श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! मथुरा में विजयोत्सव !!-भाग 2 : Niru Ashra

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श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! मथुरा में विजयोत्सव !!

भाग 2

ये सब बृजराज देख रहे हैं……….कुछ देर बाद बृजराज बोले …..चलो …….वहीं यमुना के किनारे चलते हैं ………कन्हैया वहीं आजायेगा ……….मनसुख उदास हो गया है …….श्रीदामा उदास है ……उसके सखा नें आज इन्हें छोड़ कैसे दिया ?

बृजराज मौन चल रहे हैं यमुना किनारे …………


“उग्रसेन महाराज को बन्दी घर से मुक्त करो” ………..रथ में बैठे बैठे ही श्रीकृष्ण नें आदेश दिया था ……तुरन्त उग्रसेन को बन्दी गृह से मुक्त करके लाये ………..यही है कारागार ……लोगों नें दिखाया था ……कारागार देखते ही श्रीकृष्ण कूदे रथ से ………बलभद्र भी साथ में ही थे …….कारागार में गए ………….

बन्दी बना रखा है माता देवकी को और पिता वसुदेव को ………..द्वार खुला कारागार का …………वसुदेव और माता देवकी के सीधे चरणों में गिरे जाकर श्रीकृष्ण और बलभद्र …….देवकी माता तो रो पडीं अपनें प्राण प्रिय पुत्र श्रीकृष्ण को देखकर ……उनका हृदय भर आया था …….वात्सल्य के कारण उनके वक्ष से दूध की धारा निकलनें लगी थी ………एकाएक मातृत्व के आवेश में आकर माता देवकी नें श्रीकृष्ण को अपनी छाती से चिपका लिया …….और अद्भुत दृश्य उत्पन्न हो गया मथुरावासियों के लिये कि ………नेत्रों से अश्रु बह रहे हैं देवकी के और वक्ष से दूध की धारा बह रही है …………….

वहीं पर उग्रसेन भी आगये थे ………हे वासुदेव ! आपके कारण मेरी मथुरा की प्रजा बहुत प्रसन्न हैं ……..आनन्द कर दिया आपनें ……..दुःखी थे मेरे दुष्ट पुत्र कंस के अत्याचार से ये सब …….पर आपनें जो कार्य किया है ………उसे हम लोग नही भूलेंगे …….ये कहते हुए महाराज उग्रसेन नें अपनें दोनों हाथ जोड़ लिए थे ………अरे ! नही महाराज ! श्रीकृष्ण नें उनके हाथों को पकड़ा …..और बड़े आदर से उनका हाथ अपनें सिर में रखवाया ।

अब मैं मथुरा की प्रजा की ओर से एक विनती करना चाहता हूँ ………….उग्रसेन महाराज नें कहा ………..

नही महाराज ! आप विनती नही आदेश कीजिये ………..सिर झुकाकर श्रीकृष्ण बोले ।

यहाँ सब उपस्थित हैं …….मथुरा के गणमान्य व्यक्ति भी हैं ……….धनिक वर्ग है ……….प्रत्येक जाति विरादरी का प्रतिनिधि यहाँ है …….और मेरी बात सबको प्रिय लगेगी ……….हे वासुदेव ! मथुरा की सत्ता अब आप स्वीकार कीजिये । महाराज उग्रसेन नें प्रार्थना की ।

नही महाराज ! मथुरा के राजा तो आप ही होंगे …….ये वासुदेव तो आपका सेवक है ….और सेवक ही रहेगा ।

मथुरा की प्रजा श्रीकृष्ण को ही अपनें राजा के रूप में देखना चाहती थी …….इस समय प्रजा नें श्रीकृष्ण के पक्ष में जय घोष भी किये …..पर श्रीकृष्ण नें सबको शान्त कराया ………..और सबके सामनें यही कहा ……निःश्वार्थ सेवा सबसे बड़ी होती है हे मथुरावासियों ! राष्ट्र की सेवा सत्ता मिले तभी हम करेंगे ये सोच गलत है ………राष्ट्र की सेवा में सत्ता आगे नही आनी चाहिये ……..मैं सेवा करूँगा राष्ट्र की …..अपनी मातृ भूमि की……..पर सत्ता में रहेंगे महाराज उग्रसेन ।

उद्धव नें विदुर जी को ये प्रसंग सुनाते हुये कहा ………..

तात ! उग्रसेन ही राजा थे मथुरा के भी और द्वारिका के भी …..पर मथुराधीश और द्वारिकाधीश तो श्रीकृष्ण ही कहलाये ।

नेत्र सजल हो उठे थे उद्धव के ………..कितना महान व्यक्तित्व है हमारे श्रीकृष्ण का …………सेवक बनकर रहे उग्रसेन के सामनें …….मैने स्वयं देखा है ………और मैं तो देखता ही रहता था……उग्रसेन के सामनें कभी सिर नही उठाते थे श्रीकृष्ण …….जी महाराज ! जी महाराज ! बस यही कहना …..उनकी हर बात को मानना……….ये कहते हुये अपनें अश्रु पोंछे उद्धव नें ।

श्रीकृष्ण की बात माननी पड़ी सबको…….उग्रसेन को ही अपना राजा स्वीकार किया सबनें ।

अब फिर रथारूढ़ होकर चल पड़े थे श्रीकृष्ण और बलराम ………

यमुना का घाट आया ………..सवारी यहीं तक चली थी ……….रथ को रोक दिया गया …….यमुना जी का बड़े प्रेम से पूजन किया श्रीकृष्ण बलभद्र नें ……..तात ! उस घाट को विश्राम घाट कहते हैं ……….इसकी बड़ी महिमा है …….इस घाट में जो एक बार स्नान करता है ……वो सहस्त्र बार काशी में स्नान करने का पुण्य प्राप्त कर लेता है ।

शेष चरित्र कल –

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