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August 30, 2025 2:00 am

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કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

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श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! “उद्धव गीता”- उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 85 !!-भाग 1 : Niru Ashra

श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! “उद्धव गीता”- उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 85 !!-भाग 1 : Niru Ashra

श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! “उद्धव गीता”- उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 85 !!

भाग 1

उद्धव को इस तरह विकल देख विदुर जी ने उन्हें शान्त कराया …..फिर बोले – उद्धव , तुम तो श्रीकृष्ण के प्रिय हो …परमप्रिय ……परमधाम जाने से पूर्व श्रीकृष्ण ने तुम्हें उपदेश किया था …क्या मुझे वो उपदेश सुनाओगे ? विदुर जी ने उद्धव से प्रार्थना के स्वर में कहा ।

हाँ………नेत्रों में अश्रु भरे हुए हैं उद्धव के ……वो लम्बी स्वाँस लेते हैं ……अपने आपको सम्भालते हैं ….फिर कहते हैं – “ब्रह्म मुहूर्त की वेला थी ….श्री वासुदेव गोमती के तट में बड़े शान्त भाव से बैठे थे …..वो सुखासन में बैठे थे ……उनके नयन अधखुले थे ।

मैं गया और अष्टांग प्रणाम करके वहीं बैठ गया ।

तात ! कुछ ही समय बीता होगा कि नभ में देवों की भीड़ जुटनी शुरू हो गयी थी ।

सूर्योदय होने में अभी समय था ..किन्तु देवों का प्रकाश नभ से छिटक कर पृथ्वी तक आरहा था ।

पुरुषोत्तम की स्तुति समस्त देवों ने की थी ….सस्वर की थी….पुष्प भी बरसाए …..

किन्तु भगवान श्रीकृष्ण अपने ध्यान में ही लीन बने रहे …..उन्हें कोई फर्क नही पड़ रहा था की कौन उनकी स्तुति कर रहा है और कौन उनकी निन्दा ।

तभी मैंने देखा तात !
देवों से आगे चतुर्मुख सृष्टिकर्ता आए ..और पृथ्वी की ओर नीचे उतरने लगे थे ।

मैं उस दृश्य को देखकर रोमांचित हो रहा था …..भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में उन्होंने आकर प्रणाम किया ……..और हाथ जोड़कर बोले …..नाथ ! अब अवतार कार्य पूर्ण हो गया है …..इसलिए आप अपने धाम पधारिए …..गम्भीर वाणी थी जगत सृष्टा ब्रह्मा की ….उनकी वाणी से भगवान ध्यान से उठे थे …..उन्होंने देखा ब्रह्मा को …..ब्रह्मा ने फिर प्रणाम किया ।

अपनी कही बातों को जब फिर दोहराने लगे थे विधाता ….तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें रोककर कहा ….हाँ …मेरे अवतार का कार्य पूर्ण हो चुका है …..हे विधाता ब्रह्मा ! पृथ्वी का भार भी कह सकते हैं दूर हो गया है …..किन्तु सब से बड़ा भार तो अभी मेरा अपना कुल है ।

“उन्हें ऋषियों का श्राप मिल चुका है”…..ब्रह्मा जी ने अपने चारों मस्तक झुकाकर कहा ।

किन्तु ब्रह्मदेव , मैं अगर अभी परमधाम के लिए प्रस्थान करूँ ….तो ऋषियों का वो श्राप संसार में फैल कर उत्पात मचा सकता है …..इसलिए हे चतुर्मुख ब्रह्मा ! बस अपने इस कुल का संहार करके मैं अपने धाम आ ही रहा हूँ ……इतना कहकर कमलनयन शान्त हो गए थे ।

हे मधुसूदन ! आपके अवतार के साथ कई देवों ने भी अवतार लिया था इस भूतल पर, आपकी लीला में वो सब सहायक हुये थे ….उन्हें भी अपने लोकों में लौटना होगा इसलिए भी मैं आपसे प्रार्थना करने आया था …..नाथ ! आप के संकल्प से ही सब कुछ हो जाता हैं …फिर भी आप लीला करते हैं ….आपकी जय हो …जय हो …..इतना कहकर विधाता ब्रह्मा देवों के साथ अंतर्ध्यान हो गए थे ।


“नाथ ! मेरा क्या होगा”

ब्रह्मा जी के अंतर्ध्यान होते ही मैंने भगवान श्रीकृष्ण के चरण पकड़ लिए ।

मैं हिलकियों से रो रहा था …..मेरा क्या होगा …आपके परमधाम जाने के बाद !

हे गोविन्द ! मैं आपकी प्रसादी ही पहनता रहा हूँ …..मैं आपका ही प्रसाद ग्रहण करता रहा हूँ …मैं बस आपका ही हूँ । ये जीवन आपका प्रसाद ही है ….इस उद्धव के जीवन सर्वस्व आपही हो ….मुझे यहाँ मत छोडियेगा नाथ । इससे ज़्यादा मुझ से कुछ बोला नही गया …मेरी हिलकियाँ बंध गयीं थीं ।

उद्धव ! तुम मेरे हो ….मेरे अपने हो ….अन्तरंग मेरे प्रिय हो …..ये कहते हुए मेरे नाथ ने मुझे अपने हृदय से लगा लिया था …..मैं उस समय फूट फूट कर रो उठा ।

उद्धव ! तुम मुझे बहुत प्रिय हो ….इतने प्रिय कि, कि रुद्र भी नही , ब्रह्मा भी नही , संकर्षण नही अरे मेरे उद्धव ! मेरी अंग संगा लक्ष्मी नही और क्या कहूँ मुझे मेरी आत्मा भी इतनी प्रिय नही है जितने प्रिय उद्धव तुम हो । भगवान मुझे उस समय अपने हृदय से ही लगाए हुए थे …..उनके श्रीअंग से जो सुगन्ध निकल रही थी ….ओह ….मैं प्रेम समाधि में निमग्न हो रहा था ।

क्रमशः …
शेष चरित्र कल –

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