श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! लाला के लाला भयो है – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 32”!!
भाग 2
हाँ, मनसुख नें कहा ………….और वो ध्यान से सुननें लगा था जो वो लोग नन्द बाबा को कह रहे थे ।
हम हस्तिनापुर के लिये आये थे ……..पर राजमाता रोहिणी जी नें हमें ये पत्र देकर कहा कि हस्तिनापुर के निकट ही है वृन्दावन ……..तो वहाँ अवश्य चले जाना ………और ये पत्र दे दे ना !
धन्यवाद ! नन्दबाबा प्रसन्नता में इतना ही बोले ।
अरे ! कहाँ जा रहे हो ….रुको तो ! मैया यशोदा ऐसे कैसे जानें देती ।
कुछ जलपान कर लो ….नन्दबाबा नें पूछा था ……पर उन्होंने मना कर दिया ………पर मैया तो मैया है ।
सुनो ! कब लौटोगे द्वारिका ?
दूतों नें मुस्कुराकर कहा ……….हस्तिनापुर से होकर आरहे हैं अब द्वारिका ही जा रहे हैं !
तो माखन ले जाओ ………बिगड़ेगा नही …….मैने आज ही निकाला है अपनें हाथों से …………ले जाओ ! मैया उठी ……जैसे तैसे उठी ……वो भीतर गयी …….और माखन को एक मटकी में रख दिया उसको बांध दिया …………ये मेरे लाला को दे देना ! मैया नें भेजा है उसको कहना ………मेरा लाला बहुत खुश होगा !
मैया बोलती गयी ……..दूतों नें कहा ….पर उनके जन्मे तो अभी चार दिन ही हुए हैं ! क्या ! मनसुख हंस पड़ा …….मैया ! तू समझी ?
नही, मैया नें सिर ना में हिलाया ….और वो समझी भी नही थी ।
“अपनें लाला के लाला हुआ है”………और चार दिन ही हुए हैं ।
मैया यशोदा तो ख़ुशी के मारे वहीं नाचनें लगी थी ……..नन्दबाबा के नेत्रों से ख़ुशी के अश्रु बह चले थे ।
रुक रुक ! दूतों को फिर रोका …..और भीतर से एक बालक के पहननें का कपड़ा …………ये मेरे लाला का है ………अब उसके लाला को पहना देना ……पीला रेशम का था वो कपड़ा …..और सुन्दर जरी का काम हुआ था उसमें …..मैया नें वो बड़े प्रेम से दिया दूतों को ………और सुन ! ले ………सुवर्ण की चार चार मोहरें भी दे दीं उन दूतों को ……..वो दूत समझ नही पाये ……..तो मनसुख ने कहा ……बधाई है …….दादी है गयी है हमारी मैया ! और बाबा दादा !
रथ में बैठकर वो दूत चले गए थे हस्तिनापुर के लिये ।
मनसुख कहाँ जानें वाला था अब ……अब तो वो पत्र पढ़कर ही जायेगा …….तो उसनें पत्र सुनाना आरम्भ किया ……….बाबा नन्द भी वहीं बैठ गए हैं पत्र को सुननें के लिये …………….मैया कम सुनती है इसलिये मनसुख को थोड़ी तेज आवाज बोलना पड़ता है ……..सारा वृन्दावन ही इकट्ठा हो गया था वहाँ पत्र सुननें के लिये ।
अब आप अपनी बहुन को नाम भी जान लो जीजी !
रुक्मणी, मनसुख पत्र पढ़ते हुए एक एक नाम बोल रहा है …….यशोदा जी उन नामों को स्वयं दोहरा रही हैं ……..रुक्मणी, जाम्बवती, सत्यभामा, कालिन्दी , मित्रविन्दा , नाग्नजिती , भद्रा और लक्ष्मणा …।
यशोदा जी हंसती जा रही हैं ………और सुनती जा रही हैं पत्र !
जीजी ! आज एक और खुशखबरी है……अपनें लाला कन्हैया के लाला हुआ है ………बहुत सुन्दर है जीजी ! आचार्य गर्ग तो कह रहे थे कामदेव का अवतार है ………..हम क्या जानें वो आचार्य हैं वही जानते होंगे ना ! पक्का ये कामदेव ही श्रीकृष्ण के पुत्र के रूप में आया है ….ऐसा कह रहे थे ।
नही नही, आचार्य गर्ग कभी झूठ नही बोलते …….उनकी वाणी सत्य होती है …….नन्दबाबा से रहा नही गया तो वो भी बोल उठे ।
पूरा बृज आज पत्र सुन रहा है और आनन्दित है ।
मनसुख आगे सुनानें लगा पत्र …………
जीजी ! आचार्य गर्ग तो कह रहे थे …….कि वृन्दावन में रास लीला के प्रसंग में कामदेव को पराजित किया था कृष्ण नें इसलिये वो अब पुत्र बनकर जन्मा है …..कामदेव की स्वयं इच्छा थी पुत्र बनने की ….
अब जीजी ! ये बात द्वारिकावासियों को क्या पता कि वृन्दावन में रासलीला भी हुयी थी ….और कामदेव को पराजित किया था ।
पर जीजी ! वृन्दावन का नाम आते ही उस समय सब लोगों नें मेरी ओर ही देखा , कृष्ण नें भी मेरी ओर ही देखा …..तब जीजी ! क्या बताऊँ मैं मुझे रोमांच हो उठा था मेरी आँखों के सामनें वृन्दावन, जीजी आप महाराज नन्दबाबा, लाला के समस्त सखा समस्त गोपियाँ….जीजी ! बहुत याद आती है आपकी …………नामकरण संस्कार में आप होतीं तो कितना आनन्द आता ……….अपनें लाला का ये प्रथम पुत्र है जीजी ! रुक्मणी का लाला ।
जीजी ! सबको मेरा प्रणाम…….आपके चरणों में और बाबा के चरणों में मेरा ढोग ……….शेष सब कुशल ।
आपकी
रोहिणी ।
पत्र रख दिया था मनसुख नें ……अपनें आँसु पोंछनें लगा था …….
तू क्यों रो रहा है ….एक गोपी नें छेड़ा ……….
लाला कन्हैया के छोरा भयो है ……..ख़ुशी के आँसु हैं …….मनसुख नें भी जबाब दिया ………..चलो जा द्वारिका ! एक गोपी बोली …….
नायँ वृन्दावन छोड़के नायँ जाउंगो !
मनसुख पत्र मैया के हाथ में दे कर चला गया था ।
“लाला के लाला भयो है”……मैया रात भर कभी हंसती रही, कभी रोती रही ।
शेष चरित्र कल –
