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August 30, 2025 2:02 am

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કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

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श्री सीताराम शरणम् मम 165 भाग 1,2,3 तथा अध्यात्म पथ प्रदर्शक: Niru Ashra

Niru Ashra: 🙏🥰 श्री सीताराम शरणम् मम 🥰 🙏
🌺भाग 1️⃣6️⃣5️⃣🌺
मै जनक नंदिनी ,,,
भाग 1

 *(माता सीता के व्यथा की आत्मकथा)*

🌱🌻🌺🌹🌱🥰🌻🌺🌹🌾💐

“वैदेही की आत्मकथा” गतांक से आगे

मैं वैदेही !

“श्रीराजाराम अश्वमेध यज्ञ कर रहे हैं पुत्री”

महर्षि वाल्मीकि नें आकर मुझे सूचना दी ।

क्या ! मैं चौंक गयी थी ।

कोई कारण महर्षि ! अश्वमेध यज्ञ करनें का ? …….मैने पूछा ।

मैने सुना है आत्मग्लानि से भर गए हैं श्रीराम ………..

पर क्यों ? ऐसा क्या कृत्य हुआ है उनसे…जो आत्मग्लानि से भर गए ।

“शम्बूक” नामक शुद्र का वध जो कर दिया राजा राम नें ……..महर्षि के मुख से ये सुनकर मैं स्तब्ध हो गयी ।

पर कुछ तो अपराध किया होगा ना उस शम्बूक नें ……..बताइये ना महर्षि ? मैने प्रार्थना की ।

तपस्या कर रहा था वो शम्बूक………..जो उसके अधिकार क्षेत्र में नही आता । महर्षि का कहना था ।

क्या तपस्या और लोग नही कर सकते ? शुद्र तप नही कर सकता ?

मेरे प्रश्न का उत्तर दिया महर्षि नें ।

“ईश्वर की भक्ति कर सकते हैं ……….ईश्वर के पवित्र नाम का स्मरण कर सकते हैं ……….पर तपस्या करके सशरीर स्वर्ग जानें की जिद्द तो अनधिकार चेष्टा हुयी ना पुत्री ?

मैं और स्पष्ट सुनना चाहती थी महर्षि के मुख से ।

क्या किसी को भी वैज्ञानिक शोध करनें की आज्ञा दी जासकती है ?

या कोई भी राष्ट्राध्यक्ष के निवास पर जानें की जिद्द करे…….तो क्या उसकी जिद्द पूरी की जा सकती है ?

वैज्ञानिक प्रयोगशाला में किसी को प्रवेश का अधिकार नही दिया जा सकता …….क्या पता वो वहाँ जाकर क्या कर दे !

ऐसे ही स्वर्ग जानें की जिद्द से कोई अगर तपस्या करे ……….और उसमें अभी अधिकार नही आया…..तो क्या उसकी जिद्द मान लेनी चाहिये ?

महर्षि स्वयं मुझ से पूछ रहे थे ।

मैने कहा – नही ….व्यक्ति को उतनी ही स्वतन्त्रता प्राप्त होती है ….या होनी चाहिये ……जिससे व्यवस्था या सुरक्षा संदिग्ध न हो ।

पुत्री ! सतयुग में एक ही वर्ण था ब्राह्मण…..सब ब्राह्मण ही थे ।

पर त्रेतायुग के आते आते……ब्राह्मण, जो सत्वगुण से ओतप्रोत है …..उसे ब्राह्मण कहा गया ………जो रजोगुण और सत्वगुण से मिश्रित था उसे क्षत्रिय कहा गया …….जो मात्र रजोगुणी स्वभाव का था उसे वैश्य कहा गया …….और जो तमोगुणी था उसे शुद्र कहा गया ।

महर्षि मुझे समझा रहे थे……..मस्तक ब्राह्मण है ……..हाथ क्षत्रिय हैं ……पेट वैश्य है…………और पांव शुद्र हैं ।

इसमें कोई बड़ा छोटा नही सब बराबर हैं…पर कार्यक्षेत्र बांटा गया है ।

जिसकी सात्विक बुद्धि नही है…उसनें तप करके अगर शक्ति पा ली….तो क्या उसकी शक्ति से समाज में शान्ति आएगी या वो अपनी शक्ति का दुरूपयोग ही करेगा समाज में अशान्ति फैलानें के लिये !

मुझे घटना सुनाइये …..मेरे श्रीराम से क्या हुआ ? मैने प्रार्थना की ।

मुझे महर्षि नें उस घटना के बारे में बताया…जो अयोध्या में घटी थी ।

क्रमशः….
शेष चरित्र कल…..!!!!!

🌹🌷 जय श्री राम 🌷🌹
Niru Ashra: 🌼🌸🌻🌺🌼🍁🌼🌸🌻🌺🌼

        *💫अध्यात्म पथ प्रदर्शक💫*

                      *भाग - ७८*

               *🤝 ४. चिन्तन  🤝*

                       _*पुरुषार्थ*_ 

   अब हम आवश्यकतानुसार धर्मकी विवेचना करें। महर्षि कणाद की व्याख्या बहुत ही सुन्दर है, अतएव पहले उसको देखें। वे कहते हैं-
*'यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः ।'*
  जिसके आचरण से अभ्युदय और निःश्रेयस की सिद्धि होती है, वह धर्म है। यहाँ निःश्रेयस साध्य है और अभ्युदय केवल साधन है अर्थात् निःश्रेयस को खोकर अभ्युदय की सिद्धि नहीं हो सकती अभ्युदय का अर्थ है जीवन-निर्वाह का साधन, जिसे हम ऊपर *'अर्थ-काम'* के रूप में देख चुके हैं। निःश्रेयस का अर्थ है मोक्ष, जिसका स्वरूप भी ऊपर कहा जा चुका है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि धर्म के आचरण से ही अर्थ, काम और मोक्ष तीनों सिद्ध होते हैं। इसी भाव को लक्ष्य में रखकर श्रीव्यासजी कहते हैं-

 *न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्*
              *धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः ।*
   *धर्मो नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये*
             *जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः ॥*
  अतएव किसी पदार्थ को प्राप्त करने के निमित्त से, किसी भय से बचने के लिये, भोग्य पदार्थों के लोभ को तृप्त करने के लिये तथा जीवन को बचाने के लिये भी, चाहे जैसा विकट प्रसंग हो, मनुष्य को धर्मावलम्बन का त्याग नहीं करना चाहिये। इसका तात्पर्य समझाते हुए कहते हैं कि धर्म तो नित्य है, वह कभी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ता, सदा साथ ही रहता है, जहाँ सुख-दुःख, लोभ-मोह तथा जीवन-मरण के प्रसंग क्षण-क्षण में बदला करते हैं। जीव नित्य है और इस कारण धर्म भी नित्य उसके साथ रहता है तथा जीव को प्राप्त हुआ संसार (अर्थ और काम) क्षणिक है। अतएव क्षणिक सुख की प्राप्ति तथा क्षणिक दुःख की निवृत्ति के लिये धर्म को नहीं छोड़ना चाहिये।

   श्रीव्यासजीने धर्ममात्र का सार निकालकर इस प्रकार कथन किया है-

   *श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम् ।*
  *आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥*
  समस्त धर्म का तत्त्व मैं तुम्हें संक्षेप में कहता हूँ, सुनो और सुनकर उसपर मनन करके उसे हृदय में उतारो, आचरण में लाओ। तुमको जो आचरण प्रतिकूल लगता हो, अर्थात् जैसे व्यवहार से तुम्हारा दिल दुखता हो, वैसा व्यवहार तुम कदापि किसी दूसरे के साथ न करो। इस प्रकार प्रत्येक कार्य करते समय मनुष्य को यह विचार करना चाहिये कि कोई दूसरा आदमी मेरे साथ ऐसा व्यवहार करे तो वह मुझे अच्छा लगेगा या नहीं? यदि इसका उत्तर 'हाँ' में हो, तभी वैसा व्यवहार दूसरे के साथ करे अन्यथा लाख कारण होनेपर भी न करे।

  इसी प्रसंग को तुलसीदासजी महाराज ने यों कहा है-

  *परहित सरिस धर्म नहिं भाई ।* 
  *पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥*
  कहने का तात्पर्य इतना ही है कि धर्म के सम्बन्ध में जितना लिखा जाय, उतना ही थोड़ा है। प्रत्येक मनुष्य कभी सारे धर्मग्रन्थों को पढ़ नहीं सकता, इससे श्रीव्यासजी ने आधे ही श्लोक में धर्म की व्याख्या यहाँ पर कर दी। दूसरे का हितसाधन, अर्थात् अपने हित का बलिदान करके भी दूसरे के हित का साधन ही धर्म है। इसके विरुद्ध दूसरे को पीड़ा पहुँचाना, अन्य का अहित करना ही अधर्म है।

   क्रमशः.......✍

  *🕉️ श्री राम जय राम जय जय राम 🕉️*

[] Niru Ashra: 🙏🥰 श्री सीताराम शरणम् मम 🥰 🙏
🌺भाग 1️⃣6️⃣5️⃣🌺
मै जनक नंदिनी ,,,
भाग 2

 *(माता सीता के व्यथा की आत्मकथा)*

🌱🌻🌺🌹🌱🥰🌻🌺🌹🌾💐

“वैदेही की आत्मकथा” गतांक से आगे

मैं वैदेही !

मुझे घटना सुनाइये …..मेरे श्रीराम से क्या हुआ ? मैने प्रार्थना की ।

मुझे महर्षि नें उस घटना के बारे में बताया…जो अयोध्या में घटी थी ।


भरी सभा में उस समय एक ब्राह्मण आया ……….और श्रीराजा राम के सामनें अपनें पुत्र का शव रखते हुए बोला ……..हे राम ! यही है आपका रामराज्य ? बालक असमय काल के ग्रास बन रहे हैं !

पुत्री सीता ! श्रीराम चौंक गए थे……….ऐसा कैसे हुआ ?

देखो राजन् ! आप राजा हो…….अगर आपकी प्रजा अकाल मृत्यु का ग्रास बन रही है तो कमी हैं कहीं …..ये विचार आप कीजिये ।

राजा राम चिंतित हो उठे थे ……….पर कुछ देर बाद ही एक और ब्राह्मण आया ……..उसकी गोद में भी ऐसे ही एक मृत बालक था ।

ये दूसरी घटना हुयी थी……..राजा राम काँप गए ……ये क्या ?

हे राम ! रामराज्य का ढिढ़ोरा पीटनें वाले राम ! देखिये आपके राज्य में क्या हो रहा है …………….बचाइये इसे …………….दो मृत बालक श्रीराम के चरणों में छोड़ दिए थे उन ब्राह्मणों नें ।

राम खड़े हुये ………मैं इसके ‘कारण” में जाऊँगा ……..और जो भी कारण होगा उसे मिटाऊंगा ।

इन दो बालकों के शव को सुरक्षित रखा जाए ……राम इन्हें जीवन प्रदान करेगा ……….और अगर नही किया तो …..? राम स्वयं आमरण अनशन में बैठता है …………।

पुत्री सीता ! राजा राम के इस अनशन की घोषणा से सब दुःखी हो गए …….ब्राह्मण भी दुःखी हो गए …………पर श्री राम अपने वचन पर अडिग थे ।

पूरी अयोध्या नें अनशन किया …….क्यों की उनका प्यारा राजा ही भूखा प्यासा है तो प्रजा कैसे खाये !

गुरु वशिष्ठ जी भी नही खोज पा रहे थे कारण …………..

महर्षि वाल्मीकि मुझे बता रहे थे………….मैं सुन रही थी ।

एक दिन देवर्षि नारद मेरे गुरुदेव …….राजा राम के पास गए …..रात्रि का समय था …अनशन में बैठे थे श्रीराम …….तब देवर्षि बोले …..

हे रामभद्र ! मुझे “कारण” पता है ……..कि आपके राज्य में बालकों की मृत्यु क्यों हो रही है ?

राजा राम उठे …..चरणों में प्रणाम किया देवर्षि के …….क्या कारण है देवर्षि ? आपको अगर ज्ञात है तो कृपा करके मुझे बताएं ।

चलो मेरे साथ ……..देवर्षि आगे और राजा राम पीछे पीछे चल पड़े थे ….कहाँ जाना है ये बात मात्र देवर्षि जानते थे……..राजा श्रीराम अनुसरण कर रहे थे देवर्षि का ।

क्रमशः…..
शेष चरित्र कल…..!!!!!

🌹🌷 जय श्री राम 🌷🌹
[2 Niru Ashra: 🌼🌸🌻🌺🌼🍁🌼🌸🌻🌺🌼

        *💫अध्यात्म पथ प्रदर्शक💫*

                      *भाग - ७९*

               *🤝 ४. चिन्तन  🤝*

                       _*पुरुषार्थ*_ 

   इस प्रकार क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य? क्या पुण्य है, क्या पाप? तथा क्या शुभ है, क्या अशुभ ? इसका विवेक बुद्धि में निश्चय करना ही धर्म का प्रथम लक्षण है- धर्म का कार्यक्षेत्र है। अतएव अशुभ का त्यागकर शुभ को ग्रहण करना, पाप का पन्थ छोड़कर पुण्य के पन्थ पर चलना तथा अपने ही हित का विचार छोड़कर समष्टि के हित को अपना कर्तव्य समझना ही धर्म का आचरण है।
   *इस प्रकार जिसको धर्माचरण करना हो, उसके लिये तो धर्म का यह व्यावहारिक स्वरूप स्पष्ट और असंदिग्ध है; क्योंकि धर्म तो सनातन है। धरणी को जो धारण करे, वह धर्म है-यह धर्म की व्युत्पत्ति है, तब फिर व्यष्टि-समष्टि जीवन को धारण कर रखने के लिये धर्म का अवलम्बन आवश्यक क्यों न हो?*
   परंतु आज के विज्ञान के युग में तो धर्म का नाम सुनकर ही मनुष्यों को घृणा होती है, फिर उसके पालन की आशा कैसे की जा सकती है? यह स्थिति देखकर कुछ लोगों को रोष होता है, कुछ को आश्चर्य होता है और बहुतों को दुःख भी होता है, परंतु समझदार मनुष्य को ऐसा करनेकी आवश्यकता नहीं। एक आस्तिक हिन्दू की दृष्टि में तो यह कलियुग का ही सहज प्रभाव है - युग की ही महिमा है। इस दृष्टि से इस समय श्वेतवाराहकल्प का अट्ठाईसवाँ कलियुग चल रहा है। यों एक आस्तिक हिन्दू की दृष्टि में यह कोई सहसा आयी हुई अचिन्त्य घटना नहीं है, बल्कि कालक्रम से ऐसा चलता ही आता है। ऐसा होनेपर भी मार्ग भूले हुए लोगों को सच्चा रास्ता बताना प्रत्येक बुद्धिमान् मनुष्य का कर्तव्य है और ऐसा ही प्रत्येक युग में होता भी आया है।
   *अपना प्रत्येक कार्य करते समय हमको विचारना पड़ेगा कि इस कार्य से जनसमाज की तो कोई हानि नहीं हो रही है? परहित-साधन होता है या नहीं, इसका भी ध्यान रखना पड़ेगा तथा परपीड़न तो हो ही नहीं, ऐसा दृढ़ निश्चय करना पड़ेगा।*
   ऐसा व्यावहारिक ज्ञान तो बालकों को प्राथमिक शिक्षाकाल में पहले दिया जाता था।
   *'परमेश्वरकी है प्रजा सारा यह संसार ।'*
   अतः-
  *‘एक कुटुम्बी हम सभी, एक पिता परिवार ।'*
   इस प्रकार की समझ होनेपर ही, जैसे मनुष्य अपनी एक जेब की किसी वस्तु को चुराकर उसे दूसरी जेब में नहीं रखता, वैसे ही दूसरे का अहित करके कभी भी मनुष्य अपना हित-साधन नहीं कर सकेगा।

   क्रमशः.......✍

  *🕉️ श्री राम जय राम जय जय राम 🕉️*

[Niru Ashra: 🙏🥰 श्री सीताराम शरणम् मम 🥰 🙏
🌺भाग 1️⃣6️⃣5️⃣🌺
मै जनक नंदिनी ,,,
भाग 3

 *(माता सीता के व्यथा की आत्मकथा)*

🌱🌻🌺🌹🌱🥰🌻🌺🌹🌾💐

“वैदेही की आत्मकथा” गतांक से आगे

मैं वैदेही !

महर्षि वाल्मीकि मुझे बता रहे थे………….मैं सुन रही थी ।

एक दिन देवर्षि नारद मेरे गुरुदेव …….राजा राम के पास गए …..रात्रि का समय था …अनशन में बैठे थे श्रीराम …….तब देवर्षि बोले …..

हे रामभद्र ! मुझे “कारण” पता है ……..कि आपके राज्य में बालकों की मृत्यु क्यों हो रही है ?

राजा राम उठे …..चरणों में प्रणाम किया देवर्षि के …….क्या कारण है देवर्षि ? आपको अगर ज्ञात है तो कृपा करके मुझे बताएं ।

चलो मेरे साथ ……..देवर्षि आगे और राजा राम पीछे पीछे चल पड़े थे ….कहाँ जाना है ये बात मात्र देवर्षि जानते थे……..राजा श्रीराम अनुसरण कर रहे थे देवर्षि का ।

एक स्थान …………दुर्गम स्थान था वो ……………वहाँ देवर्षि लेगये …..और एक काले व्यक्ति को दिखाया …………जो अत्यन्त कुरूप था ……..वृक्ष से उलटा लटका हुआ था ……….और नीचे से उसनें धूम्र दी थी अपनें मुख में …………।

ये क्या है देवर्षि ? राजा राम नें पूछा ।

इसका नाम है “शम्बूक” ……….चाण्डाल है ये …………….फिर ये ऐसा कार्य क्यों कर रहा है …….ये कार्य तो सात्विक व्यक्तियों का है न ।

हाँ ……….ये सशरीर स्वर्ग जानें के लिये तप कर रहा है …….।

देवर्षि नें कहा ।

पर सशरीर स्वर्ग जाना ये मानव के अधिकार क्षेत्र में नही आता ।

हाँ ……और ऐसी ही जिद्द का परिणाम आपके ही सूर्यवंशी राजा त्रिशंकु का हम देख चुके हैं ………हे राजा राम ! त्रिशंकु नें भी जिद्द की थी ……पर उन्हें देवताओं नें जानें कहाँ दिया स्वर्ग ….उलटे लटक गए ।

वो राजा त्रिशंकु फिर भी रज और सत्व से मिश्रित क्षत्रिय थे पर ये तो तमोगुणी शुद्र है ……..!

हे राम ! जाओ ……..और इसका वध करो ………देवर्षि नें कहा ।

नही …….मैं इसको कैसे मार सकता हूँ …….इसका अपराध क्या है ?

अनधिकार चेष्टा अपराध है राम ! निष्काम तप कोई भी कर सकता है ….निष्काम तप, जप, कोई भी कर सकता है ………पर सकाम तप के लिये कुछ निश्चित हैं ………सकाम तप के लिये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ही निर्धारित हैं……….क्यों की सकाम का प्रयोग करनें के लिये विवेक का होना आवश्यक है …..और उस शुद्ध विवेक की प्राप्ति के लिये सात्विक बुद्धि का होना भी अतिआवश्यक है ।

राम ! जाओ और वध करो इस शम्बूक का …….देवर्षि नें फिर कहा ।

श्रीराम गए……..और जाकर देखा उस शम्बूक को ।

बन्धु ! ये तप छोड़ दो ……….और निष्काम कर्म में लग जाओ …..सेवा भाव से तुम वो सब पा सकते हो …….जो इस तप से तुम्हे मिलेगा ।

राजा श्रीराम गम्भीर भाव से बोल रहे थे ।

जाओ जाओ ! राम ! मैं तुम्हारी बातें सुननें वाला नही हूँ ……….मुझे तप करनें दो और ऐसी शक्ति प्राप्त करनें दो …..जिससे मैं स्वर्ग से आ जा सकूँ ……मेरी यही इच्छा है । शम्बूक की कर्कश आवाज आयी ।

पर तुम्हारी इस जिद्द के कारण निरपराध लोग मर रहे हैं ………….

मुझे कोई मतलब नही है ……..कोई मरे या जीये !

शम्बूक नें राजा राम की बात न मानी ………….

तब काँपते हाथों से खड्ग निकाला श्रीराम नें ……और दौड़े उस शम्बूक के पास ………..और देखते ही देखते उसका मस्तक धड़ से अलग कर दिया ।

पर श्रीराम के पवित्र हाथों से मृत्यु पानें पर वो शम्बूक मुक्ति का ही अधिकारी हो गया था……..देवों नें पुष्प वृष्टि भी की थी ।

मेरे मुँह से निकला ……..ओह !…………मुझे महर्षि वाल्मीकि ये घटना सुना रहे थे ……..मैं स्तब्ध थी ।

शेष चरित्र कल…..!!!!!

🌹🌷 जय श्री राम 🌷🌹
[] Niru Ashra: 🌼🌸🌻🌺🌼🍁🌼🌸🌻🌺🌼

        *💫अध्यात्म पथ प्रदर्शक💫*

                      *भाग - ८०*

               *🤝 ४. चिन्तन  🤝*

                        _*प्रारब्ध*_ 

 *सुखमापतितं सेव्यं दुःखमापतितं तथा।*
 *चक्रवत् परिवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च॥*

   नीतिकार कहते हैं कि सुख के भोग आवें तो उन्हें भोग लो। ये भोग हमारे गत जन्मों के शुभ कर्मों के फलस्वरूप ईश्वर के अनुग्रह से प्राप्त हुए हैं। अतः अपने जीवन का निर्वाह कोर-कसर के साथ करके बचे हुए को प्रभु प्रीत्यर्थ शुभकर्म में लगाओ, न कि मौज-शौक में खर्च करो। वैसे ही दुःख के भोग आ जायँ तो वे भी अपने कर्म के ही फल हैं अतएव उन्हें धैर्य से सहन करो और इसके लिये किसी को दोष न दो। फिर, सुख का समय सदा बना नहीं रहता, इसलिये उस समय जितनी हो सके भलाई कर लो, वैसे ही दुःख के दिन भी सदा नहीं रहते, इसलिये शान्ति से उस समय को बिता दो ।
   *गाड़ी के पहिये में बहुत सी अराएँ होती हैं । पहिये के कारण वे अराएँ ऊपर-नीचे आया-जाया करती हैं। इसी प्रकार जीवन के पहिये की सुख-दुःखरूपी अराएँ फिरती ही रहती हैं, कोई अरा सदा एक जगह स्थिर नहीं रह सकती, जब सारा विश्वचक्र घूमता रहता है तो फिर सुख-दुःख स्थिर कैसे रह सकते हैं?*
   अपने ऋषि-मुनियों का इतना बड़ा उपकार है कि उनके ऋण से कभी हमारा छुटकारा नहीं हो सकता उससे मुक्त होने का केवल एक ही उपाय है कि हम उनके उपदेशों के अनुसार आचरण करके मुक्ति प्राप्त कर लें। इसके सिवा ऋणमुक्त होने का दूसरा कोई मार्ग नहीं है।
   *प्रत्येक मनुष्य को अपनी जीवन-नीति ऐसी बनानी चाहिये कि जिससे वह उत्तरोत्तर उन्नति कर सके। इसके लिये उन्होंने चार पुरुषार्थों की योजना बनायी। ये चारों पुरुषार्थ केवल मानव-शरीर में ही सिद्ध हो सकते हैं, इस कारण मानव-शरीर सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। ये पुरुषार्थ हैं—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । इनमें से बीच के दो—अर्थ और काम यानी जीवननिर्वाह के साधन तो जन्म से पहले ही निश्चित हो जाते हैं और इन निश्चित कर्मफल भोगों को ‘प्रारब्ध' नाम दिया जाता है। इस प्रकार स्थूल शरीर अपने निर्वाह के विषय में पूर्णरूप से प्रारब्ध के अधीन है। अतः उसके लिये कोई खास परिश्रम नहीं करना पड़ता। फिर धर्म को प्रमुख स्थान देकर यह सूचित किया गया है कि शरीर- निर्वाह के साधनों को प्राप्त करने में भी धर्म का अवलम्बन नहीं छोड़ना चाहिये। यदि अधर्म से शरीर का भोग प्राप्त किया जाय तो अन्तिम और सर्वश्रेष्ठ पुरुषार्थ मोक्ष सिद्ध नहीं हो सकता। इस बात को एक दृष्टान्त द्वारा समझिये ।*
   एक मनुष्य छल-कपट से किसी को धोखा देकर १००० रुपये प्राप्त करता है और अहंकार से फूलकर अपनी होशियारी बताकर कहता है ‘देखो, मैंने कैसी चालाकी से घड़ीभरमें १००० रुपये कमा लिये।' परंतु यह तो भयंकर अज्ञान है। रुपये तो प्रारब्ध के अनुसार मिलने थे, वे मिल गये, परंतु उसके साथ जन्म-जन्मान्तर में अधोगति प्रदान करनेवाला जो पाप कमाया, इसका क्या होगा? अर्थ और काम के साधन स्थूल जगत् के हैं, अतएव बाह्य व्यवहार में प्रत्यक्ष रूप से हमको जो कुछ प्राप्त होता है, वह प्रारब्ध के भोग के अनुसार ही मिलता है, परंतु धर्म तथा मोक्ष दोनों का सम्बन्ध आन्तरिक मनोभाव के साथ है, इनके लिये पुरुषार्थ करना चाहिये । १००० रुपये तो प्रारब्ध के योग से मिलनेवाले थे, सो मिले परंतु उसने पुरुषार्थ के रूप में अधर्म ही कमाया। 
   *अतएव मोक्ष के साधन के  लिये धर्म का अवलम्बन आवश्यक है। इसके लिये इन चारों पुरुषार्थों का समन्वय ऐसे करना चाहिये । धर्म के मार्ग पर चलते हुए शरीर का निर्वाह यथा- प्राप्त करता रहे और जीवन का अन्तिम ध्येय तो मोक्ष ही है, यह निश्चय करके ऐसा कोई भी काम न करे, जो मोक्ष की सिद्धि में विघ्न उत्पन्न करता हो।* 
   परंतु आज के युग में भोगवासना इतनी अधिक तीव्र बनती जा रही है कि मनुष्य को धर्म का नाम लेने में भी हिचकिचाहट होती है, तब फिर उसके नियमों का पालन तो वह कैसे कर सकता है? अपने शरीर के सिवा और कुछ भी उसको नहीं दीखता। अतएव शरीर को सुख पहुँचाने में ही वह जीवन की इति कर्तव्यता मानता है। प्रत्येक मनुष्य को सबसे अधिक भोग-सामग्री चाहिये, तब फिर जीवन में संघर्ष न हो तो क्या हो? और जहाँ संघर्ष में ही जीवन बिताना पड़ता है, वहाँ सुख का दर्शन कहाँ ? – *'अशान्तस्य कुतः सुखम् ।'*

   क्रमशः.......✍

  *🕉️ श्री राम जय राम जय जय राम 🕉️*
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