श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! जय जय हो बृजगोपिन की – “उद्धव प्रसंग 27” !!
भाग 2
इनका प्रेम …..रुढ़ प्रेम ………निःस्वार्थ प्रेम ! इसकी किससे तुलना हो सकती है …………..
देवर्षि ! मैं आपको कहता हूँ ……..जितनें देहधारी हैं उन सबमें अगर भाग्यशाली कोई है तो ये गोपीयाँ ही हैं…….इनके द्वारा जगत का मंगल हुआ है … जानते हैं देवर्षि ! क्यों ? क्यों कि इन्होनें प्रेम के गीत गाये ।
प्रेम का दर्शन विश्व को इन्होनें ही कराया ! धन्य हैं ये !
और मैं क्या ? इनके आगे तो बड़े सिद्ध भी कुछ नही है ।
मेरे नेत्रों से अश्रु बहनें लगे थे …….धूलधूसरित देह हो गया था मेरा …….मैने गोपियों के पद रज को अपनें सम्पूर्ण देह में लगा लिया था ।
देवर्षि ! मेरी अब कोई इच्छा नही है ……..मेरे स्वामी अगर मुझे आज्ञा दें तो उद्धव इसी बृज में रहकर जीवन सफल बनाएगा ……बस यही एक मात्र इच्छा है मेरी अब ।
नही नही ……मुझे कुछ नही चाहिये …….न भुक्ति न मुक्ति …न स्वर्ग न अपवर्ग ………कुछ नही ………..हाँ , मैं एक वस्तु अवश्य चाहता हूँ ……कि मेरा जनम हो तो इसी बृज में हो ……..मेरा जनम हो तो इसी वृन्दावन में हो ……….और इसी वृन्दावन की एक लता ही बन जाऊँ ……….हाँ, देवर्षि ! गुल्म लता ………….
पर गुल्म लता क्यों ? श्रेष्ठ वृक्ष क्यों नही ? पीपल आदि !
देवर्षि की बातों का मैं उत्तर दे रहा था ………हे देवर्षि ! नही वृक्ष नही ….मुझे इस वृन्दावन की लता ही बना दो . ………पता है देवर्षि ! लताओं में इन गोपियों की चुनरी उलझ जायेगी …….मैं धन्य हो जाऊँगा ……आह ! मेरा लता होना सफल हो जायेगा ………मैं तो वृन्दावन का रज कण बनना चाहता हूँ ….पर मेरे चाहनें से क्या होगा ?
उद्धव ! रज कण क्यों ?
ये प्रेमिन गोपियाँ मेरे ऊपर से चलेंगी इनकी पद धूल मेरे माथे पर पड़ेगी …….उद्धव धन्य हो जाएगा ……………ये कहते हुये मैं बृज रज को उछालनें लगा था ………..देवर्षि मेरी दशा देखकर आनन्दित हो उठे ……बृज रज उन्होंने भी अपनें सिर में लगाया ……..और
जय हो प्रेम की ….जय जय हो बृज गोपिन की ……
देवर्षि ये कहते हुये वहाँ से चले गए थे ।
शेष चरित्र कल –
