!! अक्रूर पहुँचे वृन्दावन !!–
भाग 1
काका ! अक्रूर को देखते ही कन्हैया दौड़ पड़े थे……..काका !
अपनें सामनें देखा श्रीकृष्ण को अक्रूर नें ….. वे खड़े हैं और मन्द मन्द मुस्कुरा रहे हैं…..अक्रूर के आनन्द का तो कोई ठिकाना ही नही था ।
हे नाथ ! इन लक्ष्मी सेवित चरण के स्पर्श का अलभ्य लाभ मुझे मिलना चाहिये……..ये कहते हुये अक्रूर नें अपना मस्तक उन कोमल चरणों में रख दिया था ……….पर इन बृजेश सुत नें उठा लिया अक्रूर को ………काका ! मधु वर्षिणी वाणी से सम्बोधन करते हुये अपनें हृदय से लगा लिया था ………अक्रूर तो देखते ही रह गए ……..वो स्तब्ध हो गए थे …….उनको जीवन का परमलाभ प्राप्त हो गया था ।
काका ! बड़े प्रेम से बोल रहे थे……..उस समय वहाँ कोई नही था …..अक्रूर और स्वयं श्रीकृष्ण थे, सखा दूर थे ……….वो देख रहे थे और धीरे धीरे श्रीकृष्ण की ओर ही बढ़ रहे थे ।
काका ! मुझे पता है आप क्यों आये हो यहाँ । अक्रूर तो बस कमलनयन श्रीकृष्ण को देखते रहे …………
काका ! कंस नें मुझे मारनें के लिये बुलवाया है, हैं ना ?
अक्रूर चौंक गए …………फिर शान्त होकर विचार करनें लगे …अन्तर्यामी नारायण अगर सब जानते हैं तो इसमें आश्चर्य क्या !
काका ! मेरा बाबा और मेरी मैया से मत कहियेगा कि कंस के कहनें से मैं यहाँ आया हूँ ……….और कंस नें मारनें के लिये बुलवाया है ……ये सब मेरे बाबा मेरी मैया से मत कहना ।………श्रीकृष्ण जल्दी जल्दी बोल रहे हैं, क्यों कि ये सारी बातें ग्वाल सखाओं के सामनें नही कह सकते थे ।
कौन हैं ये कन्हैया ?
सखा अब सब पहुँच गए थे ……और पूछ रहे थे
ये हमारे काका हैं …………श्रीकृष्ण नें परिचय दिया ।
तभी बलभद्र भी पहुँच गए …………काका ! उन्होंने झुक कर प्रणाम करना चाहा …….पर अक्रूर नें उठाकर अपनें हृदय से लगा लिया ।
अक्रूर के आनन्द का आज कोई ठिकाना नही है ……..उनके तो नेत्र सफल होगये थे…..आनन्दाश्रु रुक नही रहे थे……वो अपनें सामनें बलराम और कृष्ण को देखकर गदगद् थे ।
तेरे काका हैं तो हमारे भी तो काका हुये ना ! मनसुख इतना ही बोल सका था…….उसे अक्रूर अच्छे नही लग रहे थे……….क्यों कि बलराम और कृष्ण के सिवा उन्होंने सखाओं से बातें करना तो छोडो देखना भी उचित नही समझा था ।
श्रीकृष्ण नें कहा भी ……ये मेरे सब सखा हैं……….सखाओं नें हाथ जोड़कर नमन किया पर अक्रूर नें उन सबको देखा नही …….बस युगल रामकृष्ण को ही अपलक देखते रहे ।
क्यों आये हैं ये तेरे काका ?
मनसुख से रहा नही गया तो पूछ लिया ।
मुझे लेनें आये हैं……अब हम जायेंगे मथुरा ! श्रीकृष्ण नें अक्रूर के सामनें अपनी प्रसन्नता प्रकट तो कर दी …….पर सखा !
तुझे अच्छा लगेगा ? वृन्दावन छोड़कर मथुरा जाना ? मनसुख के नेत्रों से अश्रु धार बह जाते अगर उसनें न रोका होता तो…….पर बड़ी कठिनाई से ये प्रश्न उसनें किया था……क्यों कि इन को अच्छा नही लगा मथुरा जानें कि बात पर उसके सखा कन्हैया का इस तरह खुश होना ।
अरे ! तुम सब भी चलोगे ! क्यों काका ? श्रीकृष्ण नें अक्रूर से पूछा ।
हाँ हाँ , सब चलोगे । अक्रूर नें श्रीकृष्ण की बात पर हाँ मिलाई ।
वाह ! आनन्द आएगा …….पर दो चार दिन के लिये ……….है ना कन्हैया ? श्रीदामा नें कहा ।
और क्या ! मथुरा में थोड़े ही रहेंगे ……घूम फिर कर आजायेंगे ……..मनसुख नें श्रीकृष्ण कि ओर देखते हुये श्रीदामा को बोला था ।
काका ! चलें ! आप भी थक गए हो ऐसा लगता है ………..अक्रूर को लेकर राम कृष्ण और समस्त ग्वाल बाल नन्दालय में गौओं को लेकर आगये थे …….गौओं को गौशाला में गोपों नें बांध दिया था ।
*क्रमशः….
श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! अक्रूर पहुँचे वृन्दावन !!
भाग 1
काका ! अक्रूर को देखते ही कन्हैया दौड़ पड़े थे……..काका !
अपनें सामनें देखा श्रीकृष्ण को अक्रूर नें ….. वे खड़े हैं और मन्द मन्द मुस्कुरा रहे हैं…..अक्रूर के आनन्द का तो कोई ठिकाना ही नही था ।
हे नाथ ! इन लक्ष्मी सेवित चरण के स्पर्श का अलभ्य लाभ मुझे मिलना चाहिये……..ये कहते हुये अक्रूर नें अपना मस्तक उन कोमल चरणों में रख दिया था ……….पर इन बृजेश सुत नें उठा लिया अक्रूर को ………काका ! मधु वर्षिणी वाणी से सम्बोधन करते हुये अपनें हृदय से लगा लिया था ………अक्रूर तो देखते ही रह गए ……..वो स्तब्ध हो गए थे …….उनको जीवन का परमलाभ प्राप्त हो गया था ।
काका ! बड़े प्रेम से बोल रहे थे……..उस समय वहाँ कोई नही था …..अक्रूर और स्वयं श्रीकृष्ण थे, सखा दूर थे ……….वो देख रहे थे और धीरे धीरे श्रीकृष्ण की ओर ही बढ़ रहे थे ।
काका ! मुझे पता है आप क्यों आये हो यहाँ । अक्रूर तो बस कमलनयन श्रीकृष्ण को देखते रहे …………
काका ! कंस नें मुझे मारनें के लिये बुलवाया है, हैं ना ?
अक्रूर चौंक गए …………फिर शान्त होकर विचार करनें लगे …अन्तर्यामी नारायण अगर सब जानते हैं तो इसमें आश्चर्य क्या !
काका ! मेरा बाबा और मेरी मैया से मत कहियेगा कि कंस के कहनें से मैं यहाँ आया हूँ ……….और कंस नें मारनें के लिये बुलवाया है ……ये सब मेरे बाबा मेरी मैया से मत कहना ।………श्रीकृष्ण जल्दी जल्दी बोल रहे हैं, क्यों कि ये सारी बातें ग्वाल सखाओं के सामनें नही कह सकते थे ।
कौन हैं ये कन्हैया ?
सखा अब सब पहुँच गए थे ……और पूछ रहे थे
ये हमारे काका हैं …………श्रीकृष्ण नें परिचय दिया ।
तभी बलभद्र भी पहुँच गए …………काका ! उन्होंने झुक कर प्रणाम करना चाहा …….पर अक्रूर नें उठाकर अपनें हृदय से लगा लिया ।
अक्रूर के आनन्द का आज कोई ठिकाना नही है ……..उनके तो नेत्र सफल होगये थे…..आनन्दाश्रु रुक नही रहे थे……वो अपनें सामनें बलराम और कृष्ण को देखकर गदगद् थे ।
तेरे काका हैं तो हमारे भी तो काका हुये ना ! मनसुख इतना ही बोल सका था…….उसे अक्रूर अच्छे नही लग रहे थे……….क्यों कि बलराम और कृष्ण के सिवा उन्होंने सखाओं से बातें करना तो छोडो देखना भी उचित नही समझा था ।
श्रीकृष्ण नें कहा भी ……ये मेरे सब सखा हैं……….सखाओं नें हाथ जोड़कर नमन किया पर अक्रूर नें उन सबको देखा नही …….बस युगल रामकृष्ण को ही अपलक देखते रहे ।
क्यों आये हैं ये तेरे काका ?
मनसुख से रहा नही गया तो पूछ लिया ।
मुझे लेनें आये हैं……अब हम जायेंगे मथुरा ! श्रीकृष्ण नें अक्रूर के सामनें अपनी प्रसन्नता प्रकट तो कर दी …….पर सखा !
तुझे अच्छा लगेगा ? वृन्दावन छोड़कर मथुरा जाना ? मनसुख के नेत्रों से अश्रु धार बह जाते अगर उसनें न रोका होता तो…….पर बड़ी कठिनाई से ये प्रश्न उसनें किया था……क्यों कि इन को अच्छा नही लगा मथुरा जानें कि बात पर उसके सखा कन्हैया का इस तरह खुश होना ।
अरे ! तुम सब भी चलोगे ! क्यों काका ? श्रीकृष्ण नें अक्रूर से पूछा ।
हाँ हाँ , सब चलोगे । अक्रूर नें श्रीकृष्ण की बात पर हाँ मिलाई ।
वाह ! आनन्द आएगा …….पर दो चार दिन के लिये ……….है ना कन्हैया ? श्रीदामा नें कहा ।
और क्या ! मथुरा में थोड़े ही रहेंगे ……घूम फिर कर आजायेंगे ……..मनसुख नें श्रीकृष्ण कि ओर देखते हुये श्रीदामा को बोला था ।
काका ! चलें ! आप भी थक गए हो ऐसा लगता है ………..अक्रूर को लेकर राम कृष्ण और समस्त ग्वाल बाल नन्दालय में गौओं को लेकर आगये थे …….गौओं को गौशाला में गोपों नें बांध दिया था ।
*क्रमशः….


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