श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! उफ़ ! यह विरह कथा !!
भाग 2
राधे ! राधे ! प्यारी ! कहाँ हो ?
गहवर वन में जब पहुँचे श्यामसुन्दर तब वहाँ श्रीराधा नही मिलीं …….श्याम सुन्दर पुकार रहे हैं ………..प्यारी !
तमाल कुञ्ज में छुप गयीं हैं आज भानुदुलारी …………
बताओ ना ! कहाँ हो ? श्याम सुन्दर पुकारे जा रहे हैं …….
कुञ्जों में छुपनें पर हँसनें की आवाज आरही है ………….
पर श्याम सुन्दर नें जाकर पीछे से पकड़ लिया था ……….
और जब देखा अपनी प्यारी को ………….
नीली साड़ी पहनी थीं आज , नीलमणी के आभुषण धारण किये थे प्रिया जू नें ……..नीली कंचुकी, नीले पुष्पों का हार , नीले केशों में नीलम मणि शोभा पा रही थी …….सुवर्ण समान चमकते गौर भाल में नीली बिन्दी कितनी अच्छी लग रही थी ………और श्रीअंग में कृष्णवर्ण की कस्तूरी की सुगन्ध स्वयं श्याम सुन्दर का मन मोह रही थी …….इस तरह अपनें प्रियतम के साथ मिलन के लिये प्रिया जी खड़ी हैं ।
“आज आप बहुत सुन्दर लग रही हो”
…….तृण तोड़कर फेंक दिया था श्याम सुन्दर नें ।
हाँ …….देखो ना प्यारे ! ये वृन्दा सखी नें ही मुझे सजाया है ………मैने इससे पूछा भी ……..आज ऐसा क्या है ……पर ये मानी नही ………तू दुःखी है ? मैने उस वृन्दा सखी से पूछा तो मेरा श्रृंगार करके रोती हुयी चली गयी ………आज कुछ उदास है ना वन ?
सिर झुकाकर खड़े हैं नन्दनन्दन ……………..
प्यारे ! आप ऐसे क्यों खड़े हो …….कुछ बोलते क्यों नही ?
मेरी पायल बज रही है ………..अच्छी है ना !
श्रीजी अपनें प्रियतम को पायल दिखाती हैं …………
पर श्याम सुन्दर के नयन भर आये हैं ………….श्याम बैठ गए श्रीजी के चरणों में ……….प्यारे ! क्या हुआ ? श्रीजी पूछती हैं ।
टप्प टप्प टप्प आँसू श्रीजी के चरणों में गिरनें लगे ।
क्या हुआ ? ऐसे मत करो ……..कुछ बोलो ……….आज मुझे सब रोते हुये लग रहे हैं ……ये वन भी रो रहा है ……यहाँ के वृक्ष भी …पक्षी भी ….यमुना भी ……..और मेरा “प्राणधन” भी ………क्यों ?
मैं जा रहा हूँ मथुरा ! हिलकियों से रो पड़े अब श्रीकृष्ण ।
क्या ! क्या ! श्रीराधारानी के नेत्रों से अश्रु वर्षा प्रारम्भ हो गए थे ।
कुछ समझ में नही आरहा उनके ………कि ये क्या कह दिया प्रियतम नें एकाएक यहाँ आकर ।
हाँ …….मैं जा रहा हूँ ……………..
पर – मैं फिर कैसे रहूँगी ? रो पडीं श्रीराधारानी ।
फेंट से बाँसुरी निकाली …..अपनें दोनों हाथों में रखा – श्रीजी के सामनें ।
ये मेरी बाँसुरी है……अब नही बजाऊंगा मथुरा में ……..क्यों की वहाँ कोई अधिकारी नही है ………राधे ! ये तुम रखो बाँसुरी ……..मेरी जब याद आये बजा लेना ।…….श्रीराधारानी हँसीं………उनकी ये हँसी पूरे वन में गूँज रही थी……..दुःख चरम का था इसलिये अब हँसी आगयी थी …………..तुम्हारी याद क्यों आएगी ? याद उसकी आती है जिसे भूला जाता है …….तुम्हे ये राधा भूलेगी कब ?
श्रीकृष्ण उठे……..बाँसुरी दी उन कोमल करों में……..नेत्रों से अश्रु बरस रहे हैं दोनों के……..आस्तित्व भी रो पड़ा आज ।
निभृत निकुञ्ज सजाया था वृन्दा देवी नें…….कि अभिसार हो युगल का अंतिम में एक बार ओर…..पर….फूलों की सेज अब शूल बनकर चुभेंगे ।
तुम सच में जाओगे ? इस बृज को छोड़कर चले जाओगे ?
बैठ गए फिर श्याम सुन्दर ………उन गोरे चरणों को अपनें पलकों से छूआ ………..उनके मुखारविन्द से बस यही निकल रहा था ।
हे बृषभान सुते ललिते, मैने कौन कियो अपराध तिहारो !!
काढ़ी दियो बृजमण्डल सौं, अब कौन सो दुःख रह्यों अति भारो !!
अपनौ करि लेहु पुनः मोहे देहु , निकुञ्ज कुटी यमुना तट प्यारो !!
आपनौ जान दया कि निधान, भई सो भई अब बेगि सम्भारो !!
मूर्छित हो गयीं थीं श्रीराधारानी …….श्याम सुन्दर रोते रहे …..क्षमा माँगते रहे ।………ललितादि सखियों नें आकर सम्भाला श्रीजी को …….श्याम सुन्दर बारबार प्रिया जू के मुखचन्द्र को देखते हुये लौट आये थे अपनें नन्दालय में ।
*शेष चरित्र कल –


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