श्रीकृष्णचरितामृतम्-! प्रेम की बोली अटपटी – “गोपिकागीतम्” !!-भाग 1 : Niru Ashra

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श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! प्रेम की बोली अटपटी – “गोपिकागीतम्” !!

भाग 1

तात ! प्रेम का एक मापदण्ड कहाँ ? हाँ ज्ञान का एक मापदण्ड है …..योग का एक मापदण्ड है…..पर प्रेम का कोई मापदण्ड नही ।

वहाँ तो स्तुति करना प्रेम , गाली देना प्रेम, वहाँ प्रसन्न होता प्रेम तो रूठना भी प्रेम ……उफ़ ! प्रेम अद्भुत है ……..प्रेम विलक्षण है ।

उद्धव विदुर जी को “गोपिका गीतम्” सुना रहे हैं ………विदुर जी नें ही उद्धव को सम्पूर्ण गीत सुनानें का आग्रह किया था …….इसलिये उद्धव सुना रहे हैं …………..और सुनाते हुये स्वयं भाव में डूब जाते हैं …..विदुर जी तो कभी आनन्दित होकर हँसते हैं ……..कभी अश्रु प्रवाहित करनें लग जाते हैं ।

तात ! ये प्रेम की चाल है इसे कोई समझ नही पाता …………

इतना कहकर गोपियों के द्वारा गाया गया गीत सुनानें लगे थे उद्धव ।


यमुना का पुलिन है ……….शरद की रात्रि है ……….चन्द्रमा पूर्ण खिले हैं उसकी चाँदनी यमुना की बालुका में चमक रही है……..वहीं पर विरहाकुल गोपांगनाएँ अपनें प्रियतम को पुकार रही है …………कुछ कुछ कह देती हैं ………..भाव में डूबी ये बृजगोपी, प्रेम से सिक्त वाणी जब इनकी निकलती है ……तब समझ में आता है कि प्रेम क्या है ?

क्यों की प्रेम की आचार्या यही तो हैं – बृजगोपी ।

हे प्रेम के सरोवर में विहार करनें वाले ! कहाँ चले गए ?

हमारा वध करके चले गए ? अरे ! हम तो तुम्हारी बिन मोल की दासी हैं ………दास दासियों से ऐसा व्यवहार कौन करता है सखे !

हम जानती हैं ………तुम चोर हो ……..तुम सबकुछ हरण कर लेते हो ……..तुमनें शरद ऋतु में सरोवरों में खिले कमल की शोभा को चुरा लिया …………हद्द है !

हाँ, हम झुठ कहाँ कह रही हैं ……………यही तो सच है ………आज इस शरद के समय में ………सरोवरों के जल में जब कमल खिले ……तब उसकी शोभा का कौन वर्णन कर सकता है ………..पर तुम तो बस चुराना जानते हो …………तुम ही तुम रहो …..बाकी किसी की कोई शोभा न रहे …….यही तो तुम चाहते हो ………..बेचारे कमल की सारी शोभा ही चुरा ली ………..अब तो इन कमलों को कौन देख रहा है …….सब तुमको खोज रही हैं ।

उस गोपी के मुख से ये सुनते ही श्रीराधारानी हँसी ।

……….कुछ भी ! कुछ भी कह रही हो ! श्रीराधा नें कहा ।

नही , हम सच कह रही हैं ………..तभी तो कमल भी इनसे कपट करता है …………और जब इनको अपनें समीप आते हुए देखता है तो गहरे जल में चला जाता है ……अपनी बची कुची शोभा को बचानें के लिये ।

*क्रमशः …

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