श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! “आस्तित्व अहंकार खाता है” – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 79 !!
भाग 1
हे केशव ! महारानी रुक्मणी ने आपके सामने भोजन रख दिया है वो प्रतीक्षा कर के थक गयीं हैं …..आप कृपा करके भोजन ग्रहण करें ।
श्रीकृष्ण मिथिला से द्वारिका लौट आए हैं ……..अर्जुन स्वर्ग गए थे ….वहाँ से लौटकर आए तो सीधे द्वारिका में ही आए ।
भोजन की थाली सामने है …पर श्रीकृष्ण का ध्यान कहीं और है ।
तब अर्जुन को ये कहना पड़ा …….कि आप भोजन ग्रहण करें ।
पर इसका भी कोई उत्तर श्रीकृष्ण ने नही दिया …….
आपका आहार क्या है ?
अर्जुन ने ये प्रश्न व्यंग में पूछा था …क्यो की वो किसी और चिन्तन में खोए हुए थे ।
“तुम्हारा अहंकार” – श्रीकृष्ण इतना बोलकर भोजन करने लगे थे ।
अर्जुन गम्भीर हो गये …..ये क्या कह दिया था उनके सखा ने ।
और बताओ , स्वर्ग में देवराज इन्द्र कुशल से तो हैं ?
पता नही क्या हो गया था …अर्जुन से इस तरह उखड़ी उखड़ी बातें कर रहे थे गोविन्द आज ।
क्या मेरे अन्दर अभिमान है ? अब अर्जुन को चिन्ता सताने लगी थी ।
मेरे अहंकार का आहार करते हैं भगवान ?
तुम से मेरा अभिप्राय हे विजय ! अपने प्रिय लोगों से है ! श्रीकृष्ण के इन वाक्यों से अर्जुन को कुछ अच्छा लगा था …..पर यहाँ तो अर्जुन के लिए ही बोले थे श्रीकृष्ण ।
उर्वशी को स्वर्ग में नकारने की ताक़त किसमें है ! नर नाग और देव लोग भी उर्वशी को पाने के लिए लालायित रहते हैं पर अर्जुन ने ठुकराया । वीर है ये अर्जुन …..अर्जुन ने भगवान शंकर से भी युद्ध किया है …….”मैंने भगवान शंकर को पराजित तो नही किन्तु कुछ देर के लिए तो …..”अर्जुन नाम है मेरा”। इन दिनों अर्जुन का ये मुख्य वाक्य बन गया था ….अर्जुन का अहंकार चरम पर था ।
हे राजा उग्रसेन ! तू पापी है ।
द्वार पर खड़ा एक ब्राह्मण चिल्ला रहा था …..और गालियाँ दे रहा था ।
अर्जुन ने सुना तो भोजन करते हुए श्रीकृष्ण से पूछा ….ये कौन है ! और कैसी कैसी गालियाँ दे रहा है …….श्रीकृष्ण ने इस बात पर विशेष ध्यान भी नही दिया ।
प्रजा का प्रारब्ध ही उसे सुख दुःख नही देता …राजा का कर्म भी प्रजा को भोगना पड़ता है …राजा कहाँ अच्छा है इस द्वारिका का …..राजा उग्रसेन ….पापी है उग्रसेन तभी तो कंस जैसा पुत्र उसको मिला था ।
तभी अनिरुद्ध ने प्रवेश किया ….और श्रीकृष्ण के कानों में कुछ कहा ।
“अब क्या किया जाए तो, बोलने दो उस ब्राह्मण को”….
श्रीकृष्ण ने अनिरुद्ध को ये कहकर भेज दिया ।
पर ब्राह्मण अभी भी गाली दे रहा है ……”मेरा ये नौवाँ पुत्र है ….तुम सबके रहते मेरे नौ पुत्र मर गए हैं ….हे यदुवंशीयों ! तुम लोगों को नरक में भी वास नही मिलेगा” ।
ब्राह्मण की इन गालियों को अब सह न सका अर्जुन और उठकर बाहर आया ….रोष पूर्वक ब्राह्मण को देखा और कहा ….”ब्राह्मण हो तो कुछ भी कहोगे” । सत्य कड़वी होती है धनुर्धारी ! ब्राह्मण ने अर्जुन को तुरंत उत्तर दिया था ।
इन यदुवंशीयों के समान कौन होगा पुण्यात्मा , उनको तुम भला बुरा कहते हो……अर्जुन का क्रोध भी देखने जैसा था ।
ब्राह्मण ने जिसे द्वार पर रख दिया था उसके ऊपर का चादर जैसे ही हटाया ……..
ओह ! ये क्या है ? अर्जुन की वाणी में अब दुःख था …….क्यो की वो एक शव …..और इसी ब्राह्मण के बालक का शव था ।
रोने लगा वो ब्राह्मण …..उसकी दहाड़ अर्जुन के हृदय को छलनी कर रही थी ।
ये नौवाँ मेरा पुत्र है ……..मैंने यदुकुल के कुलगुरु आचार्य गर्ग से भी पूछा था तो उन्होंने मुझे शोध करके बताया कि ये जन्मते ही बालक का मर जाना आपके प्रारब्ध का परिणाम नही है …क्यो की आप तो परम पुण्यात्मा हो । ब्राह्मण कातर होकर अपनी बात बता रहा था ।
मैंने हर पक्ष को जाना है धनुर्धारी ! मैंने हर पक्ष का शोध किया है ….किन्तु कुछ न हुआ मेरे बालक जन्म लेते ही मर जाते हैं ।
“मैं रक्षा करूँगा तुम्हारे पुत्र की” …..अर्जुन बोल उठा था
क्या ! वो ब्राह्मण हंसा …..अर्जुन को ऊपर से लेकर नीचे तक देखने लगा ….तू रक्षा करेगा ?
संकर्षण भी रक्षा नही कर सके मेरे पुत्र की …प्रद्युम्न नही , अनिरुद्ध भी हार गए ….फिर तुम कौन ? क्या इन सबसे बड़े हो तुम ?
श्रीकृष्ण भोजन करके उठ चुके हैं …..रुक्मणी द्वारा उनका कर प्रक्षालन हो रहा था …..
तभी बाहर अर्जुन बोल उठा …..मैं संकर्षण नही हूँ ….मैं अनिरुद्ध प्रद्युम्न भी नही हूँ ….
श्रीकृष्ण ने भीतर से जब सुना तब हंसे …..”मैं कृष्ण भी नही हूँ ….ब्राह्मण ! मैं अर्जुन हूँ …जिसके पास गाण्डीव है और जिसके गाण्डीव की टंकार से पूरा लोक काँपता है…..अर्जुन बोलता गया ।
आप हंस क्यो रहे हो नाथ ! रुक्मणी ने पूछा …..श्रीकृष्ण बोले ….समझता नही है ये बेचारा अर्जुन , मेरा आहार यही तो है …….अपने भक्त का अहंकार ।
बाहर ब्राह्मण से अर्जुन बोला – “इस बार तुम्हारी पत्नी गर्भवती हो तब मुझे सूचना देना ….मैं उसके बालक की रक्षा करूँगा ….यम से लड़ना पड़े तो भी अर्जुन लड़ेगा” ।
अगर रक्षा नही कर सके तो ….ब्राह्मण ने पूछा ।
मर जाऊँगा …..चिता जलाकर उसी में अपने प्राणों को भस्म कर दूँगा ।
क्रमशः …
शेष चरित्र कल –


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