कृष्ण के सुदर्शन चक्र व बाँसुरी का अर्थ व रहस्य ?? : Hiran Vishnav

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कृष्ण के सुदर्शन चक्र व बाँसुरी का अर्थ व रहस्य ??

हिन्दू धर्मशास्त्र अनुसार श्रीकृष्ण सुदर्शन चक्र धारण करते हैं और बाँसुरी भी। सुदर्शन चक्र जंहा विनाश का धोतक है,वंही बाँसुरी सृजन की। श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र व बाँसुरी धारण करने की दार्शनिक व उपनिषेदिक व्याख्या कुछ भी की जा सकती है, परंतु हिन्दू धर्मशास्त्र के मूल मंतव्य में ये सही व्याख्या नही होंगी। चंद्र रूपक श्री कृष्ण, और उनके विभिन्न उपादान यथा चक्र, बाँसुरी, गाय, गोपियाँ आदि आदि की मूल व्याख्या निम्न है।
1 कृष्ण बाँसुरी बजाते है । संगीत को सदैव सृजन से जोड़ा गया है। पर कृष्ण किसका सृजन कर रहे है, देखते है। अमावस्या का चंद्र दो दिन तक अंतरिक्ष मे दिखाई नही देता। इसे चंद्र की मृत्यु कहते हैं। दो दिन बाद यही चंद्र पुनः अंतरिक्ष मे दिखाई देने लगता है। ये चंद्र का जीवन है। बाँसुरी इसी जीवन और मृत्यु की लय का प्रतीक है। कृष्ण बाँसुरी उस समय बजाते है जब गायें गुम हो जाती है और कृष्ण की बांसुरी की मधुर तान पर वापिस आ जाती हैं। अमावस्या के चंद्र के दिखाई न देने का रूपक है गायो का गम हो जाना। चंद्र के पुनः प्रकट होने का रूपक है गायों का वापिस आना। बाँसुरी इसी का प्रतीक है।
सुदर्शन चक्र से कृष्ण दुस्टों का विनाश करते हैं। चंद्र का सुदर्शन चक्र से और विनाश से क्या संबंध। सुदर्शन चक्र मूलतः सूर्य का प्रतीक है। चंद्र की अपनी कोई शक्ति नही होती वो तो सूर्य से चलता है। उसकी मृत्यु और जीवन दोनों सूर्य के हाथ हैं। इसलिये कृष्ण को वध करने के लिए चक्र अर्थात सूर्य की आवश्यकता होती है, अर्थात सूर्य की तीव्र किरणे विनाश कर देती है। इसलिये कृष्ण प्रकृति के दोनों अवयव सूर्य व चंद्र का प्रदर्शित करते है। सूर्य वध के लिए और चंद्र, जीवन मरण की लय प्रदर्शित करता है।
ये एक और रहस्य बताता हूँ। श्रीकृष्ण स्वयं एक बहेलिया के तीर से मरे थे। तीर यंहा सूर्य का प्रतीक है, और कृष्ण की मृत्यु सूर्य ग्रहण का प्रतीक है, जब अमावस्या पर चंद्र,दिखाई नही दे रहा, आसमान सूना है, और चंद्र को ढकने वाला महा प्रतापी सूर्य, ग्रहण की आगोश में आकर स्वयं मृत्यु के द्वार पर है।
हिन्दू धर्मशास्त्र में राम जंहा सूर्य की गाथा है, वंही कृष्ण चंद्र का महाकाव्य है। गाय,गोपियां चंद्र व चंद्र किरणों के धोतक हैं।
डॉ अरस्तु प्रभाकर।

हिन्दू धर्मशास्त्र अनुसार श्रीकृष्ण सुदर्शन चक्र धारण करते हैं और बाँसुरी भी। सुदर्शन चक्र जंहा विनाश का धोतक है,वंही बाँसुरी सृजन की। श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र व बाँसुरी धारण करने की दार्शनिक व उपनिषेदिक व्याख्या कुछ भी की जा सकती है, परंतु हिन्दू धर्मशास्त्र के मूल मंतव्य में ये सही व्याख्या नही होंगी। चंद्र रूपक श्री कृष्ण, और उनके विभिन्न उपादान यथा चक्र, बाँसुरी, गाय, गोपियाँ आदि आदि की मूल व्याख्या निम्न है।
1 कृष्ण बाँसुरी बजाते है । संगीत को सदैव सृजन से जोड़ा गया है। पर कृष्ण किसका सृजन कर रहे है, देखते है। अमावस्या का चंद्र दो दिन तक अंतरिक्ष मे दिखाई नही देता। इसे चंद्र की मृत्यु कहते हैं। दो दिन बाद यही चंद्र पुनः अंतरिक्ष मे दिखाई देने लगता है। ये चंद्र का जीवन है। बाँसुरी इसी जीवन और मृत्यु की लय का प्रतीक है। कृष्ण बाँसुरी उस समय बजाते है जब गायें गुम हो जाती है और कृष्ण की बांसुरी की मधुर तान पर वापिस आ जाती हैं। अमावस्या के चंद्र के दिखाई न देने का रूपक है गायो का गम हो जाना। चंद्र के पुनः प्रकट होने का रूपक है गायों का वापिस आना। बाँसुरी इसी का प्रतीक है।
सुदर्शन चक्र से कृष्ण दुस्टों का विनाश करते हैं। चंद्र का सुदर्शन चक्र से और विनाश से क्या संबंध। सुदर्शन चक्र मूलतः सूर्य का प्रतीक है। चंद्र की अपनी कोई शक्ति नही होती वो तो सूर्य से चलता है। उसकी मृत्यु और जीवन दोनों सूर्य के हाथ हैं। इसलिये कृष्ण को वध करने के लिए चक्र अर्थात सूर्य की आवश्यकता होती है, अर्थात सूर्य की तीव्र किरणे विनाश कर देती है। इसलिये कृष्ण प्रकृति के दोनों अवयव सूर्य व चंद्र का प्रदर्शित करते है। सूर्य वध के लिए और चंद्र, जीवन मरण की लय प्रदर्शित करता है।
ये एक और रहस्य बताता हूँ। श्रीकृष्ण स्वयं एक बहेलिया के तीर से मरे थे। तीर यंहा सूर्य का प्रतीक है, और कृष्ण की मृत्यु सूर्य ग्रहण का प्रतीक है, जब अमावस्या पर चंद्र,दिखाई नही दे रहा, आसमान सूना है, और चंद्र को ढकने वाला महा प्रतापी सूर्य, ग्रहण की आगोश में आकर स्वयं मृत्यु के द्वार पर है।
हिन्दू धर्मशास्त्र में राम जंहा सूर्य की गाथा है, वंही कृष्ण चंद्र का महाकाव्य है। गाय,गोपियां चंद्र व चंद्र किरणों के धोतक हैं।
डॉ अरस्तु प्रभाकर।

कृष्ण के सुदर्शन चक्र व बाँसुरी का अर्थ व रहस्य ??

हिन्दू धर्मशास्त्र अनुसार श्रीकृष्ण सुदर्शन चक्र धारण करते हैं और बाँसुरी भी। सुदर्शन चक्र जंहा विनाश का धोतक है,वंही बाँसुरी सृजन की। श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र व बाँसुरी धारण करने की दार्शनिक व उपनिषेदिक व्याख्या कुछ भी की जा सकती है, परंतु हिन्दू धर्मशास्त्र के मूल मंतव्य में ये सही व्याख्या नही होंगी। चंद्र रूपक श्री कृष्ण, और उनके विभिन्न उपादान यथा चक्र, बाँसुरी, गाय, गोपियाँ आदि आदि की मूल व्याख्या निम्न है।
1 कृष्ण बाँसुरी बजाते है । संगीत को सदैव सृजन से जोड़ा गया है। पर कृष्ण किसका सृजन कर रहे है, देखते है। अमावस्या का चंद्र दो दिन तक अंतरिक्ष मे दिखाई नही देता। इसे चंद्र की मृत्यु कहते हैं। दो दिन बाद यही चंद्र पुनः अंतरिक्ष मे दिखाई देने लगता है। ये चंद्र का जीवन है। बाँसुरी इसी जीवन और मृत्यु की लय का प्रतीक है। कृष्ण बाँसुरी उस समय बजाते है जब गायें गुम हो जाती है और कृष्ण की बांसुरी की मधुर तान पर वापिस आ जाती हैं। अमावस्या के चंद्र के दिखाई न देने का रूपक है गायो का गम हो जाना। चंद्र के पुनः प्रकट होने का रूपक है गायों का वापिस आना। बाँसुरी इसी का प्रतीक है।
सुदर्शन चक्र से कृष्ण दुस्टों का विनाश करते हैं। चंद्र का सुदर्शन चक्र से और विनाश से क्या संबंध। सुदर्शन चक्र मूलतः सूर्य का प्रतीक है। चंद्र की अपनी कोई शक्ति नही होती वो तो सूर्य से चलता है। उसकी मृत्यु और जीवन दोनों सूर्य के हाथ हैं। इसलिये कृष्ण को वध करने के लिए चक्र अर्थात सूर्य की आवश्यकता होती है, अर्थात सूर्य की तीव्र किरणे विनाश कर देती है। इसलिये कृष्ण प्रकृति के दोनों अवयव सूर्य व चंद्र का प्रदर्शित करते है। सूर्य वध के लिए और चंद्र, जीवन मरण की लय प्रदर्शित करता है।
ये एक और रहस्य बताता हूँ। श्रीकृष्ण स्वयं एक बहेलिया के तीर से मरे थे। तीर यंहा सूर्य का प्रतीक है, और कृष्ण की मृत्यु सूर्य ग्रहण का प्रतीक है, जब अमावस्या पर चंद्र,दिखाई नही दे रहा, आसमान सूना है, और चंद्र को ढकने वाला महा प्रतापी सूर्य, ग्रहण की आगोश में आकर स्वयं मृत्यु के द्वार पर है।
हिन्दू धर्मशास्त्र में राम जंहा सूर्य की गाथा है, वंही कृष्ण चंद्र का महाकाव्य है। गाय,गोपियां चंद्र व चंद्र किरणों के धोतक हैं।
डॉ अरस्तु प्रभाकर।

Hiran Vaishnav
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