कथयन्तः – बातें करते हुए; च – भी; माम् – मेरे विषय में; नित्यम् – निरन्तर; तुष्यन्ति – प्रसन्न होते हैं; च – भी; रमन्ति – दिव्य आनन्द भोगते हैं; च – भी |

भावार्थ
🌹🌹🌹
मेरे शुद्ध भक्तों के विचार मुझमें वास करते हैं, उनके जीवन मेरी सेवा में अर्पित रहते हैं और वे एक दूसरे को ज्ञान प्रदान करते तथा मेरे विषय में बातें करते हुए परं संतोष तथा आनन्द का अनुभव करते हैं |

तात्पर्य
🌹🌹

यहाँ जिन शुद्ध भक्तों के लक्षणों का उल्लेख हुआ है, वे निरन्तर भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में राम रहते हैं | उनके मन कृष्ण के चरणकमलों से हटते नहीं | वे दिव्य विषयों की ही चर्चा चलाते हैं | इस श्लोक में शुद्ध भक्तों के लक्षणों का विशेष रूप से उल्लेख हुआ है | भगवद्भक्त परमेश्र्वर के गुणों तथा उनकी लीलाओं के गान में अहर्निश लगे रहते हैं | उनके हृदय तथा आत्माएँ निरन्तर कृष्ण में निमग्न रहती हैं और वे अन्य भक्तों से भगवान् के विषय में बातें करने में आनन्दानुभाव करते हैं |
.
भक्ति की प्रारम्भिक अवस्था में वे सेवा में ही दिव्य आनन्द उठाते हैं और परिपक्वावस्था में वे ईश्र्वर-प्रेम को प्राप्त होते हैं | जब वे इस दिव्य स्थिति को प्राप्त कर लेते हैं, तब वे सर्वोच्च सिद्धि का स्वाद लेते हैं, जो भगवद्धाम में प्राप्त होती है | भगवान् चैतन्य दिव्य भक्ति की तुलना जीव के हृदय में बीज बोने से करते हैं | ब्रह्माण्ड के विभिन्न लोकों में असंख्य जीव वितरण करते रहते हैं | इनमें से कुछ ही भाग्यशाली होते हैं, जिनकी शुद्धभक्त से भेंट हो पाती है और जिन्हें न्हाक्ति समझने का अवसर प्राप्त हो पाता है | यह भक्ति बीज के सदृश है | यदि इसे जीव के हृदय में बो दिया जाये और जीव हरे कृष्ण का श्रवण तथा कीर्तन करता रहे तो बीज अंकुरित होता है, जिस प्रकार कि नियमतः सींचते रहने से वृक्ष का बीज फलता है | भक्ति रूपी आध्यात्मिक पौधा क्रमशः बढ़ता रहता है, जब तक वह ब्रह्माण्ड के आवरण को भेदकर ब्रह्मज्योति में प्रवेश नहीं कर जाता | ब्रह्मज्योति में भी पढ़ा तब तक बढ़ता जाता है, जब तक उस उच्चतम लोक को नहीं प्राप्त कर लेता, जिसे गोलोक वृन्दावन या कृष्ण का परमधाम कहते हैं | अन्ततोगत्वा यह पौधा भगवान् के चरणकमलों की शरण प्राप्त कर वहीं विश्राम पाता है | जिस प्रकार पौधे में क्रम से फूल तथा फल आते हैं, उसी प्रकार भक्तिरूपी पौधे में भी फल आते हैं और कीर्तन तथा श्रवण के रूप में उसका सिंचन चलता रहता है | चैतन्य चरितामृत में (मध्य लीला , अध्याय १९) भक्तिरूपी पौधे का विस्तार वर्णन हुआ है | यहाँ यह बताया गया है कि जब पूर्ण पौधा भगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण कर लेता है तो मनुष्य पूर्णतया भगवत्प्रेम में लीन हो जाता है, तब तक एक क्षण भी परमेश्र्वर के बिना नहीं रह पाता, जिस प्रकार कि मछली जल के बिना नहीं रह सकती | ऐसी अवस्था में भक्त वास्तव में परमेश्र्वर के संसर्ग से दिव्यगुण प्राप्त कर लेता है |
.
श्रीमद्भागवत में भी भगवान् तथा उनके भक्तों के सम्बन्ध के विषय में ऐसी अनेक कथाएँ हैं | इसीलिए श्रीमद्भागवत भक्तों को अत्यन्त प्रिय है जैसा कि भागवत में ही (१२.१३.१८) कहा गया है – श्रीमद्भागवतं पुराणं अमलं यद्वैष्णवानां प्रियम् | ऐसी कथा में भौतिक कार्यों, आर्थिक विकास, इन्द्रियतृप्ति तथा मोक्ष के विषय में कुछ भी नहीं है | श्रीमद्भागवत ही एकमात्र ऐसी कथा है, जिसमें भगवान् तथा उनके भक्तों की दिव्य प्रकृति का पूर्ण वर्णन मिलता है | फलतः कृष्णभावनामृत जीव ऐसे दिव्य साहित्य के श्रवण में दिव्य रूचि दिखाते हैं, जिस प्रकार तरुण तथा तरुणी को परस्पर मिलने में आनन्द प्राप्त होता है।


admin
Author: admin

Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877

Leave a Comment

Advertisement
Advertisements
लाइव क्रिकेट स्कोर
कोरोना अपडेट
पंचांग
Advertisements