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August 30, 2025 1:58 am

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કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

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श्री सीताराम शरणम् मम, भाग 163 भाग 1,2 & 3 तथा अध्यात्म पथ प्रदर्शक 72,73 & 74: Niru Ashra

Niru Ashra: 🙏🥰 श्री सीताराम शरणम् मम 🥰 🙏
🌺भाग1️⃣6️⃣3️⃣ 🌺
मै जनक नंदिनी ,,,
भाग 1

 *(माता सीता के व्यथा की आत्मकथा)*

🌱🌻🌺🌹🌱🥰🌻🌺🌹🌾💐

“गतांक से आगे –

मैं वैदेही !

मेरे पुत्रों नें संगीत की शिक्षा शुरू कर दी थी ……..मैं सुनती तो मन्त्रमुग्ध हो जाती …..कितना सुन्दर गाते थे मेरे कुश लव ।

वर्षा कर देते …..शीतल हवा चलनें लगती …..कोयल से प्रतिस्पर्धा करते ……अल्हड़ थे ……..गाते गाते डूब जाते स्वर लहरी में ।

रामायण का गायन मेरे पुत्रों का …….मुझे रोमांच कर देता ……….अरण्य वासी थे इसलिये सहज थे …..।

ये जब गंगा किनारे या किसी सरोवर में बैठकर गाते …..तब इनके श्रोता होते पक्षी …..अनगिनत पक्षी ………तोता, मोर कोयल और हाँ ..मोर तो नाचते थे जब मेरे पुत्र गाते ।

मैं सुनती रहती ………..मेरे श्रीराम के जन्म की कथा का गायन ……….फिर ऋषि विश्वामित्र का उनको लेकर जाना…………।

तुम लोग आगे का प्रसंग क्यों नही सुनाते …? मैने एक दिन पूछा …….

हमें अभी तक गुरुदेव नें यहीं तक सिखाया है …………..पर माँ ! आपको क्या सुनना है ? मैं उनकी बातें सुनकर इतना ही कहती …..नही , ठीक है ……..मुझे कुछ नही सुनना …..लो भोजन कर लो ।

मैं फिर शाक , दाल और चावल उनके पात्र में रख देती ………वो खाते मैं उन्हें देखती रहती ……..कुश मेरे श्रीराम की तरह ही खाता है …..नीचे दृष्टि करके ……शान्त …….झुककर ………वो एक भी दाना अन्न का गिराता नही था ……….हाँ थोडा चंचल था लव ………।

माँ ! हमें ऐसा क्यों लगता है कि आप हमसे कुछ छुपा रही हो ?

बड़ी हिम्मत करके कुश नें मुझ से पूछा था ।……..अब माँ ! रो देगी !

लव बोला । मैने लव की ओर देखा ……चुपचाप भोजन कर ।

माँ ! एक बात बताओ ना ? कुश नें फिर पूछना शुरू किया ।

मेरा हृदय काँप रहा था ……..क्या पूछना चाहते हैं ये बालक आज ।

साग लोगे ? थोडा चावल ? मैने बात को बदलनें के लिये पूछा ।

नही मेरा तो पेट भर गया ……..लव अपना पेट दिखानें लगा था …..माँ ! देखो मेरा पेट ….कितना बड़ा हो गया ………….तू पेट फुला रहा है ……बड़ा बातूनी है तू ! ले थोडा और खा …….मैने उसके पात्र में थोडा चावल और डाल दिया था ।

माँ ! बताओ ना ! “कुश” का पूछना जारी था ।

क्रमशः….
शेष चरित्र कल ………!!!!!

🌹🌹जय श्री राम 🌹🌹
[] Niru Ashra: 🙏🥰 श्री सीताराम शरणम् मम 🥰 🙏
🌺भाग1️⃣6️⃣3️⃣ 🌺
मै जनक नंदिनी ,,,
भाग 2

 *(माता सीता के व्यथा की आत्मकथा)*

🌱🌻🌺🌹🌱🥰🌻🌺🌹🌾💐

“गतांक से आगे –

मैं वैदेही !

नही मेरा तो पेट भर गया ……..लव अपना पेट दिखानें लगा था …..माँ ! देखो मेरा पेट ….कितना बड़ा हो गया ………….तू पेट फुला रहा है ……बड़ा बातूनी है तू ! ले थोडा और खा …….मैने उसके पात्र में थोडा चावल और डाल दिया था ।

माँ ! बताओ ना ! “कुश” का पूछना जारी था ।

अब क्या बताऊँ तुझे ? चुपचाप भोजन कर और दूध पीकर सो जा ।

पर मेरे ब्रह्मचारी मित्र मुझ से पूछते हैं …….और हमारे पास इसका कोई उत्तर नही होता……….हमें चुप हो जाना पड़ता है …………माँ ! बताओ ना ! भैया के प्रश्न का उत्तर आपको देना ही पड़ेगा …..मुझ से भी पूछते हैं ……लव अपनें भाई कुश की और से बोल रहा है ।

अच्छा पूछ ! क्या पूछना है ? मुझे लगा था ये बालक रामायण सीख रहे हैं तो श्री राम के बारे में ही पूछेंगे …….हृदय को मजबूत किया मैने ……और अपनें पुत्रों से कहा ।

माँ ! हमारे पिता कौन हैं ?

मैं स्तब्ध हो गयी…..मैने सोचा नही था ये प्रश्न करेंगें मुझ से ये बालक ।

माँ ! बताओ ? आज बताना ही पड़ेगा आपको …………हमारे पिता का नाम क्या है ? हमारे कौन हैं पिता ?

माँ ! हमारे मित्र कहते हैं …….तुम्हारे पिता कौन हैं पता नही ।

माँ ! सबके पिता हैं हमारे पिता कहाँ हैं ?

क्या हमारे पिता नही हैं ?……..कुश नें आज कितनें प्रश्न कर डाले थे ।

मुझे लगा मेरा हृदय फट् जाएगा आज……..मैं क्या करूँ ? मैं क्या उत्तर दूँ ? मैं भागी….माँ ! चिल्लाते हुए मेरे पीछे मेरे बालक दौड़ पड़े थे ।

मैं दौड़ी……….मैं दौड़ते हुये महर्षि वाल्मीकि की कुटिया में गयी …।

महर्षि ! महर्षि ! मैं चिल्लाई ……….महर्षि कुटिया से बाहर आये पुत्री ! क्या हुआ ? तुम इस समय यहाँ ?

मैं उनके चरणों में गिर गयी थी………महर्षि ! अब सहन नही होता ।

मैं क्या करूँ ? मुझे बताइये मैं क्या करूँ ? मैं अपनें मस्तक को पटक रही थी भूमि में ।

क्रमशः….
शेष चरित्र कल ………!!!!!

🌹🌹जय श्री राम 🌹🌹
Niru Ashra: 🙏🥰 श्री सीताराम शरणम् मम 🥰 🙏
🌺भाग1️⃣6️⃣3️⃣ 🌺
मै जनक नंदिनी ,,,
भाग 3

 *(माता सीता के व्यथा की आत्मकथा)*

🌱🌻🌺🌹🌱🥰🌻🌺🌹🌾💐

“गतांक से आगे –

मैं वैदेही !

मुझे लगा मेरा हृदय फट् जाएगा आज……..मैं क्या करूँ ? मैं क्या उत्तर दूँ ? मैं भागी….माँ ! चिल्लाते हुए मेरे पीछे मेरे बालक दौड़ पड़े थे ।

मैं दौड़ी……….मैं दौड़ते हुये महर्षि वाल्मीकि की कुटिया में गयी …।

महर्षि ! महर्षि ! मैं चिल्लाई ……….महर्षि कुटिया से बाहर आये पुत्री ! क्या हुआ ? तुम इस समय यहाँ ?

मैं उनके चरणों में गिर गयी थी………महर्षि ! अब सहन नही होता ।

मैं क्या करूँ ? मुझे बताइये मैं क्या करूँ ? मैं अपनें मस्तक को पटक रही थी भूमि में ।

पुत्री सीता ! पर हुआ क्या ?………..मेरी दशा देखकर सजल नेत्र हो गए थे महर्षि के भी ।

महर्षि ! मेरे पुत्र पूछ रहे हैं ………..उनके पिता कौन हैं ?

महर्षि ! मेरे पुत्र पूछ रहे हैं उनके पिता का नाम क्या है ?

महर्षि ! मेरे पुत्र पूछ रहे हैं उनके पिता उनसे मिलनें क्यों नही आते ?

मैं क्या कहूँ ? अब मुझ में सहन करनें की शक्ति नही है ………आप मेरे पिता तुल्य हैं …….आप मेरे पिता ही हैं ……..बताइये महर्षि ! आपकी पुत्री क्या करे ? मैं रोये जा रही थी ……….महर्षि मेरी दशा देखकर वो भी अपनें आँसुओं को रोक न सके थे ।

मेरे पुत्र आगये थे मेरे सामनें …………मेरे पीछे पीछे ही आगये थे ।

पुत्री ! कुछ समय और सहन कर लो…..क्या करोगी ! समय आने दो……उस समय की प्रतीक्षा के सिवा हम कुछ नही कर सकते ।

देखो ! उठो और देखो… अपनें पुत्रों को…..तुम्हारे सामनें खड़े हैं ।

मैने अपनें आँसू पोंछे और जब लड़खड़ाते उठी तो …..

कुश लव रो रहे थे ……..और अपनें दोनों कानों को पकड़े हुए थे ।

माँ ! क्षमा कर दो …….हम आज के बाद तुमसे कुछ नही पूछेंगें …….

माँ ! हमसे गलती हो गयी …………..कुश और लव हिलकियों से रो रहे थे मैने उन्हें देखा ………..मैं दौड़ी उनके पास ….और उन्हें अपनें हृदय से लगा लिया …….हम तीनो ही रो रहे थे अब …….।

महर्षि वाल्मीकि ऊपर की ओर देखकर विधाता से कह रहे थे ……..कितना दुःख लिखा है इस सीता के भाग्य में तुमनें !

और कितना ? वो भी रो रहे थे ।

अपनी माँ का ध्यान रखना चाहिये वत्स !

पास में आकर मेरे बालकों के सिर में हाथ रखा महर्षि नें ।

चलो ! जाओ अब अपनी माँ को कुटिया में लेकर ……. सेवा करो वत्स ! ………माँ का ध्यान रखो !

जाओ पुत्री ! जाओ ! जल्दी ही वो समय आएगा जब तुम्हारे सारे दुःख दूर हो जाएंगे ……..महर्षि नें मुझ से वात्सल्य में कहा था ।

मैं चल पड़ी थी …………मेरा हाथ पकड़े मेरे दोनों पुत्र चल रहे थे ।

माँ ! ये कुश भैया हैं ना …….ये आपको रुलाते हैं …………..

लव इतना ही बोला……पर जब मेरा कोई उत्तर नही मिला उसे तब वो चुप हो गया …..मैं देख रही थी ……कुश उसे चुप रहनें को बोल रहा था ।

शेष चरित्र कल ………!!!!!

🌹🌹जय श्री राम 🌹🌹

Niru Ashra: 🌼🌸🌻🌺🌼🍁🌼🌸🌻🌺🌼

        *💫अध्यात्म पथ प्रदर्शक💫*

                      *भाग - ७२*

               *🤝 ३. उपासना  🤝*

      _*क्या ईश्वर-साक्षात्कार हो सकता है?*_ 

 *श्रुतिसिद्धान्तसारोऽयं तथैव त्वं स्वया धिया ।*
 *संविचार्य निदिध्यास्य निजानन्दात्मकं परम् ॥*
 *साक्षात् कृत्वा परिच्छिन्नाद्वैतब्रह्माक्षरं स्वयम् ।*
 *जीवन्नेव विनिर्मुक्तो विश्रान्तः शान्तिमाश्रय ॥*
           (तत्त्वोपदेश ८२-८३)

   'तत्त्वोपदेश' नामक ग्रन्थ में श्रीशंकराचार्य जी अपने शिष्य को साक्षात्कार–ब्रह्मसाक्षात्कार करने की विधि बतलाते हुए सब बातें समझाकर उपसंहार में कहते हैं- शिष्य ! इस प्रकार साक्षात्कार के सम्बन्ध में श्रुतियों के सिद्धान्त को साररूपमें मैंने तुमको बतलाया । अब इसी प्रकार अपनी बुद्धि के द्वारा यथार्थ निश्चय करके निदिध्यासन करो, उसको जीवन में उतारो। फिर जिसमें द्वैतभाव का सर्वथा नाश हो जाता है, ऐसे अपने आनन्दरूप अविनाशी परब्रह्म का साक्षात्कार करके तुम स्वयं इसी जीवन में - इस शरीरमें रहते हुए ही - भली- भाँति मुक्त हो जाओ तथा विश्रान्ति को प्राप्त करके शान्ति का आश्रय करो– *'जीवन्मुक्त होकर विचरो ।'*

   इस प्रकार *'ईश्वर-साक्षात्कार'* एक सत्य तत्त्व है। इतने पर भी मनुष्यों को उसपर शंका हुए बिना नहीं रहती; क्योंकि जीवों का यह स्वभाव है। उनको ऐसा विचार हुआ ही करता है कि क्या सचमुच ईश्वर-साक्षात्कार होता है? पढ़े-लिखे लोग तो कहते हैं कि 'यह *‘स्वयंविमोहन'* के अतिरिक्त कुछ नहीं है। यह तो अपने-आपको धोखा देनेके समान है।' इस स्थिति में आज हम लोग इस विषय पर विचार करेंगे ।

 कुछ समय पहले एक सन्त हो गये हैं। वे श्रोत्रिय तथा ब्रह्मनिष्ठ संन्यासी थे। उनकी कीर्ति आज भी सब ओर फैली है। इन महात्मा के पास एक विद्वान् ने जाकर निम्नलिखित प्रश्न किया-

   प्रश्न – *महाराज! आप तो समर्थ विद्वान् हैं, उच्चकोटि के भक्त हैं, साथ ही जीवन्मुक्त की दशा में विचरते हैं; मैं यह जानना चाहता हूँ कि आपको ईश्वर- साक्षात्कार हुआ है या नहीं? यदि आपके समान समर्थ सन्त को भी आजतक ईश्वर-साक्षात्कार न हुआ हो, तो फिर मेरे-जैसे मनुष्य को तो होगा ही कहाँ से? संक्षेप में, मैं इतना ही जानना चाहता हूँ कि ईश्वर का साक्षात्कार किसी को हो सकता भी है या यह केवल मन का भ्रममात्र है ?*

  *उत्तर*- भाई! आपने बहुत अच्छा प्रश्न किया। मैं आपको स्पष्ट शब्दों में बताता हूँ कि मुझ को ईश्वर का साक्षात्कार हो गया है और सदा-सर्वदा सर्वत्र मुझे उसी के दर्शन होते रहते हैं।

   प्रश्न – *परंतु महाराज! आपको सचमुच ही साक्षात्कार हुआ है, या साक्षात्कार का केवल आपका मानसिक भ्रम है? इसका निश्चय कैसे हो ?*

   *उत्तर* – मानना न मानना तो आपकी इच्छा पर निर्भर है, परंतु मुझे तो इतना निश्चय है कि इन्द्रियजन्य ज्ञान में भ्रम होना सम्भव है; क्योंकि वहाँ हमें अपने सीमित- मर्यादित शक्तिवाले साधनों से असीम, अनन्त और अगाध ब्रह्माण्ड का ज्ञान प्राप्त करना है।  ईश्वर के साक्षात्कार में भ्रम होने की सम्भावना ही नहीं है। आप यहाँ मेरे सामने बैठे हुए जितने प्रत्यक्ष हैं, मेरे लिये इससे भी अधिक प्रत्यक्ष ईश्वर है। इसका कारण यह है कि आप शरीर से दूर बैठे हैं, परंतु ईश्वर का अनुभव तो शरीर के रोम-रोम में होता रहता है। इससे बढ़कर स्पष्टीकरण और क्या होगा ?

   प्रश्न – *परंतु महाराज ! श्रुति तो कहती है कि 'अविज्ञातं विजानताम्' यानी जो यह कहते हैं कि 'हमें ईश्वर का साक्षात्कार हो चुका है' उनको तो वह हुआ ही नहीं, इसका क्या समाधान है ?*

   *उत्तर*- इस श्रुतिवाक्य को मैं जानता हूँ और जाननेपर भी यह कहता हूँ कि मुझे सर्वत्र ईश्वर के ही दर्शन होते हैं। आप इस श्रुतिवाक्य का तात्पर्य नहीं समझते, इसीसे आपको इसमें विरोध भास रहा है, बस, इतनी ही बात है।

   प्रश्न – *तब क्या महाराज? मेरे जैसा मनुष्य भी सचमुच ईश्वर-साक्षात्कार कर सकता है ?*

  *उत्तर*– अवश्य, ईश्वर का साक्षात्कार करने में अमुक वर्ण का ही अधिकार है, ऐसी बात नहीं है। अमुक आश्रम का अधिकार है, ऐसा भी नहीं है। इसी प्रकार पुरुष साक्षात्कार कर सकता है, स्त्री नहीं कर सकती, ऐसा भी कोई नियम नहीं है। वहाँ तो सबका समान अधिकार है; फिर आप क्यों नहीं कर सकते?

   क्रमशः.......✍

  *🕉️ श्री राम जय राम जय जय राम 🕉️*

Niru Ashra: 🌼🌸🌻🌺🌼🍁🌼🌸🌻🌺🌼

        *💫अध्यात्म पथ प्रदर्शक💫*

                      *भाग - ७३*

               *🤝 ३. उपासना  🤝*

      _*क्या ईश्वर-साक्षात्कार हो सकता है?*_ 

   बहुत-से लोग तो स्वयं ही अपने को धोखा देते हैं। वे मुँह से तो ऐसा कहते हैं कि हमें ईश्वर का साक्षात्कार करना है, पर साथ ही यह भी कहते हैं कि 'यह बड़ी कठिन बात है।' परंतु मेरा अनुभव तो यह कहता है कि मनमाने विषयों की प्राप्ति करना जितना कठिन है, उतना कठिन काम ईश्वर की प्राप्ति का नहीं है। विषयों की प्राप्ति के लिये जितना परिश्रम मनुष्य करता है, उसका दशांश परिश्रम भी ईश्वर की प्राप्ति के लिये नहीं करना पड़ता। सच बात तो यह है कि मनुष्य को जितनी इच्छा विषयप्राप्ति की है, उससे आधी जिज्ञासा भी ईश्वरप्राप्ति के लिये नहीं है। *'बोधसार'* में ठीक ही कहा है-

   *मुमुक्षा दम्भमात्रं ते न ते तीव्रा मुमुक्षुता ।*
 *तीव्रा यदि मुमुक्षा स्यान्न विलम्बो भवेदिह ॥*

   साधारण मनुष्य तो केवल बातें बनाना और शास्त्रों की निन्दा करना ही अपना काम समझते हैं। उनमें मुमुक्षा तो नाममात्र को भी नहीं होती, उसका दम्भ अवश्य होता है।

   *ईश्वर-प्राप्ति की तीव्र इच्छा होनेपर प्राप्ति होने में देर लगती ही नहीं। सत्य बात तो यह है कि मनुष्य को ईश्वर-साक्षात्कार की इच्छा ही नहीं होती; और वह कहता है कि 'भाई! यह इतना कठिन काम है कि इसका हो सकना सम्भव नहीं है।' इस प्रकार मनुष्य अपने-आपको धोखा देता है और या तो ईश्वर प्राप्ति को अत्यन्त कठिन बतलाता है, अथवा 'यह तो एक भ्रम है - मन की एक कल्पनामात्र है', यों जगत् में कहता-फिरता है। जगत् में बहुत से लोग इस प्रकार के मनुष्यों की बातों को सच मानकर अपनी मन्द जिज्ञासा को भी गवाँ बैठते हैं।*

   पर, ईश्वर-साक्षात्कार तो बहुतों को हुआ है। आज भी होता है और साधना करनेपर भविष्य में भी हुए बिना नहीं रहेगा। जो लोग कहते हैं कि *'ईश्वर साक्षात्कार होता ही नहीं है, अथवा वह तो केवल मानसिक भ्रममात्र है,'* वे कुछ भी परिश्रम न करके केवल बकवाद ही करनेवाले हैं।

   मेवाड़ में मीराँबाई को, दक्षिण में तुकाराम को, सौराष्ट्र में नरसी मेहता को और बंगाल में श्रीरामकृष्ण परमहंस को ईश्वर-साक्षात्कार होने की बात सभी मानते हैं। इस प्रकार ईश्वर- साक्षात्कार होता है, हुआ है और अवश्य होता है, यह निश्चित है। फिर, मानना न मानना तो अपने अधिकार की बात है।

   अब एक बात समझ लेने की है। अपने शास्त्रों में अधिकार के अनुसार विभिन्न साधनप्रणालियाँ बतलायी गयी हैं और इसीलिये पृथक्-पृथक् पारिभाषिक शब्दों का व्यवहार किया जाता है। *'ईश्वर-साक्षात्कार', 'आत्म-साक्षात्कार', 'आत्मा-परमात्माका मिलन', ‘भगवत्प्राप्ति', 'भगवद्दर्शन', 'आत्मज्ञान'* आदि विभिन्न शब्दों का प्रयोग एक ही स्थिति को बताने के लिये होता है। एक गीता में ही देखिये तो इसके लिये भिन्न-भिन्न कई शब्दों का प्रयोग मिलेगा। यहाँ शब्दों में विभिन्नता होनेपर भी तात्पर्य एक ही है और विभिन्न शब्दों के प्रयोग का कारण साधन-प्रणालियों का भेद है।

 *भगवान् परमात्मेति प्रोच्यतेऽष्टायोगिभिः।*
 *ब्रह्मेत्युपनिषन्निष्ठैर्ज्ञानं च ज्ञानयोगिभिः ॥*

  उस परमतत्त्व को भक्त भगवान् कहते हैं, अष्टांगयोगी परमात्मा, वेदान्ती ब्रह्म और ज्ञानयोगी ज्ञान-ज्ञानस्वरूप कहते हैं।

  *वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम् ।*
  *ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥*
                 (श्रीमद्भागवत १।२।११)

   एक ही अद्वयज्ञानतत्त्व को तत्त्ववेत्तागण 'ब्रह्म' कहते हैं, कोई परमात्मा कहते हैं तो कोई भगवान् कहते हैं। नाम पृथक्-पृथक् हैं, वस्तुतत्त्व एक ही है।

   *इतना स्पष्टीकरण करने में हमारा हेतु यह है कि आजकल लोग गुरु के समीप रहकर शास्त्राभ्यास तो करते नहीं, अपने-आप ही ग्रन्थ पढ़ने लगते हैं। ग्रन्थों में प्रसंगानुसार भिन्न-भिन्न शब्दों का प्रयोग देखकर उनको विरोध दिखायी देता है और वे 'स्वयं नहीं समझते' ऐसा न मानकर 'यह सब मिथ्या है' यों कह देते हैं।*

   किन्हीं भी दो मनुष्यों की बुद्धि पर स्थित संस्कार एक-से नहीं होते। इसका कारण पूर्वजन्म के कर्म हैं। यों समस्त साधकों को पहुँचना तो है उस एक ही मुकामपर- एक ही परमात्मा में, परंतु संस्कार-भेद के कारण सबका अधिकार एक-सा नहीं होता। इसीलिये भिन्न-भिन्न साधनमार्गों का होना अनिवार्य है। संक्षेप में इतना ही समझ लेना है कि चेतन सत्ता एक ही है और वही अनेक नामों से पुकारी जाती है- *'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति ।'* सद्वस्तु एक ही है, चेतन एक ही है; परंतु अधिकार भेद से विद्वानों ने उसका अनेक प्रकार से वर्णन किया है। इस बात को शास्त्र ने यों समझाया है-

 *मणिर्यथाविभागेन नीलपीतादिभिर्युता ।*
 *रूपभेदमवाप्नोति ध्यानभेदात् तथाच्युतः ॥*

   एक स्फटिक मणि रखी हो और उसके चारों ओर नीले, पीले, लाल, काले पुष्प पड़े हों। इससे पृथक्-पृथक् दिशाओं से देखनेपर मणि पृथक्-पृथक् रंगों की दिखायी देगी। परंतु मणि तो शुद्ध-श्वेत ही है, केवल पुष्पों का रंग उसमें प्रतिबिम्बित होता है। इसी प्रकार परमात्मा स्वरूपतः एक ही है, तथापि साधन-प्रणालियों के भेद से उसको भिन्न-भिन्न प्रकार से साधकगण भजते हैं और बुद्धि के संस्कारभेद के कारण भिन्न-भिन्न साधन-प्रणालियों का होना अनिवार्य है।

   क्रमशः.......✍

  *🕉️ श्री राम जय राम जय जय राम 🕉️*

Niru Ashra: 🌼🌸🌻🌺🌼🍁🌼🌸🌻🌺🌼

        *💫अध्यात्म पथ प्रदर्शक💫*

                      *भाग - ७४*

               *🤝 ३. उपासना  🤝*

      _*क्या ईश्वर-साक्षात्कार हो सकता है?*_ 

   *यदि ईश्वरीय साक्षात्कार न होनेकी बात होती, वह केवल बुद्धि का भ्रम ही होता, तो जीवन्मुक्त की स्थिति का वर्णन, जो अनादिकाल से चला आता है, न चलता। झूठी बात सदा नहीं निभ सकती। एक मनुष्य को बहुत कालतक भ्रम में रखा जा सकता है, सब लोगों को थोड़े दिनों के लिये भ्रम में रखा जा सकता है, परंतु सारे जगत् को सदा के लिये भ्रम में रखना नहीं बन सकता। ईश्वर-साक्षात्कार यदि बुद्धि का भ्रम ही होता तो कोई भी विचारशील पुरुष उसके लिये अथक परिश्रम नहीं करता और आज भी शास्त्ररीति के अनुसार यदि कोई मुमुक्षु साधना करता है तो उसको ईश्वर- साक्षात्कार हुए बिना नहीं रहता। जबतक ईश्वर है, तबतक ईश्वर का साक्षात्कार होगा ही और ईश्वर सदा सर्वदा रहेगा ही। उसका अभाव कभी सम्भव ही नहीं।* दूसरी तरह से देखें तो न्यायदर्शन कहता है-

   *'प्रयोजनमनुद्दिश्य न मन्दोऽपि प्रवर्तते ।'*

  कोई भी प्रयोजन सिद्ध करना न हो तो एक बुद्धिहीन मनुष्य भी किसी काम में प्रवृत्त नहीं होता, तो फिर शास्त्रों को ऐसा क्या प्रयोजन था कि वे मनुष्यों को भ्रम में डालते? वेद तो ईश्वरप्रणीत हैं, उपनिषद् साक्षात्कार प्राप्त किये हुए ऋषियों की प्रसादी हैं, स्मृतिग्रन्थ और पुराण भी तपःपूत ऋषियों के द्वारा लिखित हैं। इन ऋषियों में कोई भी ईषणा नहीं थी। वे अरण्य में त्यागप्रधान तपस्वी जीवन बिताते थे। उनको लोककल्याण के सिवा दूसरी कोई कामना ही नहीं थी। ऐसी स्थिति में उनको एक भ्रममूलक सिद्धान्त को उपस्थित करनेमें क्या प्रयोजन हो सकता है ? सच बात तो यह है कि मानव-जीवन की सदा चरितार्थता ही है — ईश्वर - साक्षात्कार कर लेने में । विषयभोग तो सभी योनियों में बिना परिश्रम ही प्राप्त हैं। इससे यह स्वीकार करना पड़ता है कि उनका बतलाया हुआ सिद्धान्त यथार्थ ही है और वह लोककल्याण के लिये ही है।

          अब एक बात और कहनी रह गयी । विज्ञान का भौतिक प्रयोग करते समय भी 'इस प्रयोग का अमुक परिणाम आयेगा' ऐसी श्रद्धा से ही प्रयोग का प्रारम्भ होता है। परंतु इसमें कुछ अंश में कुतूहल-वृत्ति भी होती है कि 'देखें तो सही क्या होता है?' पर अध्यात्म-साधना में तो ऐसी बात चलती ही नहीं; वहाँ तो सम्पूर्ण श्रद्धा चाहिये। कुतूहल-वृत्ति का लेशमात्र भी वहाँ नहीं रहता। श्रद्धा के बिना किया हुआ कर्म निरर्थक हो जाता है। यह बतलाते हुए भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-

 *अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।*
 *असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥*
           (गीता १७/२८)

   अश्रद्धा से किया हुआ यज्ञ, दिया हुआ दान, तपा हुआ तप-अभिप्राय यह कि अश्रद्धा से किया गया कोई भी कर्म हे पार्थ! व्यर्थ हो जाता है। उसका फल न तो इस लोक में मिलता है, न परलोक में ही।

   तब अध्यात्म-साधना में क्या आवश्यक है? यह प्रश्न सहज ही होता है और इसका उत्तर भी भगवान् ने पहले से दे रखा है-

   *श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।*
 *ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥*
           (गीता ४/३९)

   तात्पर्य यह कि ज्ञान की प्राप्ति के लिये – ईश्वर का साक्षात्कार करने के लिये सबसे पहले आवश्यकता है श्रद्धा की । श्रद्धा की कमी होगी तो साधना भाव और प्रेम से होगी ही नहीं और अध्यात्ममार्ग में उसका होना अनिवार्य है। इसके बाद साधना में *'तत्परता'* चाहिये। दो दिन करें और चार दिन न करें, इससे काम नहीं चलता। साधना तो सतत और आलस्य-प्रमाद से रहित होनी चाहिये और सबसे अधिक आवश्यक है *‘इन्द्रियनिग्रह'*। इन्द्रियों का संयम न होगा तो जैसे छेदवाले घड़े से जल निकलता जाता है, इसी प्रकार साधना का बल भी घटता चला जाता है। ये तीनों बातें होती हैं तो ज्ञान होता है और ज्ञान होते ही तत्काल शान्ति मिल जाती है । इसीका नाम है- *ईश्वर-साक्षात्कार* ।

हरिका मार्ग शूर-वीरोंका कायरका नहिं काम भाई ।
सबसे पहले मस्तक देकर पीछे लेना नाम भाई ॥

   क्रमशः.......✍

  *🕉️ श्री राम जय राम जय जय राम 🕉️*
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Author: admin

Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877

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