!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !!
( एकोनविंशति अध्याय: )
गतांक से आगे –
आश्विन मास, पितृपक्ष का समय है ….मुझे धर्म के कार्य में जाना है …गया तीर्थ जाकर पितृश्राद्ध करना है …हे प्रिये! तुम मेरी धर्मपत्नी हो ….तुम्हें तो मुझे प्रसन्नता पूर्वक भेजना चाहिये । उठा लिया था अपने बाहों में और बड़े प्रेम से हृदय से लगाये अपनी सुकुमारी प्रिया को समझा रहे थे । प्रिया ! इतनी व्यथित हो जाओगी ….तो फिर मुझे दुःख होगा ना ….इसलिये अपने अश्रुओं को पोंछ लो …और मुझे प्रेमपूर्वक विदा दो …..ये कहते हुए स्वयं ने ही प्रिया के अश्रुओं को पोंछ दिया था । विष्णुप्रिया की हिचकियाँ बंध गयीं थीं ….उसको समझ में नही आरहा था कि वो अपने को कैसे समझाये ….उनके “प्राण” का कहना सत्य था ….धर्म के कार्य के लिए वो जा रहे थे ….पर ये हृदय इन सब बातों को नही समझता ….उसे तो बस प्रेमास्पद ही चाहिये । विष्णुप्रिया स्तब्ध सी होकर खड़ी है …अब वो रो भी नही सकती ….क्यों कि रोयेगी तो उसके प्रभु कहीं रिसाय गये तो फिर क्या होगा ? प्रिया के लिए तो यही सब कुछ हैं । फिर निमाई ने अपनी प्रिया को हृदय से लगाया …और कहा …”शीतकाल तक आजाऊँगा”। विष्णुप्रिया बस देखती रही ….ये गौरांग छवि अब कई दिनों तक दिखाई नही देगी ….औरों के लिये “दिन” हैं पर प्रिया के लिए तो “युग” कहिये । उसको रोना आरहा है ….बहुत रोना …हाँ एक बार तो प्रिया ने सोचा भी था कि …प्रभु से प्रार्थना करूँ एक बार और …कि “आप न जायें” ….शायद मान जायें । पर हिम्मत नही हुई । बाहर लोग खड़े हैं …इनके कुछ शिष्य हैं जो साथ जायेंगे ।
निमाई ने प्रिया के स्कन्ध में हाथ रखा और वो बाहर निकल आये । प्रिया ने दौड़ते हुए बाहर आकर देखा ….निमाई अपने शिष्यों के साथ निकल गये थे ..शचि देवि गंगा घाट तक पहुँचाने गयीं थीं ….विष्णुप्रिया ने देखा ….उसके प्रियतम दूर जा चुके हैं ….वो भागी हुई छत में गयी वहाँ से दिखाई देंगे …छत से जाकर उसने देखा ….जब दीखना बन्द हुए तो वो नीचे आई ….और अपनी शैया में जाकर लेट गयी ….घर में कोई था नही ….सुनने वाला भी कोई नही था ..शचि देवि पहुँचाने गयीं थीं निमाई को । तकिया को अपने मुँह में लगाकर जोर जोर से इसने रोना शुरू किया । विष्णुप्रिया की चीत्कार छूट रही थी …..ओह !
प्रिया !
किसी ने आवाज दी …अपने को सम्भालकर ….अश्रुओं को पोंछ कर …प्रिया जैसे ही बाहर आई ….सामने खड़ी है इसकी सखी कान्चना । पक्की सखी है …प्रिया के सुख में सुखी होती है और दुःख में दुखी ….हृदय से लगा लिया प्रिया ने अपनी सखी को …फिर तो दोनों ही रोने लगीं ….खूब रोईं । कुछ समय बाद कान्चना ने प्रिया को सम्भाला ….पर बिलख रही है ये तो ….कान्चना ने समझाते हुये कहा …..प्रिया ! अपने आपको सम्भालो , धर्म के कार्य में गये हैं तुम्हारे पति ….तुम्हें इस तरह बिलखना ठीक नही है …प्रिया ! हर दिन सुख नही है …हर दिन मिलन नही है …सुख आया है तो दुःख आयेगा …प्रिय से मिलन है तो वियोग होगा ही । इस बात को समझो …अपने आपको सम्भालो प्यारी !
कान्चना के समझाने पर प्रिया को कुछ आधार मिला ।
विरह हृदय के प्रेम को विकसित कर देता है ….प्रेम को प्रदीप्त कर समस्त को जलाकर राख कर देता है ….विरह एक साधना है …ये ऐसी साधना है जो बड़े बड़े योगियों को भी अतिशय दुर्लभ है …इस साधना को जो करता है उसे कुछ और करने की आवश्यकता ही नही पड़ती ।
विष्णुप्रिया की ये साधना यहाँ से शुरू होती है ।
वो अब भोजन बनाती …अपनी सासु माँ को खिलाती …सब कुछ समेटती …फिर एकान्त में बैठकर अपने प्राणप्रियतम का ध्यान करती । नही नही “ध्यान करती” ये कहना ठीक नही होगा …..क्यों की विरह में स्मरण-ध्यान करना नही पड़ता ….वो तो विरही का सहज होता है । आकाश की शून्यता में उसे निमाई दिखाई देते ….गंगा की उज्ज्वल धारा में गौरांग की अनुभूति इसे होती …बादलों की गम्भीर गर्जना में निमाई की ही गम्भीर वाणी का इसे अहसास होता । अपने केश विन्यास करते समय प्रिया को लगता मेरे “प्राण” आगये ! …..वो भागती द्वार की ओर ….पर कोई नही आया ।
“प्रिया! मैं शीतकाल तक आऊँगा” ….यही कहा था ।
माँ ! वे कब आयेंगे ? आज जैसे जैसे विष्णुप्रिया अपनी सासु माँ से पूछने लगी ।
प्रिया ! अभी तो समय है …..निमाई तो शीतकाल में आयेगा ना !
पर माँ ! मुझे तो कल से ही शीत का अनुभव हो रहा है । जाड़ा लग रहा है ।
शचि देवि अपनी भोली बहु के मुख से जब ये सुनती तो वो बिलख उठतीं …बेटी ! अभी कुछ दिन और हैं । माँ ! कितने दिन और ? अब शचि देवि क्या कहें ….बेटी ! पंचांग देखना पड़ेगा …प्रिया पंचांग भी ले आई …पन्द्रह दिन और हैं …शचिदेवि की बात सुनकर प्रिया फिर दुखी हो गयी …पन्द्रह दिन बहुत होते हैं । ये गिनती करती ….एक एक दिन का हिसाब रखती …कब आयेंगे उसके प्रियतम ! अब आयेंगे उसके प्रियतम । जी । पन्द्रह दिन जैसे जैसे काटे ….और अब ……
शेष कल –
