श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! “वो सुदामा के चिउरा” – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 67 !!-भाग 2 : Niru Ashra

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श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! “वो सुदामा के चिउरा” – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 67 !!

भाग 2

तो सब ऐसे ही आयी हैं ? सुदामा को आश्चर्य हो रहा है ।

हाँ, हाँ कोई खुद ही आगयी हैं तो किसी को भगा के लाए हैं ।

ये कहते हुए रुक्मणी की और श्रीकृष्ण ने देखा था ।

अच्छा छोड़ो इन बातों को …..सुदामा ! मैंने ये बात इसलिए छेड़ी है कि अगर मेरी भाभी आयी है …तो उसने अपने इस देवर के लिए क्या भेजा है ? श्रीकृष्ण ये कहते हुए भाव में डूब गए थे ।

सुदामा ने जैसे ही श्रीकृष्ण के मुख से ये सुना कि …..मेरी भाभी ने मेरे लिए क्या भेजा है ……

सुदामा तो संकोच में पड़ गए ……क्या दूँ मैं इस द्वारिकाधीश को ! वो तीन मुट्ठी चिउरा ?

सुवर्ण की जिसने पुरी बनाई हो उसे सुदामा दे ……….चिउरा ?

हंसी नही होगी मेरी ? सुदामा सोचते जा रहे हैं , चलो मेरी हंसी हो कोई बात नही , दुनिया सुदामा पर हंसती है …..पर यहाँ तो मेरे साथ श्रीकृष्ण जुड़ा हुआ है , ये महारानियाँ बड़े बड़े घरों की हैं , ये क्या सोचेंगी ? कृष्ण के मित्र ऐसे होते हैं , जो चिउरा लेकर आया है ।

क्या हुआ सुदामा ! मेरी भाभी ने क्या भेजा है मेरे लिए ? श्रीकृष्ण फिर पूछ रहे हैं ।

कितना आनन्द आता था ना गुरुकुल में …….कृष्ण ! तुम शस्त्र विद्या , राजनीति इन सब में आगे थे किन्तु ब्रह्म विद्या में तो मैं ही था आगे । सुदामा बात को बदल रहे हैं ।

सुदामा ! पर मेरी भाभी ने क्या भेजा है ….ये बताओ ।

अरे ! तुम्हें पता है वो गुरुमाता ………श्रीकृष्ण ने कहा सब पता है सुदामा ! तुम तो ये बताओ कि मेरी भाभी ने मेरे लिए क्या भेजा है ?

सुदामा असत्य बोलते नही हैं , सत्य कैसे बोलें …..चिउरा दिखाऊँ ! ऐसी कनक पुरी में आकर !

सुदामा अब कुछ नही कह रहे , पर श्रीकृष्ण सुदामा के चरणों में एकाएक आकर बैठ गए थे ।

वो बस सुदामा के नेत्रों में देख रहे हैं , फिर पूछते हैं घर में सब ठीक है ना ?

हाँ, सब ठीक है ……मेरी भाभी ? हाँ तेरी भाभी ठीक है …..बालक ? हाँ , बालक भी प्रसन्न हैं ,

कोई कमी है सुदामा घर में ? ना , ना कृष्ण ! कोई कमी नही है , सब आनन्द है , तुम्हारी कृपा है सब आनन्द है ।

ये काँख में क्या है तुम्हारे ……….श्रीकृष्ण ने एकाएक सुदामा के काँख में हाथ डाला और वो चिउरा की पोटरी निकाल ली थी ।

ये क्या …..पोटरी को हाथ में लेकर श्रीकृष्ण ने जैसे ही देखा , रो पड़े थे द्वारिकानाथ ।

मन ही मन सोचने लगे – इतनी ग़रीबी है घर में , चिउरा बांधने के लिए भी एक कपड़ा साबुत नही है…..पर धन्य है तू सुदामा ……एक बार अपनी ग़रीबी का बखान नही किया , मैंने पूछा भी तो कह दिया सब आनन्द है , सोने की मेरी द्वारिका भी तुझ को बदल नही पाई , तू विश्व का सबसे बड़ा दाता है सुदामा ….तू विश्व का सबसे बड़ा श्रीमंत है सुदामा ! मैं तुझे क्या दे सकता हूँ आज जगतपति को ही तूने दिया है । रानियाँ चकित हैं , पोटरी को ही देखकर ये रो रहे हैं ……।

श्रीकृष्ण ने पोटरी खोली , चिउरा , कच्चे चिउरा थे उसमें । कमल नयन के नयन बरस पड़े थे ,

एक मुट्ठी चिउरा ली द्वारकेश ने , भाव सिंधु में पूरी तरह से डूब चुके हैं ये ।

जैसे ही उन चिउरा को मुँह में डाला ……..एक लोक की सम्पत्ति मैंने सुदामा को दी ।

दूसरी मुट्ठी मुँह में डाली , दो लोक की संपत्ति मैंने सुदामा को दी ।

पर अब जैसे ही तीसरी मुट्ठी मुँह दे रहे थे चिउरा के …..तभी रुक्मणी ने हाथ पकड़ लिया ।

सुदामा ने भी देखा , समस्त रानियों ने भी देखा, श्रीकृष्ण को कुछ रोष भी आगया था रुक्मणी पर।

रुक्मणी ! क्यो तुम इस रस में बाधक बन गयीं ? मैं और मेरा मित्र हम दोनों मैत्री के भाव सिंधु में गहरे डूब गए थे , क्यों विघ्न डाल दिया तुमने रुक्मणी !

ये मेरा सखा है ….. मैं सर्वस्व दे कर अपने आपको भी सौंप सकता हूँ इसके चरणों में , श्रीकृष्ण के नेत्रों से अविरल अश्रु बहते जा रहे थे ।

मेरे लिए इन्द्र , ब्रह्मा , रुद्र और तुम भी महत्वपूर्ण नही हो , जितने मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं ये मेरे अपने अयाचक भक्त । रुक्मणी …..तुम्हें क्या लगा ये सुदामा तुम लक्ष्मी के पीछे पड़ा है ?

इसे कुछ नही चाहिए , इसे केवल मैं , उसका सखा चाहिए …….श्रीकृष्ण ये सब जो बोल रहे हैं रुक्मणी से वो नयनों से सम्वाद कर रहे हैं । इन चर्चाओं को तीसरा कोई सुन नही था , केवल रुक्मणी सुन रही हैं और भक्तवत्सल बोलते जा रहे हैं ।

हम भी तो प्रसाद लेंगे , नाथ ! इसलिए मैंने आपको रोका ।

ये बात सुदामा को सुनाने के लिए बाहर रुक्मणी बोलीं थीं ।

श्रीकृष्ण रोष में थे , वो और भी सुनाना चाहते थे रुक्मणी को , पर सुदामा ने देखा भाभी पर ये इतना रुष्ट क्यो हो गया है ?

कृष्ण …… रहने दे ना , भाभी भी चिउरा लेना चाहती होगी इसलिए ही उसने तुम्हें रोका ।

श्रीकृष्ण ने रुक्मणी की और देखा उन्हें गलती का भान हो गया था , सिर को झुका लिया था रुक्मणी ने ।

पर मेरे मित्र ! सुदामा को देखकर फिर भाव विह्वल हो उठे थे श्रीकृष्ण ।

दुनिया में मैंने बहुत कुछ खाया है , मुझे लोगों ने बहुत कुछ खिलाया है ….किन्तु सुदामा ! तुमने जो मुझे ये चिउरा दिए ऐसा स्वाद आजतक नही आया ।

ये कहते हुए श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने हृदय से लगा लिया था ।

शेष चरित्र कल –

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