श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! “श्रीकृष्णानुस्मरणः” – गोपियों की ध्यान साधना !!
भाग 1
गोपियों नें विदा किया गौचारण के लिये श्यामसुन्दर को …..अपलक देखती रहीं जा रहे हैं श्याम सुन्दर और बलभद्र , पीछे ग्वाल मण्डली है …..जब दूर चले गए श्याम सुन्दर तब गोपियां अपनें घरों में आयीं ।
नेत्रों के आगे अब नही हैं वे भुवन सुन्दर …….तो क्या हुआ …..हृदय में तो हैं, मन में हैं चित्त में वही वही समाये हुये हैं ।
नेत्र कहाँ देखते हैं वस्तु को ………..वो तो चित्त देखता है …. आपका चित्त नही हैं आपके पास तो क्या सामनें की वस्तु को नेत्र देखेंगे ?
नही ………………।
वो गोपियाँ भोजन बैठा देती हैं……..पर उनका चित्त लगा है श्यामसुन्दर में……..गोपियाँ हैं यहाँ …..पर भाव जगत में वो जा चुकी हैं श्यामसुन्दर के साथ……….वो भोजन बनाते हुये ध्यान करती हैं ……..नही नही ध्यान से आप ये मत समझना कि आँखें बन्दकर लेती हैं …….नही, उनकी आँखें खुली हैं …….वो खुली आँखों से ध्यान करती हैं ………उनका मन श्याम सुन्दर के पास जा चुका है ।
“कृष्ण” ……….कहते हुये आह भरती हैं ………..मानों ध्यान से पहले प्राणायाम कर रही हों……………
ओह ! कितनें सुन्दर लग रहे हैं ये श्याम………बाएँ भुजा पर अपनें बाएं कपोल को रखा हुआ है……चंचल नेत्रों को कैसे नचा रहे हैं …………और उसपर भी वेणु को अधरों में धर कर …….फूँक मार रहे हैं ……उसकी सुरभित साँसों से वेणु भी धन्य हो रही है ।
*** गोपीयों का ध्यान प्रारम्भ हो जाता है –
सखी ! कितना अच्छा होता वो सुरभित साँस मेरे मुँह पर भी वो फेंकते ….मेरी लटें उड़ जातीं……मैं उन सुगन्धित साँसों से मत्त हो जाती ……..बेकार में इस बाँस की पोली लकड़ी में । …..सखी भावोन्माद में भर जाती है ।
ओहो ! ये तो गायों का दूध स्वयं ही मुख लगाकर पीनें लगे …….
ये गाय भी भाग्यशाली हैं……बहुत भाग्य शाली ……….नभ में देखो बड़े बड़े सिद्धात्मा विमान में बैठ कर श्यामसुन्दर की एक एक लीला को देख रहे हैं ……उन सिद्धों की पत्नियाँ भी साथ हैं ……. वे तो सब भूल गयीं हैं ……….वस्त्र गिर रहे हैं उनके ……..पर उन्हें कुछ भान ही नही है …….ऐसे में ये गौएँ कितनी भाग्यशालिनी हैं …………कि उनके स्तन से मुँह लगाकर श्याम दूध पी रहे हैं …………..।
ये तो ध्यान है …….ध्यान में डूबी गोपियाँ कहाँ कहाँ चली जाती हैं कुछ पता ही नही चलता …….।
“भाग्यशाली तो इनकी मैया यशोदा है……धन्य है…….अपनें हाथों से खिलाती है…….सुलाती है…….हर तरह से ध्यान रखती है ……पता नही क्या पुण्य लेकर आईँ हैं ये यशोदा……..कल ही तो गयी थी मैं सजा रही थी वो अपनें लाला को…….स्नान करा दिया था ……वो नीलमणी बिना वस्त्र के कैसा चमक रहा था……उसका अंग अंग प्रकाश का चौंधा मानों फेंक रहा था ।
मुकुट, मोर मुकुट सिर में धारण किया हुआ ……फेंट में बाँसुरी …….लकुट ले ली थी हाथ में ……..पीताम्बरी सुवर्ण के समान चमचमा रही थी …………यशोदा मैया नें ही तो सजाया था उसे …….उस पर सखी ! वो मुस्कुरा रहा था ………..उफ़ ! सीधे जिगर में खंजर ।
*क्रमशः …


Author: admin
Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877