श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! महारास में गोपेश्वर महादेव – “रासपञ्चाध्यायी” !!
भाग 2
आप नही जा सकते ।
श्रीजी की दो सखियों नें महादेव को रोक दिया था ।
पर मैं महादेव ! अपना परिचय देते हुए भी आनन्दित थे महादेव ।
इसलिये नही जा सकते ………सखियाँ भी हँसी ।
मैं समझा नही बृज गोपियों ! महादेव भोले बाबा हैं ।
आप पुरुष हैं ………..और रास में पुरुष का प्रवेश कहाँ ?
हाँ , यहाँ तो एक ही पुरुष हैं …….श्यामसुन्दर ……बाकी सब गोपियाँ हैं ………..इन सखियों ने “प्रेमपत्तनम्” के संविधान समझा दिए थे ।
पर ! महादेव अपनी जटायें खुजानें लगे ।
इसमें इतना सोचना क्या ………..पुरुष यानि अहंकार ! और प्रेम नगरी में अहंकार का कोई काम ही नही है……..यही नियम है प्रेम का ।
महादेव अभी भी सोच रहे हैं …………..तब सखियाँ बोलीं ।
इतना मत सोचिये …………पुरुष का चोला उतारिये …..बनिए गोपी ……हे महादेव ! तब आपको इस वृन्दावन में प्रवेश मिलेगा ।
महादेव आनन्द में उछले ……..मुझे तो जैसे भी हो वृन्दावन में प्रवेश चाहिये ……चाहे जो करना पड़े ……..महादेव आनन्द से भरे हैं ।
तो महादेव ! इस सरोवर में डुबकी लगाइये………इस सरोवर का नाम है “मानसरोवर”…….नही नही …ये आपका कैलाश वाला मानसरोवर नही है ……ये हमारी प्रिया जू का “मानसरोवर” है …..इसका आचमन नित्य श्यामसुन्दर करते हैं ……….यहीं हमारी प्रिया जू मान करके एक दिन बैठी थीं ……श्याम सुन्दर नें बहुत मनाया तब जाके मानीं ….इसलिये इस सरोवर का नाम “मान सरोवर” पड़ा है ।
सखी बता ही रही थी कि …..महादेव नें तो सरोवर में प्रवेश करके डुबकी लगा भी ली ………।
सखी मानसरोवर के बारे में और भी बहुत कुछ बोलती रही ………पर …..वो एकाएक चौंक गयी ……क्यों की सरोवर से निकल कर एक अत्यन्त गौर वर्णी सुन्दरतम जटा जूट वाली गोपी आरही थी………
सखी आनन्दित हो गयी…….अब आप जा सकती हो …..
हँसते हुये बोली ।
उधर भगवती उमा नें देखा तो अपना माथा पकड़ लिया ।
महारास चल रहा है ….दिव्य छटा है वहाँ की ……..ये रसना क्या गायेगी वहाँ के बारे में ……..ये मन्द बुद्धि क्या वर्णन करे वहाँ के बारे में ।
वो अवर्णनीय है………….मन बुद्धि सबसे परे जो तत्व है ……वही वहाँ नाच रहा था ……….ठुमक रहा था ……जिसका वर्णन करते हुए वेद भी कह देते हैं नेति नेति ……….वह यहाँ अहीर की कन्याओं के साथ नाच रहा था ……….चन्द्रमा पूर्ण था …..पर ये चन्द्रमा वो नही था …..जो नभ में है …..ये तो कुछ और ही है ……महादेव चकित रह गए थे ।
पर ये क्या ! श्याम सुन्दर नाचते हुये रुक गए ………..सब सखियों को उन्होंने छोड़ दिया था ।.
महादेव कहते हैं – श्रीराधा रानी मेरी ओर देखकर मुस्कुरा रही थीं …….मैं पूर्णानन्द में निमग्न था …….
तभी श्याम सुन्दर मेरी ओर आये …….सब मुझे ही देखनें लगे थे ।
मेरे पास आकर रुके श्याम सुन्दर ……..फिर मुस्कुराये ……..अँजली बाँधकर कर मस्तक को मेरे सामनें झुकाया ………..हे गोपेश्वर ! आपका स्वागत है मेरे इस रासमण्डल में ।
ओहो ! मेरा नाम भी रख दिया था श्यामसुन्दर नें ……….गोपेश्वर ! अच्छा नाम है ……………पर मैं कुछ और कहता उसके पहले ही श्यामसुन्दर नें मुझे गलबैयां दीं ………और अपनें रासमण्डप की ओर लेकर चल दिए ……………हाँ मेरे सर्प बिच्छु मुझे परेशान अवश्य कर रहे थे ……..क्यों की वो सब मेरे देह से चिपके हुए थे …….मैं डर इसी बात से रहा था कि ….कहीं ये बाहर न आजायें …….आनें की कोशिश में थे…..पर बाहर मैने उन्हें आनें नही दिया ………….श्यामसुन्दर नें मेरी पूजा की …..और सब सखियों से करवाई ।
मेरी जटायें ………श्यामसुन्दर नें खोल दीं थीं ……..मुझे मध्य में विराजमान कर दिया था ………बिल्बपत्र मेरे ऊपर अनन्त चढ़ायें होंगे सब सखियों नें ……..और स्वयं इन अनादि दम्पति श्रीराधा कृष्ण नें ।
पुष्पों से मुझे ढँक दिया था …….अर्क पुष्प मल्लिका की मालायें ….पारिजात के पुष्प ……….मैं तो गदगद् था ……..फिर मुझे उठाकर मेरे साथ रासेश्वर नें नृत्य भी किया ।
मेरी अर्धांगिनी उमा, वो तो मुझे देखकर बारबार माथा ही पकड़ रही थी……….मैंनें उन्हें बुलाना चाहा वृन्दावन में ……….पर मेरे बुलानें से क्या होता ! बिना अहंकार से मुक्त हुये इस श्रीधाम में कोई प्रवेश भी तो नही पा सकता ।
आप मेरे गोपेश्वर हैं ……..ये कहते हुये मुझे आलिंगन किया था मेरे श्याम सुन्दर नें ……ओहो !
*शेष चरित्र कल –


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