श्रीकृष्णचरितामृत्
!! राजसूय यज्ञ की तैयारी – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 49 !!
भाग 2
अरे , मुख्य काम तो छूट ही गया सहदेव ! कोषाध्यक्ष किसे बनाया जाए ?
कोषाध्यक्ष ? वो क्यों ? उसकी क्या आवश्यकता ? अर्जुन ने कहा ।
क्यो , इतने राजा आएँगे वो क्या ख़ाली हाथ आएँगे ? उपहार लाएँगे उन उपहारों को रखना और दिए हुये राजाओं का नाम लिखना ये कौन करेगा ? श्रीकृष्ण सोचने लगे , फिर बोले – दुर्योधन , हाँ , सहदेव ! लिखो दुर्योधन का नाम । श्रीकृष्ण ने कहा ।
पर अर्जुन ने सहदेव को रोक दिया ये कहते हुए कि दुर्योधन हमारा शत्रु है , भीम ने श्रीकृष्ण से कहा – कोषाध्यक्ष का कार्य बहुत महत्वपूर्ण है येसे कार्य को हम दुर्योधन को कैसे दें !
महाराज ! क्या दुर्योधन को राजसूय यज्ञ में नहीं बुलाओगे ?
गम्भीर होकर श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से पूछा था ।
बुलाएँगे गोविन्द ! वो भाई हैं हमारे । युधिष्ठिर ने स्पष्ट किया ।
अब सुनो भीम ! और अर्जुन तुम भी सुनो , दुर्योधन आदि कौरव तुम्हारे भाई हैं इसलिये यज्ञ उत्सव आदि में तुम्हें बुलाना ही पड़ेगा उन्हें । श्रीकृष्ण ने भी कहा ।
बुलाएँगे , पर कोषाध्यक्ष ? भीम ने पूछा ।
और दुर्योधन तो हमारी सम्पत्ति के पीछे पड़ा ही रहता है , फिर कोषाध्यक्ष बना देंगे तो हमें उपहार में मिलने वाली सम्पत्ति को वो इधर उधर कर देगा , अर्जुन ने ये बात कही थी पर अर्जुन की बात पूरी हुई नहीं कि – उसे कोषाध्यक्ष नहीं बनोगे तो वो तुम्हारी सम्पत्ति को इधर उधर कर सकता है । श्रीकृष्ण युधिष्ठिर की और देखकर बोले थे , महाराज ! कूटनीति ये कहती है कि राज्य में चोरी को अगर रोकना हो तो चोर को ही द्वारपाल बना दो , चोरी होगी नहीं ।
श्रीकृष्ण की ये बात सुनकर द्रोपदी बहुत हंसी , मैंने गलत कहा क्या कृष्णा ! नहीं आपने सत्य कहा है , द्रोपदी बोली ।
आप की ही बात होगी, आप आज्ञा करते जाएँ बस , युधिष्ठिर महाराज ने कहा था ।
हाँ, तो लिखो कोषाध्यक्ष दुर्योधन , सहदेव ने लिखा ।
तभी कुन्ती माता उठ गयीं , श्रीकृष्ण समझ गए की ये कुछ कहना चाह रही हैं ये भी उठे और सब को बैठे रहने के लिए कहकर वो कक्ष में चले गए ।
गोविन्द ! इतना अद्भुत दिव्य यज्ञ हो रहा है फिर इसमें क्या मेरे ज्येष्ठ पुत्र को कोई सेवा नहीं मिलेगी ? कुन्ती माता ने श्रीकृष्ण से ये बात कही ।
कौन सा ज्येष्ठ पुत्र भुआ ?
“कर्ण” कुन्ती बोलीं ।
गदगद हो गए थे श्रीकृष्ण, माता का अपना वात्सल्य भी तो था कुछ भी हो कर्ण आख़िर था तो कुन्ती का प्रथम पुत्र, प्रथम वात्सल्य से कुन्ती का परिचय भी तो इसी ने कराया था ।
भुआ ! आप चिन्ता न करो , मैं देखता हूँ , ये कहकर श्रीकृष्ण फिर पाण्डवों के मध्य में आकर बैठ गए थे ।
दान कौन देगा यज्ञ में ? पूछा था महाराज युधिष्ठिर ने ।
“कर्ण” श्रीकृष्ण ने कहा ।
इस बात का विरोध तो स्वयं महाराज युधिष्ठिर ने भी किया ।
लिखो तुम सहदेव , कर्ण का नाम सबकी बात को अनसुनी करते हुए श्रीकृष्ण लिखवाई ।
पर कर्ण ? अर्जुन कुछ बोलना चाह रहा था पर श्रीकृष्ण ने कहा – उसके हाथों में ऐसी रेखा है , वो जितना दान देगा दुगना फिर आजाएगा । मैं तुम लोगों के भले के लिए कह रहा हूँ , मेरी बात नहीं माननी है तो बोलो । सब ने कहा – आप जो कहेंगे हमें स्वीकार है , सहदेव लिखो कर्ण का नाम , अर्जुन ने अपनी तरफ़ से कहा ।
कुन्ती माता की और श्रीकृष्ण ने देखा तो उनके नेत्रों से अश्रु बह रहे थे ।
अब अंतिम कार्य ! इस कार्य को कौन लेगा ? श्रीकृष्ण ने कहा ।
कार्य तो बताओ ? पाण्डवों ने पूछा था ।
अतिथि जो आयें उनके चरण धोना और उन चरणों को पौंछना ।
सब एक दूसरे को देखने लगे थे , इस कार्य को कोई भी लेने को तैयार नही हुआ ।
श्रीकृष्ण उठे। और हाथ जोड़कर महाराज युधिष्ठिर से बोले – अगर आप कहें तो ये सेवा मैं लेने को तैयार हूँ ।
सब स्तब्ध रह गए थे – आप ऐसा छोटा कार्य करेंगे ? भीम बोला था ।
भीम दादा !
कोई कार्य छोटा बड़ा नही होता बस आवश्यकता है अपने भीतर के हीनता को निकालने की जिसके अन्दर आत्महीनता है उसी के लिय कार्य छोटा या बड़ा होता है पर जो समस्त हीनताओं से मुक्त है उसके लिय हर कार्य सेवा है और कोई सेवा छोटी और बड़ी नही होती ।
समस्त पाण्डवों ने श्रीकृष्ण चरणों में प्रणाम किया था ,
“ईश्वरत्व ऐसे ही किसी में नही उतरता जो समस्त आत्महीनताओं से मुक्त है उसी में इसका प्राकट्य होता है “। ये नयी परिभाषा ईश्वरत्व की द्रोपदी ने दी थी ।
श्रीकृष्ण बस मुस्कुराए थे द्रोपदी को देखकर ।
अहो ! अतिथियों के राजसूय यज्ञ में श्रीकृष्ण ने पैर ही नही धोए उनके खाए हुये जूठे पत्तल भी उठाए , तात ! द्रोपदी ने ये भी ठीक ही कहा – समस्त हीनताओं से श्रीकृष्ण मुक्त हैं इसलिये पूर्ण ईश्वरत्व इनमें है , उद्धव ने विदुर जी से कहा था ।
शेष चरित्र कल


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