Niru Ashra: 🙏🥰 श्रीसीताराम शरणम् मम 🥰🙏
मैंजनकनंदिनी..5️⃣8️⃣भाग 1
( माता सीता के व्यथा की आत्मकथा)
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आवत देखी सकल मुनि वृन्दा…..
📙( रामचरितमानस )📙
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मैं वैदेही !
चित्रकूट की सन्ध्या …….सायंकाल ……………
वट वृक्ष के नीचे विराजें हैं मेरे श्रीराम …………..
आस पास की गुफाओं से निकल निकल कर आजाते हैं बड़े बड़े ऋषि मुनि ……………..उनका आदर सत्कार अपनी वाणी और दोनों कर जोर कर करते हैं मेरे श्रीराम ।
मै भी बैठ जाती हूँ …………….सत्संग सुननें के लिये ।
मेरे पास भीलनियाँ हाँ कुछेक ऋषि पत्नियां भी……..बैठ जाती हैं ।
शीतल हवा चल रही है ……………सुगन्धित वातावरण हो गया है ।
हे रामभद्र ! हमें आपसे आज ये पूछना है कि सन्त किसे कहते हैं ?
एक ऋषि नें उठकर मेरे श्रीराम से पूछा था ………।
नही नही …..ये प्रश्नोत्तरी का प्रसंग आज ही नही हो रहा था …….ये नित्य का नियम ही था …….सन्ध्या के समय ।
और कुछ प्रश्न हैं ?
मुस्कुराते हुये श्रीराम नें सभी ऋषि मुनियों की ओर देखा ।
जी ! राम भद्र ! प्रश्न बहुत हैं ……………..पर आप के ही द्वारा सही समाधान मिलेगा इसलिये आपसे ये सब प्रश्न कर रहे हैं हम ।
हे राम ! आप जो कहेंगें हमारे लिये वही वेद वाक्य हैं ……….क्यों कि हमारे गुरु महर्षि वाल्मीकि जी नें हमें कहा है ………आप ही पूर्णब्रह्म हैं ।
तो हे रामभद्र ! ब्रह्म की श्वास ही तो वेद है …………….इसलिये ही हमें आपकी वाणी पर पूर्ण विश्वास है ।
आप निःसंकोच पूछें ……………………श्रीराम नें कहा ।
सन्त कौन हैं ?
सत्संग क्या है ?
जीवन में विषयों से वैराग्य कैसे आवे ?
मन आपके चरणों में कैसे लगे ?
ऋषि गण पूछते थे …………..और मेरे श्रीराम उनका उत्तर बड़ी मधुरता से ………सरलता से देते ………।
नही नही …..ये सारे प्रश्न एक ही दिन में किये गए थे….ऐसा नही है ….और इनके उत्तर भी एक ही दिन में नही दिए ………
ये सत्संग नित्य चलता था …..सायंकाल के समय …………..
क्रमशः ….
शेष चरिञ अगले भाग में……….
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जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥
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Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 13 : प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
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श्लोक 13.6-7
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महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च |
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः || ६ ||
इच्छा द्वेषः सुखं दु:खं सङ्घातश्र्चेतना धृतिः |
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् || ७ |
महा-भूतानि – स्थूल तत्त्व; अहङकार – मिथ्या अभिमान; बुद्धिः – बुद्धि; अव्यक्तम् – अप्रकट; एव – निश्चय ही; च – भी; इन्द्रियाणि – इन्द्रियाँ; दश-एकम् – ग्यारह; च – भी; पञ्च – पाँच; च – भी; इन्द्रिय-गो-चराः – इन्द्रियों के विषय; इच्छा – इच्छा; द्वेषः – घृणा; सुखम् – सुख; दुःखम् – दुख; सङघातः – समूह; चेतना – जीवन के लक्षण; धृतिः – धैर्य; एतत् – यह सारा; क्षेत्रम् – कर्मों का क्षेत्र; समासेन – संक्षेप में; स-विकारम् – अन्तः-क्रियाओं सहित; उदाहृतम् – उदाहरणस्वरूप कहा गया |
भावार्थ
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पंच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त (तीनों गुणों की अप्रकट अवस्था), दसों इन्द्रियाँ तथा मन, पाँच इन्द्रियविषय, इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, संघात, जीवन के लक्षण तथा धैर्य – इन सब को संक्षेप में कर्म का क्षेत्र तथा उसकी अन्तः-क्रियाएँ (विकार) कहा जाता है |
तात्पर्य
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महर्षियों, वैदिक सूक्तों (छान्दस) एवं वेदान्त-सूत्र (सूत्रों) के प्रामाणिक कथनों के आधार पर इस संसार के अवयवों को इस प्रकार समझा जा सकता है | पहले तो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश – ये पाँच महाभूत हैं | फिर अहंकार, बुद्धि तथा तीनों गुणों की अव्यक्त अवस्था आती है | इसके पश्चात् पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं – नेत्र, कान, नाक, जीभ तथा त्वचा | फिर पाँच कर्मेन्द्रियाँ – वाणी, पाँव, हाथ, गुदा तथा लिंग – हैं | तब इन इन्द्रियों के ऊपर मन होता है जो भीतर रहने के करान अन्तः-इन्द्रिय कहा जा सकता है | इस प्रकार मन समेत कुल ग्यारह इन्द्रियाँ होती हैं | फिर इन इन्द्रियों के पाँच विषय हैं – गंध, स्वाद, रूप, स्पर्श तथा ध्वनि | इस तरह इन चौबीस तत्त्वों का समूह कार्यक्षेत्र कहलाता है | यदि कोई इन चौबीसों विषयों का विश्लेषण करे तो उसे कार्यक्षेत्र समझ में आ जाएगा | फिर इच्छा, द्वेष, सुख तथा दुख नामक अन्तः-क्रियाएँ (विकार) हैं जो स्थूल देह के पाँच महाभूतों की अभिव्यक्तियाँ हैं | चेतना तथा धैर्य द्वारा प्रदर्शित जीवन के लक्षण सूक्ष्म शरीर अर्थात् मन, अहंकार तथा बुद्धि के प्राकट्य हैं | ये सूक्ष्म तत्त्व भी कर्मक्षेत्र में सम्मिलित रहते हैं |
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पंच महाभूत अहंकार की स्थूल अभिव्यक्ति हैं, जो अहंकार की मूल अवस्था को ही प्रदर्शित करती है, जिसे भौतिकवादी बोध या तामस बुद्धि कहा जाता है |यह और आगे प्रकृति के तीनों गुणों की अप्रकट अवस्था की सूचक है | प्रकृति के अव्यक्त गुणों को प्रधान कहा जाता है |
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जो व्यक्ति इन चौबीसों तत्त्वों को, उनके विकारों समेत जानना चाहता है, उसे विस्तार से दर्शन का अध्ययन करना चाहिए | भगवद्गीता के केवल सारांश दिया गया है |
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शरीर इन समस्त तत्त्वों की अभिव्यक्ति है | शरीर में छह प्रकार के परिवर्तन होते हैं – यह उत्पन्न होता है, बढ़ता है, टिकता है, सन्तान उत्पन्न करता है और तब यह क्षीण होता है और अन्त में समाप्त हो जाता है | अतएव क्षेत्र अस्थायी भौतिक वस्तु है लेकिन क्षेत्र का ज्ञाता क्षेत्रज्ञ इससे भिन्न रहता है |
Niru Ashra: श्रीकृष्णकर्णामृत - 88
प्रेम की अद्भुत बानगी…
करौ शरदिजाम्बुज क्रमविलासशिक्षागुरु,
पदौ विबुधपादप प्रथमपल्लवोल्लङ्घिनौ ।
दृशौ दलित दुर्मद त्रिभुवनोपमानश्रियौ
विलोकय बिलोचनामृतमहो महः शैशवम् ॥८६॥
हे साधकों ! जिस प्रेम प्राप्ति का साधन मात्र रोना , सिसकना तड़फ़ना और बिलखना ही हो ….जिस भाव-राज्य में सदा ही मर्मान्तक वेदना का पुष्प हृदय पटल पर संजोकर रखना पड़ता हो और जब प्रियतम सामने उपस्थित हों तो उनके चरणों में वो पुष्प अर्पण करना पड़ता हो …जहाँ प्राणप्रीतम से मिलन ही जीवन का लक्ष्य बन गया हो …और मिलन का उत्साह – उत्सव भी कभी कभी उपस्थित हो जाता हो …और वही उत्सव और वेदना अश्रु के रूप में कपोल को आए दिन गीला करते रहते हों …उस प्रेम के विषय में क्या कहा जाए ?
प्रेम का स्वरूप तो वही जानें …जिनके ऊपर प्रेम देवता की कृपा हो गयी हो …..वही जानें इस प्रेम तत्व को जिसके अंदर प्रियतम की बातें उठते ही मीठा दर्द शुरू हो जाए ।
यहाँ “रस राज्य” में बिल्वमंगल की यही दशा हो गयी है ….उन्हें विरह ने दर्द भरपूर दिया तो अब मिलन का सुख …..ये दोनों ही साथ साथ हैं बिल्वमंगल के । इन दिनों मिलन के उत्साह में मग्न हैं बिल्वमंगल …..उनके सामने उनके प्राणप्रीतम खड़े हैं ….और ये निहार रहे हैं …..प्रेम की अद्भुत बानगी का दर्शन कीजिए ….बिल्वमंगल स्वयं तो देख ही रहे हैं लेकिन वो हमें भी दिखाना चाहते हैं …..जो सुख स्वयं पा रहे हैं बिल्वमंगल वही सुख हमें भी देना चाहते हैं । अपने नव किशोर के सौन्दर्य-माधुर्य को देखकर मुग्ध बिल्वमंगल कहते हैं …..आहा ! ये कितना सुन्दर है ….लेकिन उसी समय प्रेमी हृदय में करुणा जाग जाती है ….हमारे प्रति करुणा ! हम संसारी के प्रति प्रेमी बिल्वमंगल की करुणा । देखो , देखो तो ….मेरे सन्मुख इस दृष्यमान कान्तिपुंज को तो देखो …..फिर बिल्वमंगल कहते हैं ….मेरे साथ चल रहे हो इस रस राज्य में तो देख ही रहे होगे ….लेकिन मेरा आग्रह है इसको ध्यान से देखो …..और सच बताओ …इसके जैसा किशोर कोई है ? इसके जैसा सौन्दर्य किसी में है ? नही है । बिल्वमंगल कहते हैं ….इसको ध्यान से निहारो ….इसलिए कह रहा हूँ कि कहीं तुम इसको देखने के बाद किसी ओर को न देखने लग जाओ ….इसलिए मैं कह रहा हूँ इसको देखो ….बस इसको देखो ….सच बताओ इसको देखने के बाद क्या और देखने की इच्छा रह जाती है ? नही रह जाती । इसको ही देखो ….इसी के आश्रय में रहो ….तुम्हारी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जायेंगी ….तुम इस एक को निहारो बस ।
इतना कहकर बिल्वमंगल नख से सिख तक अपने नवल किशोर को निहारने लगते हैं ।
फिर अपने लोगों को कहते हैं …..यही साधना है तुम्हारी , यही करो ….नख से सिख तक अपने मन के नयनों से इसे देखो …..यही करते रहो …इसी का आरोहण-अवरोहण करते रहो । इससे क्या होगा ? इस प्रश्न पर बिल्वमंगल कहते हैं ….”अमृतं” यही अमृत हैं …या यही अमृत प्राप्ति का स्थान हैं ….इनमें नख से सिख तक अमृत ही अमृत भरा हुआ है ….तुम नयनों से इस अमृत का पान करो ….फिर देखना तुम कभी नही मरोगे । अद्भुत बात कहते हैं यहाँ बिल्वमंगल ।
ये मात्र ज्योति स्वरूप ही नही हैं ……ये किशोर भी हैं ….यानि ये सुकुमार हैं ….बहुत सुकुमार हैं ….ये निराकार ज्योति ही मात्र नही है ….इनके तो मुख हैं …इनके अधर हैं …इनके तो नयन भी हैं ….हस्त भी हैं और चरण भी हैं । बिल्वमंगल हमें बता रहे हैं ….इनके हाथ कैसे हैं ? इनके हाथ तो ऐसे हैं ….मानों ये हाथ ,शरदकालीन कमलों को शिक्षा देने वाले हाथ हैं । ओह ! क्या उपमा दी है ….इनके हाथों को देखकर ही कमलों ने खिलना सीखा है । बिल्वमंगल कहना चाह रहे हैं …..इनके हाथ – शीतलता, सुकुमारता, सुन्दरता, सौरभता और शोभा से सुसंपन्न हैं ।
फिर सीधे चरणों की ओर देखते हैं बिल्वमंगल …….
इनके चरण भी सुन्दरता की राशि हैं …..अरुणता , सरसता और सौरभता लिए हुये हैं ये चरण ….स्वर्ग स्थित कल्पतरु के पुष्प पल्लवों को भी तिरस्कृत करने वाले हैं ये चरण ।
अब फिर बिल्वमंगल देखते हैं ऊपर नयनों की ओर …..नयनों को देखते ही ये स्तब्ध से हो जाते हैं ….सुध बुध भूल जाते हैं ….कुछ देर बाद इनकी स्थिति जब सहज सी होती है तब ये कहते हैं ……इनके नयनों को देखो …..चंचल-चपल हैं , अरुण डोरा पड़े हैं नयनों में ….जो देख ले वो मदहोश हो जाए ।
कोई तो उपमा दो ! किसी ने कहा ।
बिल्वमंगल बोले …क्या उपमा दें ? खंजन पक्षी , मृग , मछली , चकोर , आदि की जो उपमा है वो सारे उपमा यहाँ व्यर्थ लग रहे हैं ….ये नयन तो अलग ही हैं …कोई उपमा ही नही हैं इनके लिए ।
ये कहते हुए बिल्वमंगल फिर दर्शन-आनन्द के आवेश में डूब जाते हैं ….वो प्रेम सिंधु में डूबते और उबरते देखे जा सकते हैं इस श्रीकृष्णकर्णामृत में ।
क्रमशः….
Hari sharan


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