श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! अजगर नें जब नन्दबाबा को निगला…!!
भाग 2
तभी नन्द बाबा नें देखा ……..नेत्र बन्दकर के ध्यान में लीन हैं श्रीकृष्ण !
बस, हे कृष्ण ! ओ लाला ! कन्हैया ! मुझे बचा ! ये अजगर तेरे पिता को निगल रहा है……आर्त पुकार थी नन्दबाबा की ।
कमल नयन खुल गए……वो उठे ……..मुड़े ….और दौड़ते हुये जैसे ही शिवालय से बाहर आये ……देखा ……एक अजगर नें मेरे बाबा को निगल लिया है……..सबकी रक्षा करनें वाले ये …..अपनें पिता की रक्षा नही करेंगे……वो पूरी ताकत से दौड़े……..अजगर के पास पहुँचे …….और अपनें दक्षिण चरण का जैसे ही प्रहार किया …….
अजगर का देह तो वहीं छूट गया……उसमें से दिव्य एक सुन्दर सजा धजा युवक प्रकट हुआ……और उसनें श्रीकृष्ण चरणों में वन्दन प्रदक्षिणा सब की ।
“मैं विद्याधर हूँ……”सुदर्शन” मेरा नाम है……मैं सुन्दर हूँ मुझें इसी बात का अहंकार था…….वो दिव्य पुरुष तो सबके सामनें हाथ जोड़कर कन्हैया को अपना इतिहास सुनानें लगा था ।
अहंकार था मेरे अंदर तो मैने एक दिन अष्टावक्र ऋषि को देख लिया …..अहंकार से ग्रस्त मैं ……….मैं सुन्दर …..अतिसुन्दर ! और ऋषि अष्टावक्र कुरूप …….मैं हँसा …………पर मेरी हँसी रुकी ही नही …..आठ जगह से टेढ़ा व्यक्ति …………ऋषि अष्टावक्र नें रुक कर मेरी ओर देखा…….फिर उन्होंने मुझे श्राप दे दिया था ……जाओ ! अजगर हो जाओ……..ओह ! ….इतना बोलकर वो सुदर्शन रोता रहा…….अश्रु पोंछे उसनें ………फिर बोला ………करुणा जाग गयी थी मेरे प्रति उन ऋषि के मन में…….इसलिये हे भगवन् ! आपके चरण का स्पर्श मुझे मिला ……मैं धन्य हो गया हूँ……..इतना कहकर फिर उस सुदर्शन नें चार प्रदक्षिणा किये श्रीकृष्ण के …..और चला गया अपनें लोक में ।
लाला ! ये क्या हुआ ? मनसुखादि आश्चर्य से पूछनें लगे ………
लाला ! एक पैर से तेनें उस अजगर को मार दिया और वो कौन था ?
नन्दबाबा भी पूछनें लगे तो तुरन्त कन्हैया नें कहा……बाबा ! महादेव का अभिषेक मैने किया ना …..इसलिये मेरे पाँव में शक्ति आगयी ।
मनसुख नें एक पत्थर में जोर से अपनें पाँव को मारा ……….
ओये ! मेरे तो पाँव टूट गए ………….चौं रे ! कन्हैया ! अभिषेक तो हमनें हूँ करी …..पर पाँव में तेरे ही शक्ति क्यों आई ?
मनसुख ! मैने श्रद्धा से करी…….हँसते हुये अपनें बाबा को लेकर कन्हैया शिवालय में आगये थे ।
भोर हुयी ………सबनें स्नान किया सरस्वती में ………..दान पुण्य करके वृन्दावन सब चले आये थे ।
उद्धव नें ये विदुर जी को सुनाया ।
*शेष चरित्र कल –


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