!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 39 !!
“कृष्णोहम्” – प्रेम में अद्वैतावस्था
भाग 2
नही नही ….सखी ललिता ! दोष तुम्हारा नही है …..दोष तो मेरा है ….तुम तो श्रीराधा रानी की सखियाँ हो ………..जैसे स्वामिनी होती हैं वैसी ही उनकी सखियाँ भी होती हैं …….तुम्हारी स्वामिनी …….वो तो सरल सहज करुणा की मृर्ति ……….वैसी ही तुम सभी हो …….पर दुष्टा तो मैं हूँ ………….इतना कहकर वो चन्द्रावली रोनें लगी थी ।
मैने ही उनसे कहा था मेरे पैर दवा दो …….ओह ! मेरा अहंकार कितनें चरम पर पहुँच गया था …..नन्द नन्दन को मैने अपनें पैर दवानें के लिए कहा ! अपना सिर पटकनें लगी थी चन्द्रावली ।
नही …..तुम अपनें आपको कष्ट क्यों दे रही हो…..अपराधिनी तो हम सब हैं…..वो तो “कमल नयन” सदैव हम सब को प्रेम ही देते हैं ….पर हम ?
नही ……मुझे मारो तुम सब लोग मिलकर……श्राप दो मुझ पापिन को ।
चन्द्रावली फिर चीत्कार उठी थी ।
पर ऐसे रोनें बिलखनें से क्या होगा ……….चलो ! उनको ढूढ़ें …..वो किधर गए इस रात्रि में ……………..ललिता सखी नें ही सम्भाला सबको ….और आगे चलीं श्याम सुन्दर को खोजते हुए ।
हे पीपल ! तू तो बता कहाँ गए हमारे श्याम सुन्दर !
हे वट, पाकर ! तू तो अवश्य जानता होगा …..क्या इधर से गए हैं हमारे प्राणधन ?
अरे ! कदम्ब ! तुझ से तो बड़ा प्रेम करते हैं श्याम सुन्दर ! बता ना ! किधर गए हमारे प्राण नाथ !
पर इन वृक्षों नें भी कोई उत्तर नही दिया……..तब गोपियाँ और उन्मादिनी हो उठीं…………
तुम लोग इतनें बड़े हो …….अपना सिर ऊपर की ओर करके खड़े हो ………मत करो अहंकार पीपल ! कि लोग तुम्हे पूजते हैं कहकर अहंकार दिखा रहे हो ……मत अहंकार में फंसो ………..देखो ! हमें भी अहंकार हो गया था ……..हम भी अपनें आपको बड़ा समझ बैठी थीं ……कृष्ण के हृदय की रमणी ……………कृष्ण की प्रेयसि …….हमारी हर बात कृष्ण मानता है ……….क्या क्या नही समझ बैठी थीं …..पर क्या हुआ ? देखो ! आज छोड़ दिया हमें हमारे कृष्ण नें ……….तोड़ दिया हमारा अहंकार ……………ऐसे ही तुम भी ज्यादा अहंकार न दिखाओ …………बता दो ……कहाँ है हमारा प्यारा !
दूसरी गोपी तुरन्त बोल उठी ………
अरे वट वृक्ष !….तू तो बता कहाँ हैं हमारे प्राण…….बता ना !
छोड़ ! किससे पूछ रही है ………….इस वट नें देखा भी होगा तो इसको याद रहेगा ? देख ! कितना बूढ़ा हो चला है ये ……..इसकी लम्बी लम्बी दाढ़ी तो देख …………छोड़ इन सबको ।
तभी एक गोपी भागी आगे …………..अरे ! कहाँ भग रही हो ?
पीछे की गोपियों नें पूछा ।
ए मल्लिका ? ए मालती ! ए गुलाब !
बता ना हमारे श्याम सुन्दर कहाँ गए ?
क्या इसे पता होगा ? दूसरी गोपी नें उससे पूछा ।
क्यों नही पता होगा इसे ………..इन फूलों को जहाँ हमारे प्रियतम देखते हैं ……..छूते जरूर है ……….इन्हें भी छूआ होगा ……………
क्या इन्हें भी छूआ होगा हमारे प्रिय नें ?
सब गोपियों दौड़ीं …………फूलों को चूमनें लगीं ………..फूलों को अपनें देह से लगानें लगीं ………इन फूलों को छूआ है हमारे कृष्ण नें ।
तुम्हे कैसे मालुम कि कृष्ण नें इन फूलों को छूआ होगा ?
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –


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