!! श्रीराधाचरितामृतम् 2 !! -राधे ! चलो अवतार लें … भाग 3 : Niru Ashra

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!! श्रीराधाचरितामृतम् 2 !!

राधे ! चलो अवतार लें …
भाग 3

हम तीनों देव हैं ……….ब्रह्मा विष्णु और ये महेश ।

अच्छा ! आप लोग सृष्टि कर्ता , पालन कर्ता और संहार कर्ता हैं ?

ललिता सखी को देर न लगी समझनें में ………फिर कुछ देर बाद बोली …..पर आप किस ब्रह्माण्ड के विष्णु , ब्रह्मा और शंकर हैं ?

क्या ? ब्रह्मा चकित थे……..क्या ब्रह्माण्ड भी अनेक हैं ?

ललिता सखी हँसी………….अनन्त ब्रह्माण्ड हैं हे ब्रह्मा जी ! और प्रत्येक ब्रह्माण्ड के अलग अलग विष्णु होते हैं ….अलग ब्रह्मा होते हैं और अलग अलग शंकर होते हैं ।

अब आप ये बताइये कि किस ब्रह्माण्ड के आप लोग ब्रह्मा विष्णु महेश हैं ?

कोई उत्तर नही दे सका …….तो आगे आये भगवान विष्णु …………हे सखी ललिते ! हम उस ब्रह्माण्ड के तीनों देव हैं …….जहाँ का ब्रह्माण्ड वामन भगवान के पद की चोट से फूट गया था ।

ओह ! अच्छा बताइये ……..यहाँ क्यों आये ? ललिता नें पूछा ।

पृथ्वी में हाहाकार मचा है ………..कंस जरासन्ध जैसे राक्षसों का अत्याचार चरम पर पहुँच गया है ……….वैसे हम लोग चाहते तो एक एक अवतार लेकर उनका उद्धार कर सकते थे ……….पर !

ब्रह्मा चुप हो गए ……….तब भगवान शंकर आगे आये ………….बोले –

हम श्रीश्याम सुन्दर के अवतार कि कामना लेकर आये हैं ……सखी ! .उनका अवतार हो …..और हम सबको प्रेम का स्वाद चखनें को मिले ।

भगवान शंकर नें प्रार्थना कि …………..।

और हम लोगों के साथ साथ अनन्त योगी जन हैं अनन्त ज्ञानी जन हैं………अनन्त भक्तों कि ये इच्छा है की …….. श्री श्याम सुन्दर की दिव्य लीलाओं का आस्वादन पृथ्वी में हो …..भगवान विष्णु नें ये बात कही ।

ठीक है आप लोग जाइए ….मैं आपकी प्रार्थना श्याम सुन्दर तक पहुँचा दूंगी ……इतना कहकर ललिता सखी निकुञ्ज में चली गयीं ……..।


प्यारी मान जाओ ना ! देखो ! मैं हूँ तुम्हारा अपराधी …….हाँ …..मुझे दण्ड दो राधे ! मुझे दण्डित करो ………इस अपराधी को अपने बाहु पाश से बांध कर …. …हृदय में कैद करो ।

हे वज्रनाभ ! उस नित्य निकुञ्ज में आज रूठ गयी हैं श्रीराधा रानी ………और बड़े अनुनय विनय कर रहे हैं श्याम सुन्दर ………पर आज राधा मान नही रहीं ।

इन पायल को बजनें दो ना ! ये करधनी कितनी कस रही है तुम्हारी क्षीण कटि में …………इसे ढीला करो ना !

हे राधे ! तुम्हारी वेणी के फूल मुरझा रहे हैं …………नए लगा दूँ …..नए सजा दूँ ।

युगल सरकार की जय हो !

ललिता सखी नें उस कुञ्ज में प्रवेश किया ।

हाँ क्या बात है ललिते !

देखो ना ! “श्री जी” आज मान ही नही रहीं…………असहाय से श्याम सुन्दर ललिता सखी से बोले ।

मुस्कुराते हुए ललिता नें अपनी बात कही ……हे श्याम सुन्दर ! बाहर आज तीन देव आये थे …..ब्रह्मा ,विष्णु , महेश …………

क्यों आये थे ? श्याम सुन्दर नें पूछा ।

“पृथ्वी में त्राहि त्राहि मची हुयी है ……..कंसादि राक्षसों का आतंक”

…..ललिता आगे कुछ और कहनें जा रही थी …..पर श्याम सुन्दर नें रोक दिया ………बात ये नही है ……क्या राक्षसों का वध ये विष्णु या महेश से सम्भव नही है ?………..उठे श्याम सुन्दर …….तमाल के वृक्ष की डाली पकडकर त्रिभंगी भंगिमा से बोले …….”बात कुछ और है” ।

हाँ बात ये है …………कि वो लोग, और अन्य समस्त देवता ……..समस्त ज्ञानीजन, योगी, भक्तजन …….आपकी इन प्रेममयी लीलाओं का आस्वादन पृथ्वी में करना चाहते हैं …………ताकि दुःखी मनुष्य ……आशा पाश में बंधा जीव …..महत्वाकांक्षा की आग में झुलसता जीव जब आपकी प्रेमपूर्ण लीलाओं को देखेगा …..सुनेगा गायेगा तो ………

क्या कहना चाहते थे वो तीन देव ?

श्याम सुन्दर नें ललिता की बात को बीच में ही रोककर …….स्पष्ट जानना चाहा ।

“आप अवतार लें ……..पृथ्वी में आपका अवतार हो ” ।

ललिता सखी नें हाथ जोड़कर कहा ।

ठीक है मैं अवतार लूंगा !

श्याम सुन्दर नें मुस्कुराते हुए अपनी प्रियतमा श्रीराधा रानी की ओर देखते हुए कहा ।

चौंक गयीं थी श्रीराधा रानी …………..मानों प्रश्न वाचक नजर से देखा था अपनें प्रियतम को ……….मानों कह रही हों …..”मेरे बिना आप अवतार लोगे ?

नही ..नही प्यारी ! आप तो मेरी हृदयेश्वरी हो…..आपको तो चलना ही पड़ेगा……श्याम सुन्दर नें फिर अनुनय विनय प्रारम्भ कर दिया था ।

नही …….प्यारे !

अपनें हाथों से श्याम सुन्दर के कपोल छूते हुए श्रीराधा नें कहा ।

पर क्यों ? क्यों ? राधे !

क्यों की जहाँ श्रीधाम वृन्दावन नहीं …..गिरी गोवर्धन नहीं …….और मेरी प्यारी ये यमुना नहीं …………इतना ही नहीं …..मेरी ये सखियाँ ………इनके बिना मेरा मन कहाँ लगेगा ?

तो इन सब को मैं पृथ्वी में ही स्थापित कर दूँ तो ?

आनन्दित हो उठी थीं……..श्रीराधा रानी !

हाँ …..फिर मैं जाऊँगी ……………….।

पर लीला है प्यारी !

 याद रहे  विरह , वियोग की पराकाष्ठा का दर्शन  आपको कराना होगा  इस जगत को   ।

प्रेम क्या है ……..प्रेम किसे कहते हैं इस बात को समझाना होगा इस जगत को……….श्याम सुन्दर नें कहा ।

हे वज्रनाभ ! नित्य निकुञ्ज में अवतार की भूमिका तैयार हो गयी थी ।

महर्षि शाण्डिल्य से ये सब निकुञ्ज का वर्णन सुनकर चकित भाव से ………यमुना जी की लहरों को ही देखते रहे थे वज्रनाभ ।

“हे राधे वृषभान भूप तनये …….हे पूर्ण चंद्रानने”

शेष चरित्र कल …..

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