श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! वृन्दावन में दाऊ भैया – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 39” !!-भाग 1 : Niru Ashra

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श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! वृन्दावन में दाऊ भैया – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 39” !!

भाग 1

दाऊ भैया आगये ! दाऊ भैया आगये !

वो रथ क्या आया वृन्दावन में……पूरा वन ही बोल उठा था …..वृन्दा देवी आनन्दित हो उठी थी…..कन्हैया न सही उनके अग्रज तो आये हैं ।

गिरिराज पर्वत में फिर से हरियाली छा गयी थी यमुना का जल निर्मल और प्रवाह चल पड़ा था …..मोर नृत्य कर उठे थे ……..कोयल पपीहा इन सबका कलरव शुरू हो गया था …….पर एक प्रश्न सबका था …….

दाऊ ! कन्हैया नही आया ?

ये प्रश्न वृक्ष, लता, पक्षी पर्वत यमुना सबका था ………..

दाऊ इसका क्या उत्तर देते ……..वो बस चुप ही रहे ।

दाऊ आगया ! वो बूढी यशोदा मैया उठकर खड़ी हो गयी …….

अरे ! जा ना अपनें बाबा को बुलाकर ला ………..और कहना दाऊ आगया है द्वारिका से ……….मैया यशोदा नें एक ग्वाले को भेज दिया था …….वो ग्वाला बाबा को बुलाता बाद में पहले उछलता चिल्लाता हुआ चला पूरे वृन्दावन में ………..दाऊ भैया आये हैं !

सखाओं को मानों नव जीवन मिल गया …………आज कई वर्षों के बाद इन सबके जीवन में नई ऊर्जा का संचार हुआ था …….श्रीकृष्ण के वृन्दावन छोड़नें के बाद ये अपनें में थे ही कहाँ ! बस जीये चले जा रहे थे और आस यही कि कन्हैया आएगा !

आज कन्हैया न सही पर दाऊ भैया भी तो अपनें हैं ।

गोपियों नें सुना तो वो सब भी दौड़ीं थीं…….दाऊ से मिलना है ।

नन्द बाबा नें सुना तो वो भी गौशाला से दौड़े अपनें भवन की ओर ।

भीड़ लग गयी थी नन्दभवन में ……………ऐसी भीड़ कन्हैया के जानें के बाद उद्धव के आगमन पर लगी थी ……….पर उद्धव के गए हुए भी तो वर्षों हो गए ………….पर आज सब आनन्दित हैं ।

“दाऊ भैया आये हैं” ………..सबमें उत्साह है और उमंग है ।


जीता रह ! दाऊ नें यशोदा मैया के जब चरण छूए तो मैया नें यही आशीष दिया ……………

मंगल हो ! बृजराज बाबा अपनें बूढे काँपते हाथों से आशीष दे रहे थे ।

तेरा छोटा भाई नही आया ? इतना मैया नें पूछ ही लिया ।

बलभद्र के नेत्र सजल हो गए थे ………..वो मैया को देखकर कुछ बोल नही पाये ………इसका क्या उत्तर देते ।

कब आवेगा ? ये दूसरा प्रश्न था मैया का ही ।

आएगा ! ये कहना कोई उत्तर तो नही हुआ ! और सांत्वना क्या देना …….बलराम कुछ नही बोले ………बस अपनें इन लोगों की दशा देखकर अश्रु बहाते रहे ।

अब खड़ा ही रखोगी दाऊ को कि कुछ खानें भी दोगी ?

नन्दबाबा नें यशोदा जी को जब कहा …….तब इस वात्सल्यमूर्ति को कुछ ख्याल आया था ………….हाँ हाँ ……मैं तो भूल ही गयी …..मैं भी पागल सी हो गई हूँ ……कुछ समझ नही आता ।

रोटी माखन अपनें हाथों से बनाकर खिलाती हैं मैया ………….

मेरे हाथों से खा ना ! तू तो अभी भी मेरे लिये बालक ही है ।

ये कहते हुये मैया के नेत्रों से अश्रु धार बह चले थे ……….वो सिसक रही थीं अपनें लाला को याद करके ………..फिर अपनें को सम्भाला मैया नें और रोटी माखन दाऊ को खिलानें लगीं ।

क्या खाते हो द्वारिका में तुम लोग ?

वहाँ तो माखन मिलता नही होगा ?

हाँ, छप्पन भोग………..पर मेरे लाला को तो माखन ही प्रिय है ना !

मुझे भी माखन प्रिय है मैया ! पर वहाँ कहाँ माखन ? दाऊ बोले थे ।

गैया नही हैं द्वारिका में ? मैया मासूमियत से पूछती है ।

है ……..पर यहाँ की बात ही और है मैया ! ये कहते हुये गदगद् हो उठते हैं दाऊ भी ।

कुछ देर तक कोई कुछ नही बोलता …..नन्दबाबा भी बस दाऊ को देखते रहते हैं …………कभी मुस्कुरा जाते हैं कभी गम्भीर हो जाते हैं ।

तुझे हमारी याद आती है ?

बहुत याद आती है मैया ! बहुत याद आती है ……..

लाला को भी आती है हमारी याद ? मैया के प्रश्न खतम होंगें !

क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –

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