श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! श्यामाश्याम द्वारा अद्भुत शिवार्चना !!
भाग 1
नमः शम्भवाय च, मयो भवाय च !
नमः शिवाय च, शिवतराय च !!
उद्धव आज आनन्दित होकर स्वयं इन शिव मन्त्रों का उच्चारण करनें लगे थे………
क्या हुआ उद्धव ! तुम भगवान शंकर को क्यों मनानें लगे एकाएक ?
विदुर जी नें हँसते हुये पूछा ।
तात ! अम्बिका वन पहुँचकर श्यामाश्याम युगल सरकार नें भगवान शंकर की अर्चना की थी……और स्वयं महादेव आनन्दित हो उठे थे ।
उद्धव नें विदुर जी को कहा ।
वैसे तो भगवान शंकर “वंशी” के रूप में सदैव श्यामसुन्दर के साथ हैं ……वंशी रूद्र हैं….रूद्रावतार हैं ।
और जब देखा भगवान शंकर के पुत्र श्रीगणेश जी नें ……तो मनसुख के रूप में वो भी अवतरित हो गए…..और समस्त सखाओं में मुख्य यही कहलाये……लम्बोदर रूप तो है ही गणपति का ……तो मनसुख के रूप में भी यही स्वरूप था …..मोदक कुछ ज्यादा ही प्रिय हैं इनको ।
आहा ! तात ! अम्बिका वन में आनन्द छा गया था वो दिन भी महाशिवरात्रि का ……..उद्धव गदगद् होकर बोल रहे हैं ।
सुनाओ ! मुझे ये प्रसंग सुनना है ……….उद्धव ! तुम स्वयं श्रीकृष्ण सखा हो इसलिये तुम्हारे मुख से श्रीकृष्ण लीला प्रत्यक्ष हो उठती है ।
विदुर जी नें उद्धव को कहा…….तो उद्धव सुनानें लगे थे आगे का प्रसंग ।
( साधकों ! ये अम्बिका वन कहाँ है बृज में , इस प्रश्न को जब मैने जानना चाहा , भिन्न भिन्न स्थानों के नाम सबनें मुझे बताये ……किसी विद्वान् नें तो अम्बा जी ( राजस्थान और गुजरात की सीमा ) भी कहा …..किसी का कहना था राजस्थान आमेर , किसी नें बरसानें के पास बताया …….पर प्रमाणिक मुझे लगा मथुरा में महाविद्या कॉलोनी है ..और वहाँ महाविद्या देवी हैं ……..उस स्थान को ही अम्बिका वन कहा गया है जहाँ सब बृजवासी गए थे …….एक मेरी मित्र का कहना था …महाविद्या कॉलोनी के पास कारागार है ………..जहाँ वसुदेव देवकी कैद थे …..फिर वहाँ जाकर नन्दादि नें वसुदेव जी का कोई उल्लेख क्यों नही किया !
कारागार नगर के मध्य नही होता ………दूर ही होता है ….और था …..इसमें अम्बिका वन का वहाँ न होना सिद्ध नही होता ……….मैं स्वयं पहले नही मान रहा था महाविद्या कॉलोनी को अम्बिका वन …..पर जब गोपाल चम्पू और श्रीभागवत जी में यमुना जी का उल्लेख न हो कर सरस्वती नदी का उल्लेख किया गया …….तब मुझे लगा कि महाविद्या कॉलोनी में सरस्वती कुण्ड भी है ……..उसका अपना इतिहास होगा ही ..और आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व सरस्वती का स्रोत खुलता होगा, इसलिये मेरी दृष्टि में महाविद्या कॉलोनी का क्षेत्र ही अम्बिका वन है )
अम्बिका वन में पहुँचकर सबसे प्रथम सबनें सरस्वती नदी में स्नान किया …….फिर बृजराज आदि बड़े बूढ़े बृजवासियों नें तो जल सरस्वती से भरभर कर शिवालय को धोया ।
स्नान श्रीकृष्ण नें भी अपनें सखाओं के साथ किया था ……..गोपियाँ श्रीकृष्ण को स्नान करती देख वो सब भी सरस्वती नदी में उतर गयीं थीं ।
श्रीराधारानी अतिउत्साहित थीं …..और क्यों न हों उनके प्रियतम उनके साथ थे………स्नान करके स्वच्छ और पवित्र वस्त्रों को इन सबनें धारण किया था …………….
लाला ! हम सब शिवरात्रि का व्रत कर रहे हैं…तू माखन रोटी खा लेना ।
यशोदा मैया नें अपनें लाला को कहा था ………
लाली ! तू भी रोटी खा लीयो …….कीर्तिरानी नें भी अपनी बेटी श्रीराधारानी से कहा ।
ना ! मैं भी व्रत करूँगा ………मैया ! मैं कुछ नही खाऊँगा !
कन्हैया नें जब अपनें सखाओं के मध्य से अपनी मैया को कहा ….तो सखाओं नें तालियाँ बजाईं ।
यही उत्तर श्रीराधारानी नें भी अपनी मैया कीर्तिरानी को दिया था ।
बृजराज तो शिवालय को धोकर …………..बड़े प्रेम से वहाँ के ब्राह्मणों को दान देनें लगे थे …………वो सारी दान की सामग्रियाँ बैल गाड़ियों में भरकर ही नन्दगाँव से लाये थे …..अन्न वस्त्र धन र खूब लुटानें लगे थे बृजराज ।
पर उनके लाडले श्रीकृष्ण….अम्बिका वन में चले गए ।
“मुझे बिल्व पत्र चाहिये ……..मनसुख ! एक भी बिल्ब पत्र में छिद्र न हो ….ध्यान देना”…….मनसुख चढ़ गया था बिल्व के वृक्ष में ……..वो तोड़ रहा था पत्र ……नीचे से कन्हैया उसे बता रहे थे ।
ये आँक के पुष्प…….श्रीदामा नें आकर दिखाये ।
इसकी तो पूरी माला बनाई जाय और महादेव को अर्पण किया जाए …..कैसा रहेगा श्रीदामा ! श्रीकृष्ण नें श्रीदामा से ही पूछा ।
बहुत बढ़िया ………इससे बढ़िया बात और क्या होगी …..तो मैं आँक के पुष्प खूब सारे तोड़ता हूँ……….श्रीदामा चला गया ……अर्क पुष्प तोड़ने ……..मनसुख बिल्ब पत्र तोड़ ही रहा था ….अन्य सखाओ को भी विजया के पत्र इत्यादि के लिये भेज दिया था ।
*क्रमशः …


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