श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! सावन कौ झूला !!
भाग 1
बरसानौ है……या गाँव कौ नाम बरसानौ है……प्रेम कौ रस यहाँ बरसतौ ही रहे…….पर अभै तो वर्षा ऋतू और है…….बड़ी बड़ी बुँदन के प्रहार कूँ ब्रह्मांचल पर्वत ऐसे सह रह्यो है……जैसे दुष्टन कि वाणी कूँ कोई सन्त सहे है……..गहवर वन के मेढ़क ऐसे बोल रहे हैं ……जैसे वटु ब्रह्मचारी वेद कौ सस्वर पाठ कर रहे हौं ……..आकाश में बिजुरी चमके और फिर ऐसे चली जाए जैसे दुष्ट के हृदय में प्रेम आयो और कब गयो पतौ ही नायँ चले ।
आज सावन कौ प्रारम्भिक काल है ……..बरसानें की सखियन में अद्भुत उत्साह देखिवै में आय रह्यो है ……..अद्भुत उत्साह और उमंग ।
कदम्ब की डार में झूला डारयो है…….सब सखी आय के श्रीराधिका जू कूँ झुलाय रही हैं ।
“आग लगे ऐसे सावन पे”…………श्रीजी के हृदय में तो बस श्याम सुन्दर हैं ……और उनके बिना कहा सुख या झूला कौ ?
झौंटा देवे वारो श्याम सुन्दर होय……और झूलवे वारी श्यामा जू ।
कदम्ब के पुष्पन ते मादक सुगन्ध निकल रही है ……..पर या सुगन्ध ते कहा ? वो नीलमणी तो हैं नायँ………….
बू होते ! झुला तो रही हैं सखियाँ………झौंटा हूँ दे रही हैं ……..गीत भी गाय रही हैं ……..पर – साँवरे सजन बिना सब व्यर्थ है ।
आहा ! कितनौ आनन्द आतो अगर श्याम और मैं होती ………वो सलोना सजन होता और बस मैं होती…….पर उनके बिना तौ, ये सावन भी जीया में अगन ही लगाय रह्यो है………कहाँ हो प्यारे !
श्रीराधारानी कौ हृदय पुकार उठ्यो ।
अरी ललिता ! देख तो………बा दूर पे कोई सखी रोय रही है ।
हाँ सच में ही दूर गहवर वन में कोई नई नवेली नार रो रही थी …..उसके सुबुकनें की आवाज स्पष्ट आरही थी ……करुणा की मूर्ति हमारी लाडिली नें वाकौ रुदन सुन लियो हो ………..तभै तौ अपनी प्रिय सखी ललिता ते कही ……देखौ वहाँ………कोई सखी रोय रही है ।
सखियाँ गयीं………सच में एक सखी रोय रही ही ।
सब सखियाँ बाकुं लेकर आय गयीं श्रीजी के पास ।
नख ते सिख तक श्रीजी नें वा सखी कूँ देख्यो ……….बड़ी सुन्दर सखी है ……साँवरी है……..कटीले नयन हैं……..पतली कमर है ……..अद्भुत रूप सौन्दर्य की धनी है ये ………श्रीजी भी देखती रहीं ।
काहे कूँ रोवे है सखी ! श्रीजी नें वा सखी ते बड़े प्रेम ते पूछ्यो ।
“सावन आय गयो है …….पर मोकूँ झूला झुलाये वे वारो कोई नही है”,
बू साँवरी सखी फिर रोयवे लगी……….
*क्रमशः …
