श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! उफ़ ! ये अनुराग !!
तात ! जीवन की सार्थकता अनुराग में ही है ।
यमुना के तट में बैठे हैं दो परमभागवत उद्धव और विदुर जी …..श्रीकृष्ण लीला का गान करके मत्त हैं ।
उद्धव स्वयं अनुराग में डूबकर बोल रहे हैं ।
जिस जीवन में प्रेम नही, वह जीवन नही जंजाल है ……..तात ! जो समय अपनें सनातन प्रियतम की प्रतीक्षा में न बीते वह समय क्या ?
उफ़ ! किसी के मिलनें की प्रतीक्षा ! पल पल छिन छिन गिना जाए वही तो समय की सार्थकता है ।
आँखें ! तात !, आँखें किसी के चितवन के लिये प्यासी बनी रहें …..यही तो आँखों की सार्थकता है !
उद्धव आज अनुराग के सुरभित जल में भींगें हुये हैं ।
कान सदैव किसी की मीठी बोली सुननें के लिये सदा उत्कंठित रहें ।
क्या यही कान की सफलता नही है ?
हृदय किसी के लिए तड़फता रहे ।……..हाँ, वो हृदय की क्या जो किसी की याद में न तड़फे ।
वो हृदय ही क्या जो किसी की मीठी स्मृति चुभती न रहे ।
स्मृति शून्य हृदय भी भला हृदय कहलानें योग्य भी है ?
किसी की उत्कंठा बिना काल यापन करना क्या काल की सार्थकता है ?
कुछ देर रूक गए उद्धव बोलते बोलते …………..यमुना के बहते जल को देखा ……..कमल खिले हुए हैं …….उनमें अपनी दृष्टि गड़ाई ……..फिर कुछ देर बाद बोले ………….
बृज की बृजांगनाएं विश्व वन्दनीय और परम भाग्यशाली है …….क्यों की उनकी हर चेष्टा में मात्र उनका वो साँवरा ही रहता है ।
उनके रोम रोम में साँवरा है ……प्रत्येक काल में उनका कन्हैया है …….हर वस्तु में वही वही है ………पल पल वे लीलामाधुरी का ही पान करती रहती हैं ।
ग्रीष्म ऋतु में घर में रहकर कन्हैया की लीलाओं का गान करती हैं …….जब बादल छा जाते हैं वर्षा ऋतु आ जाती है ………तब बादलों को देखकर अपनें श्याम घन की मधुर यादों में खो जाती हैं ………बारिश में भीगती हैं ……….कीच को अपनें देह में मलती हैं ……..कि मेरा कन्हैया इनमें चला है ………..चलता है …………..।
आकाश के इंद्र धनुष को देखती हैं ………तब नीले आकाश में कन्हैया ही इंद्र धनुष के रूप में दीखते हैं ……..वही नीलमणी …।
शरद प्रारम्भ हुआ………..कीच धरती की सूख गयी ………अब तैयार हो गया वृन्दावन …………नाना प्रकार के पुष्प खिल उठे हैं ………उसके सुगन्ध से महक रहा है पूरा वन प्रान्त ।
उस समय सुन्दर अतिसुन्दर कन्हैया सज धज के निकलते हैं ………बस ……..पुष्पों से पूरा मार्ग पटा दिया है इन गोपियों नें …………
उफ़ ! ये अनुराग भी …….उद्धव आज इतना ही बोले ।


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