उद्धव गोपी संवाद:-
(भ्रमर गीत)
१९ एवं २०
जो हरि के गुन होहिं,वेद क्यों नेति बखाने।
निरगुन,सगुंन,आतमा कहि, उपनिषद जू गानें।।
वेद पुरारन खोजि कें, नहिं पायो गुन एक।
गुन हीं कें गुंन होइ जो,कहि अकास कहं टेक ।।
सुनों ब्रजनागरी।
भावार्थ:-
उधौ जी गोपियों से कह रहे हैं कि
जो हरि में गुंन होय तो वेद नेति नेति क्यों बखानें। निर्गुण सगुण का उपनिषद गुंन गान करत। वेद और पुराणों नें भी खोजा लेकिन एक भी गुंन नहीं पाया, हे ब्रजनागरी सुनो।
जो उन्ह कें गुंन नाहिं,और गुंन भए कहां तें।
बीज बिना तरू जमें, हमें तुम्ह कहौ कहां तें।।
वा गुन की परछाईं री,माया दरपन बीच।
गुंन तें गुंन न्यारे नहीं,अमल वारि ज्यौं कीच।।
सखा सुन स्याम के।।
गोपियाँ उद्धव से कह रही है कि यदि परमात्मा में कोई गुण नहीं है अर्थात वे निर्गुण है तो संसार में गुण, अवगुण कहाँ से आए । बीज़ के बीना फल नहीं आता।
