श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! शिशुपाल वध – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 50 !!
भाग 1
अद्भुत हैं श्रीकृष्ण , शिशुपाल की माता को कहा था कि ये तेरा बेटा मुझे गालियाँ देगा मैं सह लूँगा पर सौ गाली से ज़्यादा नहीं , एक गाली भी ज़्यादा नहीं ! तात ! सोचने की बात है ना जो सौ गाली तक सह सकता है वो क्या एक दो और नहीं सह सकता , फिर स्वयं ही समाधान करते हुए हंसते हैं उद्धव , विदुर जी से कहते हैं तात ! बात सहन करने की कहांहै बात है सामने वाला पाप कर रहा है। और आप उसको सह कर बढ़ावा दे रहे हो । उत्सव और उमंग के पलों में तुम अपने मन कि मलीनता फैला कर वातावरण को दूषित कर रहे हो , ये पाप है अपराध है । श्रीकृष्ण के सहन की सीमा मात्र सौ गाली नहीं हैं ये तो असीम हैं , ये गाली और स्तुति से परे हैं , इनको कोई गाली भी दे तो उसका भी कल्याण करने वाले हैं ये और किया इन्होंने शिशुपाल का भी कल्याण । उद्धव ने अब अपनी बात को श्रीकृष्ण चरित की और बढ़ा दिया था ।
तात ! अब राजसूय यज्ञ की वेला आयी …………
कौन नहीं आया था उस राजसूय यज्ञ में,
तात ! विश्व के समस्त श्रेष्ठ राजा इंद्रप्रस्थ में उपस्थित थे ।
ऋषीयों में सप्तऋषि प्रमुख होकर आए थे , व्यास पराशर , नारद अंगिरा कौन नहीं थे ।
भीष्म , द्रोणाचार्य , कृपाचार्य , आदि और कौरव समाज तो था ही उनको तो सेवा में ही लगा दिया था वासुदेव ने ।
पर अद्भुत दृश्य तो वो था जब श्रीकृष्ण ने इन सब अतिथियों के चरण स्वयं धोए थे और अपनी पीताम्बरी से ही पौंछा था ।
आप ईश्वर हो , आप पूर्ण ईश्वर हो , भीष्म पितामह ने गदगद होकर कहा ।
चारों और पीले ध्वजा पताका लगवाए थे उससे अलग ही शोभा बन गयी थी इन्द्रप्रस्थ की ।
मार्ग मणि माणिक्य से खचे थे सुन्दर सुन्दर कदली के खम्भ और छायादार वृक्ष लगाए गए थे ।
जल के फुहारें छूट रहे थे स्थान स्थान पर उनकी छटा देखने में बहुत सुन्दर लग रही थी ।
चारों और जो खम्भ थे उस राजसूय यज्ञ में वो सब मणिमाणिक्य के थे , अवनी में भी माणिक्य की कला दिखाई गयी थी ।
“सामने जल प्रपात चल रहा है”, – नारद जी अपने शिष्य वेदव्यास जी से विनोद करते हैं ।
पर वो मात्र आँखो का छलावा है गुरुदेव ! व्यास जी नारद जी को कहते है ।
और वो देखो सरोवर , महल के भीतर सरोवर , व्यास ! उस सरोवर में कमल भी खिले हैं ।
फिर नारद जी कहते हैं – मय दानव अर्जुन से रीझ गए हैं ये इंद्रप्रस्थ हस्तिनापुर की परित्यक्त भूमि थी, काँटे और अनेकानेक कंटकों का भीषण जंगल , जानबूझकर कर ऐसी भूमि इन पाण्डवों को दी गयी थी पर देखो । गुरुदेव ! अर्जुन ने तो मना कर दिया था धृतराष्ट्र महाराज को कि हमें नहीं चाहिए ऐसी भूमि , पर श्रीकृष्ण ने पाण्डवों को कहा सब भूमि अच्छी है बस हमें सजाना और सँवारना आना चाहिए । आज व्यास और नारद जी चर्चा कर रहे हैं इंद्रप्रस्थ को लेकर राजसूय यज्ञ में।
आज देखो , हस्तिनापुर इसके आगे फीका है , ये सब कारीगरी मय दानव की ही तो है ।
जल नहीं है पर लग रहा है कि जल है , और जहां जल है वहाँ जल दिखाई नहीं दे रहा , गुरुदेव ! आप मानते हैं ना सब श्रीकृष्ण कृपा से ही हुआ है ? हाँ हाँ व्यास ! श्रीकृष्ण कृपा से ही तो ये पाण्डव लोग जी रहे हैं , नारद जी ने इतना कहा फिर सामने अंगिरा ऋषि दिखाई दिए तो ये उनके पास चले गए , “सामने जल प्रपात देखो अंगिरा”। व्यास देव अपने गुरुदेव की ये विनोद प्रियता देखकर दूर से हंसते हैं ।
इस सभा में प्रथम पूजा किसकी की जाए ?
सभा लग गयी है दिव्य सिंहासन है उसमें इंद्रप्रस्थ के महाराज के रूप में युधिष्ठिर विराजें हैं और महारानी द्रोपदी ।
कौन नहीं था उस सभा में राजसूय यज्ञ का ये समय था आगन्तुक में सब थे ,
अग्र पूजा किसकी होनी चाहिए ?
देवर्षी ने ही ये प्रश्न और कर दिया उस सभा में ।
बड़े बड़े विद्वान थे वहाँ , बड़े बड़े ऋषि मुनि सब बैठे थे वो देवर्षी के इस प्रश्न पर विचार करने लगे थे । श्रीकृष्ण आनन्द से विराजे हैं और सब की बातें सुन रहे हैं ।
“ श्रीकृष्ण ही अग्र पूजा करने योग्य हैं “ सहदेव उठकर खड़े हो गए और समस्त लोक पाल ऋषि और राजाओं को सम्बोधित करते हुए बोले थे ।
क्यों ? श्रीकृष्ण की ही प्रथम पूजा क्यों ?
नारद जी मुस्कुराते हुए सहदेव से पूछते हैं ।
तब सहदेव ने अद्भुत कहा था , – श्रीकृष्ण हमारे समक्ष विराजमान हैं मैं कह सकता हूँ कि ये यह मात्र एक व्यक्ति नहीं हैं ये प्रत्येक व्यक्ति के अंदर बैठा आत्म तत्व है , समस्त जीवों में यही हैं , बस यही हैं सर्वत्र , सर्वदा यही हैं इनके सिवा और कुछ नहीं हैं ।
बस इतना कहते कहते सहदेव के नेत्र बन्द हो गए थे , उनके रोम रोम से ये वेद की श्रुति प्रकट होने लगी थी – “ एवम् चेत् सर्व भूतानाम् आत्मनम् चार्हंणम् भवेत् “।
हे मेरे आदरणीय महानुभावों ! श्रीकृष्ण ही कारण हैं और कार्य भी यही हैं , यही सबकी सृष्टि करते हैं पालन करते हैं और संहार भी करने वाले यही हैं । सहदेव की बात सुनकर सभा में भीष्म पितामह उठ गए थे , हे सहदेव ! धन्य हो तुम तुमने जो श्रीकृष्ण की महिमा गाई उससे हमारे कान पवित्र हो गए हैं , हम धन्य हो गए , सच कहा तुमने श्रीकृष्ण ही अग्र पूजा करने योग्य हैं ।
क्रमशः …
शेष चरित्र कल


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