श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! उफ़ ! यह विरह कथा !!-भाग 1 : Niru Ashra

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श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! उफ़ ! यह विरह कथा !!

भाग 1

उद्धव अपनें आँसुओं को पोंछ रहे हैं ……….तात ! ये प्रसंग वो है जब बृज में अंतिम बार श्रीजी और श्रीकृष्ण मिले थे । विदुर जी से कहा ।

वैसे तो ये दोनों सनातन प्रेमी हैं ……ये कभी अलग हुये ही नही …..पर अवतार काल में , लीला में उच्चतम प्रेम वियोग का दर्शन हम जीवों को करानें के लिये ये प्रसंग उपस्थित स्वयं ‘युगल” नें ही किया था ।


मैया !

नही तू जायेगा नही ….कन्हैया को झकझोरते मैया बोल रही हैं ।

मैया ! बस दो चार दिन की तो बात है ना ! थोडा मथुरा देख लेंगे ……हम नें नागरी सभ्यता को निकट से देखा भी नही है ………गम्भीर होकर अपनी मैया से बातें कर रहे हैं ………..तभी नन्द बाबा भी कक्ष में आगये …………यशोदा ! अपनें लाला के समस्त सखा चलेंगे मथुरा …..और मैं स्वयं जाऊँगा ……….अक्रूर भी तो है ………..

ये तो मुझे “क्रूर” लगता है …….सुबुकते हुए मैया नें कहा ।

ऐसे नही कहते …….अगर अक्रूर सुन लेगा तो बुरा मानेगा ………

व्यंग में हँसती हैं यशोदा मैया ………उसको बुरा लगेगा …….और हमारे प्राण अटक गए हैं उसका ? मेरा लाला जा रहा है ……..मेरा प्राण है ये ……..इसके बिना मैं कैसे रहूँगी ! यशोदा के अश्रु फिर बह चले हैं ……….और फिर वहाँ जाकर इसे कौन संभालेगा ! काँछनी बाँधनी नही आती अभी तक इसे …………मुँह नही धोता मेरे बिना …….मैया ! मैया ! मैया ! बस यही रट लगाये रखता है ……….

तू कुछ बोलता क्यों नही …..मैया को छोड़कर जायेगा मथुरा ?

मैया ! चार दिन की बात है ………..वहाँ घूम फिरकर आजाऊंगा ।

ठीक है ……….जाओ ! मैं कुछ नही कहती …..जाओ ….सब जाओ ……यशोदा कुछ नही कहेगी !

यशोदा जी इतना कहते हुये उठकर चली गयीं थीं आँगन में ।

बृजराज नें अपनें लाला को कहा ……..मैया को समझा ……..लाला ! अब मुझ से नही मानेगी तेरी मैया ! नन्द बाबा नें कन्हैया को भेजा मैया के पास ।

मैया !

मत छेड़ मुझे जा यहाँ से …………..मैया नें ये कहते हुये तनिक धक्का सा क्या दिया लाला को ………उनका ह्रदय तो चीत्कार कर उठा था …………अपनें लाला को पकड़ा और अपनी छाती से लगाकर फिर हिलकियों से रोनें लगीं थीं ।

क्यों जा रहा है ……मत जा ना !

मैया फिर अपनें कन्हाई को कहती हैं ।

मैया ! मैं आऊँगा ना ! अपनी मैया के गले में अपनें हाथों को डालते हुये बोले ……….मैया ! तेरा बेटा जायेगा और शीघ्र आएगा ! मैं आऊँगा मैया ! आऊँगा ।

मैं समझ गयी ……तेरी भी इच्छा है जानें की ……..ठीक है जा !

मैया नें कह दिया ।

ऐसे नही मैया ! मुस्कुरा के कह ………..कन्हैया फिर बोले ।

अब हंसा नही जायेगा मुझ से ……….यशोदा मैया नें अपनें आँसुओं को रोक लिया यही इसके लिये बड़ी बात थी ।

मैया ! मैं घड़ी भर के लिये राधा से मिल आऊँ ?

हाँ, जा ………..पर लाला ! जल्दी आजाना ।

हाँ , मैया ! कन्हैया बाहर निकले …………..बाबा बृजराज को कहते हुये गए थे बाबा ! मैया मान गयी है ……….मैं अभी आया ।

बाबा नें भी कहा “शीघ्र आना…कल प्रातः ही जाना है मथुरा” ।

ठीक है बाबा ! कन्हैया दौड़ते हुये गए थे ।


राधे ! राधे ! प्यारी ! कहाँ हो ?

गहवर वन में जब पहुँचे श्यामसुन्दर तब वहाँ श्रीराधा नही मिलीं …….श्याम सुन्दर पुकार रहे हैं ………..प्यारी !

*क्रमशः …

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