श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! मथुरा में विजयोत्सव !!
भाग 1
श्रीकृष्णचन्द्र की जय जय जय …..
वासुदेव श्रीकृष्णचन्द्र की जय जय जय …..
देवकीनन्दन श्रीकृष्णचन्द्र की जय जय जय …..
मथुरा की प्रजा आनंदोन्मत्त हो गयी थी ….नागरिकों की भीड़ जयकारा लगाते हुये आयी……रंगशाला के द्वार उस भीड़ नें तोड़ दिए थे ……..नन्दबाबा नें देखा ये भीड़ कहीं मेरे लाला को हानि न पहुँचाये ……वो सम्भालनें के लिये आगे बढ़े तब तक तो भीड़ पहुँच चुकी थी श्रीकृष्ण के पास …….बृजराज अपनें लाला के पास जा भी न सके…….भीड़ नें उन्हें दूर कर दिया…….नन्दबाबा चिल्लाये ….मनसुख , श्रीदामा , मधुमंगल कन्हैया को सम्भालो ….उसे अकेले मत छोड़ना ………..
मनसुख और श्रीदामा आगे बढ़े ……..पर भीड़ साधारण नही थी …रंगशाला में जो बैठे थे वो तो थे ही…….बाकी मथुरा नगर के सारे नर नारी , “कंस का वध कर दिया बालकों नें”……..ये सुनकर तो और उत्साह से भर गए थे …….सब लोग चल पड़े थे ……ये उन्हीं की भीड़ थी …….जिसनें आकर सीधे श्रीकृष्ण और बलभद्र को कन्धे पर उठा लिया था …………मनसुख चिल्लाता रह गया कन्हैया ! ओ कन्हैया ! श्रीदामा चिल्लाया लाला ! ओ लाला ! पर नही …….ये सब दूर होते चले गए अपनें कन्हैया से ।
बाहर सुवर्ण का रथ आगया ……पुष्पों की वृष्टि लगातार चल ही रही थी दोनों भाइयों के ऊपर …….मथुरा की नारियों नें सुन्दर सुन्दर वस्त्र पहन रथ के आगे नृत्य करते हुये चलनें का मन बना लिया था …..।
शंख नगाड़े भेरी सब बज उठे थे………कन्धे पर रखकर युवाओं की भीड़ राम कृष्ण को लेकर आई …..और रथ में विराजमान किया ।
अरे ! उसनें कुछ खाया भी नही है सुबह से………बृजराज चिल्ला रहे हैं ……….पर यहाँ अब कौन किसकी सुनेगा ? मनसुख उछल उछल कर देख रहा है अपनें कन्हैया को ………….श्रीदामा हाथ हिलाता है पर श्रीकृष्ण उसे आज देख नही रहे ……………रथ आगे बढ़ चला ………जयजयकार नभ में गूँज रही है ………..बालक वृद्ध युवा नारी सब इस विजयोत्सव में सम्मिलित होकर चल रहे हैं ……….अबीर उड़ाया जा रहा है ………गुलाल एक दूसरे के गालों में मल कर आनन्द की अभिव्यक्ति कर रहे हैं ……..कोई उन्मत्त होकर गा रहा है तो कोई नाच रहा है …………..।
श्रीकृष्ण रथ में बैठ बैठे मथुरा के नर नारियों का अभिवादन हाथ जोड़कर स्वीकार कर रहे हैं ……………..
रथ जा चुका है ………भीड़ भी रथ के पीछे ही चली गयी है ………
रंगशाला अब धोया जाएगा………कंस के शरीर को ले जाया गया ………..उसकी पत्नियाँ आईँ थीं ……..अस्ति प्राप्ति …….बहुत रोईं ….।
ये सब बृजराज देख रहे हैं……….कुछ देर बाद बृजराज बोले …..चलो …….वहीं यमुना के किनारे चलते हैं ………कन्हैया वहीं आजायेगा ……….मनसुख उदास हो गया है …….श्रीदामा उदास है ……उसके सखा नें आज इन्हें छोड़ कैसे दिया ?
बृजराज मौन चल रहे हैं यमुना किनारे …………
“उग्रसेन महाराज को बन्दी घर से मुक्त करो” ………..रथ में बैठे बैठे ही श्रीकृष्ण नें आदेश दिया था ……तुरन्त उग्रसेन को बन्दी गृह से मुक्त करके लाये ………..यही है कारागार ……लोगों नें दिखाया था ……कारागार देखते ही श्रीकृष्ण कूदे रथ से ………बलभद्र भी साथ में ही थे …….कारागार में गए ………….
क्रमशः …
