श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! जय जय हो बृजगोपिन की – “उद्धव प्रसंग 27” !!-भाग 1: Niru Ashra

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श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! जय जय हो बृजगोपिन की – “उद्धव प्रसंग 27” !!

भाग 1

जय हो , जय जय हो प्रेम की ……

जय हो, जय जय हो बृजगोपिन की …..

जय हो, जय जय हो बृज भूमि की ……

मैं पावन हो गया …..मैं बृज रज में लोटकर पवित्र हो गया ।

उद्धव ! तुम ये क्या कर रहे हो ?

देवर्षि नारद जी उसी समय नभ से उतरे..और मुझे जब उन्होंने गोपियों के आगे बृज रज में लोटते देखा तो साश्चर्य पूछने लगे थे !

ये वर्णव्यवस्था के अनुकूल नही है उद्धव ! …..तुम तो शास्त्रज्ञ हो …….जानते हो और देवगुरु के शिष्य भी रहे हो …….फिर मर्यादा क्यों तोड़ते हो ?

देवर्षि नारद जी ये सब क्यों कह रहे थे……..मुझे पता नही ….न मैं उस स्थिति में था कि मैं देवर्षि के वाक्यों से कुछ अर्थ निकालता ….मैं तो प्रेम के सिन्धु में डूब गया था……अब निकलना असम्भव ।

ये ठीक नही कर रहे तुम उद्धव ! ये स्त्रियाँ हैं ……और निम्नकुलोद्भव हैं पर तुम ! तुम तो क्षत्रिय हो ……सन्मान्य क्षत्रिय …….फिर इस तरह क्यों स्त्रियों के सामनें लोट रहे हो ……! देवर्षि बोले जा रहे थे ।

उद्धव ! इन गोपियों नें तो अपनें स्वधर्म की भी तिलांजलि दे दी है …….पतिधर्म स्त्री के लिये सबसे बड़ा होता है ……पर ये तो पतियों को त्याग कर श्रीकृष्ण के पीछे दौड़ रही हैं…….ये धर्म तो नही है ?

तात ! मैं देवर्षि की बातें सुनकर हंसा…….किस पति की बात कर रहे हैं आप देवर्षि ? मेरे नेत्रों से अश्रु निरन्तर बह रहे थे ।

ये हाड मांस का पति ? या पतियों के पति श्रीकृष्ण से प्रेम !

सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता हैं ये गोपियाँ !

अनुसुईया अरुंधती आदि जितनी पतिव्रतायें हुयी हैं ………..वो सब भी इन गोपियों के चरण की धूल भी नही है ………..

पता है देवर्षि ! क्यों ? क्यों कि हाड मांस के पुतले में अनुसुइया आदि को भगवान देखनें पड़ते थे……..उनका पति भगवान है नही ….पर जबरदस्ती वो देखती थीं ……..पर धन्य हैं ये गोपियाँ जिन्होनें जिस से प्यार किया वो भगवान ही है ………छोड़ा किसे ? जिसे आप छोड़ा कह रहे हैं वो पति तो छूटा हुआ ही है ……कुछ वर्षों बाद छूटना ही है ……..पर धन्य हैं ये गोपियाँ इन्होनें जिसे चुना प्रेम के लिये ……वो ईश्वर है …..वो परब्रह्म है ……..देवर्षि ! आप इन गोपियों को निम्नकुलोद्भव कह रहे हैं ! अरे ! ये तो नारी जाति की महिमा हैं ।

इनका प्रेम …..रुढ़ प्रेम ………निःस्वार्थ प्रेम ! इसकी किससे तुलना हो सकती है …………..

देवर्षि ! मैं आपको कहता हूँ ……..जितनें देहधारी हैं उन सबमें अगर भाग्यशाली कोई है तो ये गोपीयाँ ही हैं…….इनके द्वारा जगत का मंगल हुआ है … जानते हैं देवर्षि ! क्यों ? क्यों कि इन्होनें प्रेम के गीत गाये ।

प्रेम का दर्शन विश्व को इन्होनें ही कराया ! धन्य हैं ये !

क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –

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