श्री गौरीदासी Part 7 : Niru Ashra

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📖✨ श्री गौरदासी ✨📖
भाग – 7

गतांक से आगे –

गौर दासी के पास एक कड़ा था ….सोने का कड़ा ….उसे बेचना पड़ा ….वैसे भी इसे रखकर वो करती क्या ? मकान मालिक बृजवासी को सोने का कड़ा देते हुए उसने कहा था ….मीत कह रहा है दिवाली आरही है यहाँ सब नये नये कपड़े पहनते हैं ….मेरे लिए भी दिला ….तो आप इस कड़ा को बेचकर मुझे पैसा ला दो ….घर मालिक बृजवासी बहुत भला आदमी था …उसने मना किया – कि बाई ! सोना बेचो मत जो भी पैसा चाहिए हमसे ले लो …फिर तुम्हें कहाँ से लौटाऊँ ? मेरी कोई फ़ैक्ट्री थोड़े ही है या मैं कहीं नौकरी तो करती नही …मकान मालिक को अच्छा नही लग रहा …पर गौर दासी ने उसे बड़े प्रेम से समझाया ….भैया ! मैं क्या करूँगी इसे रखकर …मेरा जो भी है अब मीत ही तो है ….तुम इसे बेच दो । वो क्या कहता …वो गया और दो सौ रुपये लाकर दे दिया ….सुनार ने दिया था । सौ रूपये मकान मालिक को देते हुये गौर दासी ने कहा ….मेरे पास किराये देने के लिए अब कब पैसे होंगे इसे रख लो । उस बृजवासी ने रख लिया ।

सौ रुपये में बढ़िया बढ़िया पोशाक ….राशन पानी …और मिठाई ख़रीद कर ले आयी थी गौर दासी । पर तू अपने लिए कुछ नही लाई ? श्याम सुन्दर ने पूछा ।

क्यों इन कपड़े में मैं तुम्हें अच्छी नही लगती ? मुँह बनाते हुये श्याम सुन्दर ने कहा …”नही” ।

तो किसी और को देख लो….हाँ अब मैं क्यों अच्छी लगूँगी …..ये कहते हुए गौर दासी भी मान कर रही थी । पर इस दिवाली में एक साड़ी तो ले ले …..श्याम सुन्दर जिद्द करने लगे हैं …..पर अब मेरे पास पैसे नही है …..गौर दासी बोली । श्याम सुन्दर मुस्कुराये और बोले …दरवाज़ा खोल …क्यों ! गौर दासी पूछ ही रही थी …कि …बाई ! दरवाज़ा खोलो …मकान मालिक की पत्नी आयी थी …..खोल , श्याम सुन्दर नैनों को नचा कर कह रहे हैं । गौर दासी ने दरवाज़ा जैसे ही खोला ….बाई ! सारे पैसे क्यों दे दिये ? दिवाली आरही है …लो दस रुपये रख लो …..इससे अपने लिए अच्छी सी साड़ी ख़रीद लेना ….तुम लाल साड़ी ख़रीदना और सुन्दर लगोगी …पैसा देकर वो जैसे ही जाने लगी …फिर मुड़कर पूछा ….तुम विधवा तो नही हो ना ? तेज आवाज में गौर दासी बोली …”नही”….फिर ठीक है …..श्याम सुन्दर हंसे ….बड़े प्रसन्न हो रहे हैं श्याम सुन्दर ।

बाई ! लाओ दस रुपये ….मकान मालकिन फिर माँग कर ले गयी …..और जाते जाते बोली …अब तुम कहाँ जाओगी बाजार मैं ही ले आती हूँ ……एक दो घण्टे में लाल सुरंग साड़ी लेकर आयी थी ….गजरा भी था साथ में । गौर दासी हंसते हुए श्याम सुन्दर से पूछती है …..कहाँ लगाकर जाऊँगी इसे ? जाना क्यों मेरे लिए लगाना …यहीं ….ये कहते हुये कितने प्रेम पूर्ण थे श्याम सुन्दर ।


“सिर्फ लीला चिन्तन आदि प्रारम्भिक अवस्था में साधकों को नही करने चाहिये ….प्रारम्भ में तो नाम जाप जम कर साधक करे” । गौरांग बाबा अपने साधकों को समझा रहे थे ।

बाबा ! मानसिक पूजा में चाँदी के चम्मच से माखन खिलाऊँ ठाकुर जी को या सोने के ?

बाबा बोले ….अभी इन सब झंझट में मत पड़ो ….तुम बस नाम जाप में ध्यान दो …कितना जाप करते हो ? उसकी संख्या बढ़ाओ ….ये सब अभी तुम्हारे काम की वस्तु नही है …अभी तो नाम जाप करो ..खूब नाम जाप ।

पर गुरुदेव ! मुझ से नाम जाप की अपेक्षा लीला स्फूर्ति सहज होती है …मैं क्या करूँ ?

ये गौर दासी भी जब जब समय मिलता है अपने गुरुदेव गौरांग बाबा के चरणों में आ बैठती …इसने ये प्रश्न किया तो बाबा बोले …सबके लिए एक ही बात नही होती ….तुम्हारी अवस्था सिद्ध है ….पर तुम जो करती हो उसकी नक़ल कोई और करेगा तो उसका पतन होना निश्चित है ….बाबा स्पष्ट बोले थे । तुम कान्ता भाव से श्याम सुन्दर को भजती हो ….पति है वो तुम्हारे …..ये भाव तुम्हारा सहज है ….और मुख्य बात ये है कि तुम ही उन्हें पति नही मानती वो भी तुम्हें अपनी पत्नी मानते हैं …इसलिए मैंने तुम्हें सिद्धा कहा । गौर दासी ने सिर झुका लिया था उसे नयी नवेली दुल्हन की तरह शरम आरही थी मुख मण्डल उसका लाल हो गया था ।


वर्षों बाद ये पहली बार सजने जा रही हैं रूखे केशों में कभी तैल इसने लगाया नही ….आज केशों को धोया है ….लम्बे घने केश उसमें तैल लगाकर उसको बांधा ….फिर साड़ी लगाई ..लाल साड़ी ….गोरी गौर दासी लाल साड़ी में बहुत सुन्दर लग रही थी …..बड़ी बड़ी आँखों में कजरा लगाया है इसने ….गौर दासी ये सब अपने श्याम सुन्दर की प्रसन्नता के लिए कर रही है …आज इसकी यही साधना है …बालों में गजरा भी लगाया है और अपने मीत के आगे दीया जलाकर बैठ गयी है …..

वे आये …पीछे से आकर उन्होंने आँखें बन्दकर कर दी हैं गौर दासी की ….रोमांच हो उठा उसे ….गौर दासी ने उन्मत्त हो मुड़कर अपने बाहों में कान्त श्याम सुन्दर को भर लिया । अपने सनातन प्रियतम के साथ सुरत केलि करने की आज ठान ही ली इस महासौभाग्यशालिनी गौर दासी ने ।

शेष कल –

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