!! श्रीराधाचरितामृतम् – 2 !!
राधे ! चलो अवतार लें …
भाग 1
“जय हो जगत्पावन प्रेम कि …..जय हो उस अनिर्वचनीय प्रेम कि …..
उस प्रेम कि जय हो, जिसे पाकर कुछ पानें कि कामना नही रह जाती ।
उस ‘चाह” कि जय हो ………जिस “प्रेम चाह” से कामनारूपी पिशाचिनी का पूर्ण रूप से नाश हो जाता है …….।
और अंत में हे यादवकुल के वंश धर वज्रनाभ ! तुम जैसे प्रेमी कि भी जय हो ……..जय हो ।
महर्षि शाण्डिल्य से “श्रीराधाचरित्र” सुननें कि इच्छा प्रकट करनें पर ……महर्षि के आनन्द का ठिकाना नही रहा …वो उस प्रेम सिन्धु में डूबनें और उबरनें लगे थे ।
हे द्वारकेश के प्रपौत्र ! मैं क्या कह पाउँगा श्रीराधा चरित्र को ?
जिन श्रीराधा का नाम लेते हुए श्रीशुकदेव जैसे परमहंस को समाधि लग जाती है ………..वो कुछ बोल नही पाते हैं ।
हाँ ……प्रेम अनुभूति का विषय है वज्रनाभ ! ये वाणी का विषय नही है ………कुछ देर मौन होकर फिर हँसते हुए बोलना प्रारम्भ करते हैं महर्षि शाण्डिल्य …………हा हा हा हा………गूँगे के स्वाद कि तरह है ये प्रेम ………..गूँगे को गुड़ खिलाओ ….और पूछो – बता कैसा है ?
क्या वो कुछ बोल कर बता पायेगा ? हाँ वो नाच कर बता सकता है ……वो उछल कूद करके ……..पर बोले क्या ?
ऐसे ही वत्स ! तुमनें ये मुझ से क्या जानना चाहा !
तुम कहो तो मैं वेद का सम्पूर्ण वर्णन करके तुम्हे बता सकता हूँ …….तुम कहो तो पुराण इतिहास या वेदान्त गूढ़ प्रतिपादित तत्व का वर्णन करना मुझ शाण्डिल्य को असक्य नही हैं ……..पर प्रेम पर मैं क्या बोलूँ ?
प्रेम कि परिभाषा क्या है ? परिभाषा तो अनन्त हैं प्रेम कि …….अनेक कही गयी हैं ……..अनेकानेक कवियों नें इस पर कुछ न कुछ लिखा है कहा है ………पर सब अधूरा है …………क्यों कि प्रेम कि पूरी परिभाषा आज तक कोई लिख न सका ………..।
पूरी परिभाषा मिल ही नही सकती ………..क्यों कि प्रेम, वाणी का विषय ही नही है ……ये शब्दातीत है ………….इतना कहकर महर्षि शाण्डिल्य फिर मौन हो गए थे ।
हे महर्षियों में श्रेष्ठ शाण्डिल्य ! आपनें “प्रेम” के लिए जो कुछ कहा …..वो तो ब्रह्म के लिए कहा जाता है ………..तो क्या प्रेम और ब्रह्म एक ही हैं ? अंतर नही है दोनों में ?
मैं अधिकारी हूँ कि नही ………..हे महर्षि ! मैं प्रेम तत्व को नही जानता ……..आप कि कृपा हो तो मैं जानना चाहता हूँ……यानि अनुभव करना चाहता हूँ ………आप कृपा करें ।
हाथ जोड़कर श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ नें महर्षि शाण्डिल्य से कहा ।
हाँ, ब्रह्म और प्रेम में कोई अंतर नही है ……………फिर कुछ देर कालिन्दी यमुना को देखते हुए मौन हो गए थे महर्षि ।
नही नही ………..ब्रह्म से भी बड़ा है प्रेम ………..मुस्कुराते हुए फिर बोले महर्षि शाण्डिल्य ।
तभी तो वह ब्रह्म अवतार लेकर आता है ………केवल प्रेम के लिए ।
प्रेम” उस ब्रह्म को भी नचानें कि हिम्मत रखता है …………क्या नही नचाया ? क्या इसी बृज भूमि में गोपियों नें ……..उन अहीर कि कन्याओं नें ……..माखन खिलानें के बहानें से ………उस ब्रह्म को अपनी बाहों में भर कर ……उस सुख को लूटा है ………जिस सुख कि कल्पना भी ब्रह्मा रूद्र इत्यादि नही कर सकते ।
उन गोपियों के आगे वो ब्रह्म नाचता है ……….आहा ! ये है प्रेम देवता का प्रभाव ………नेत्रों से झर झर अश्रु बहनें लग जाते हैं महर्षि के ये सब कहते हुए ।
कृष्ण कौन हैं ? शान्त भाव से पूछा था वज्रनाभ नें ये प्रश्न ।
चन्द्र हैं कृष्ण ………..महर्षि आनन्द में डूबे हुए हैं ………।
कहाँ के चन्द्र ? वज्रनाभ नें फिर पूछा ।
श्रीराधा रानी के हृदय में जो प्रेम का सागर उमड़ता रहता है ……….उस प्रेम सागर में से प्रकटा हुआ चन्द्र है – ये कृष्ण ।
महर्षि नें उत्तर दिया ।
श्रीराधा रानी क्या हैं फिर ? वज्रनाभ नें फिर पूछा ।
वो भी चन्द्र हैं , पूर्ण चन्द्र ! महर्षि का उत्तर ।
कहाँ कि चन्द्र ? वज्रनाभ आनन्दित हैं , पूछते हुए ।
वत्स वज्रनाभ ! श्रीकृष्ण के हृदय समुद्र में जो संयोग वियोग कि लहरें चलती और उतरती रहती हैं ……..उसी समुद्र में से प्रकटा चन्द्र है ये श्रीराधा …..।
तो फिर ये दोनों श्रीराधा कृष्ण कौन हैं ?
दोनों चकोर हैं और दोनों ही चन्द्रमा हैं ………..कौन क्या है कुछ नही कहा जा सकता ………इसे इस तरह से माना जाए …….. राधा ही कृष्ण है और कृष्ण ही राधा है ………….क्या वज्रनाभ ! प्रेम कि उस उच्चावस्था में अद्वैत नही घटता ? वहाँ कौन पुरुष और कौन स्त्री ?
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल …..


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