श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! केशीमर्दन !!
भाग 1
कालिन्दी के किनारे ग्वाल सखा सब बैठे हैं………..हरी हरी दूब चारों और फैली हुयी है …….गौएँ चर रही हैं बड़े आनन्द से ।
मनसुख नें श्रीदामा से कहा ……तब श्रीदामा नें भोज्य पदार्थ निकाले थे ……उसमें नाना प्रकार की वस्तुएँ थीं ………मीठे से लेकर नमकीन सब थे …………..सखाओं नें प्रथम श्रीकृष्ण को दिया …….पर श्रीकृष्ण को कोई रूचि नही है अभी खानें में . ……क्यों की घर से निकलते समय मैया यशोदा नें आज ज्यादा ही खिला दिया था ……….फिर भी सखाओं का मान रखनें के लिये अपनें हाथों में ही कुछ मिष्ठान्न ले लिये थे ……और यमुना की तरंगें देखते हुये खा रहे थे ।
तभी – लाला ! भाग ! भाग कन्हैया , भाग ! सखा सब भागनें लगे थे …………और कन्हैया का हाथ पकड़ कर उसे भी भगा रहे थे ।
पर तुम लोग इतनें घबड़ाये हुये क्यों हो ? भागते हुए कन्हैया नें पूछा ।
वो देख ! ग्वालों नें जब कन्हैया को दिखाया ………ओह ! ये तो घोडा है ……कन्हैया मुस्कुरा दिए ।
तू हँस रहा है ? क्यों ? उस घोड़े को देख …..कैसे धरती को खोदता हुआ पागलों की तरह भागता आरहा है……वो हम सब को मार देगा ……सखाओं का भय उनके मुखमण्डल में स्पष्ट दीख रहा था ।
कन्हैया नें देखा….कुछ देर तक वो देखते ही रहे ….फिर मुस्कुराये थे ।
“केशी ! तुझे वृन्दावन जाना है”………….आदेश दिया था कंस नें . केशी नामक असुर को ।
………ये घोडा के रूप में ही रहता था ……शक्तिशाली ये बहुत था ……….कंस को भी बड़ा कठिन पड़ा था इसे पराजित करना ……..पर कंस नें इसे पराजित किया ……और आश्चर्य ! पराजित करनें कर बाद इसे अपनें साथ ही रख लिया ……….वृन्दावन के निकट ही एक वन क्षेत्र में इसे रहनें का स्थान दिया था कंस नें ही ।
केशी ! तुझे वृन्दावन जाना है – आदेश था मथुरापति कंस का ।
कब ? केशी ज्यादा नही बोलता ।
“आज ही……अभी”…..कंस नें फिर अपना आदेश दोहराया ।
पर मुझे कुछ खानें तो दो हे मथुरापति कंस ! मैं भूखा हूँ …….केशी नें कंस को उलाहना दिया ………..कैसे राजा हो भूखे प्रजा का कोई ध्यान नही है तुम्हे ? केशी के सामनें वन्य खाद्य पदार्थ थे ….जो वही लेकर आया था और खानें जा रहा था ।
नही ………अपनें तलवार से कंस नें उसके खाद्य पदार्थ को गिरा दिया ।
ये क्या किया ! क्रोध से केशी के नथूनें फूलनें लगे थे ……..भोजराज कंस ! क्या तुम्हे पता नही है …….मुझे जब भूख लगती है तो मैं पागल सा हो जाता हूँ…….फिर तुमनें ये मेरा भोजन क्यों फेंक दिया ।
मैं चाहता हूँ कि तुम भूखे रहो ……और क्रोधित भी बने रहो….ताकि उस कृष्ण को तुम मार सको । कंस अट्टहास करता हुआ बोला था ।
और तुम तो मानव भक्षी अश्व हो …….ग्वालों को चबा जाना ……..कंस इतना बोलकर चला गया था पर जाते जाते बोला…….सावधान ! उस कृष्ण नें हमारे समस्त असुर मित्रों को मारा है …..इसलिये सावधान रहना ! कंस चला गया था ।
और क्रोध में भरकर केशी दौड़ा था वृन्दावन की ओर …….”कृष्ण ! मैं तुझे आज खा जाऊँगा”…….धूल का गुबार नभ तक जा रहा था ।
*क्रमशः …


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