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विरही- गोपी- उध्धव छे- संवाद-२🦚
🌹 भ्रमर -गीत🌹
🌺। भ्रभरगीत महात्म्य-२🌺
🌻 गोस्वामी श्री हरिरायचरणजी आज्ञा करते “गोपिका गुरुवः भोक्ताः”
👉 गोपियाँ पुष्टिजनों की गुरु है, पुष्टिभक्ति निष्काम, अहैतुकी, निःस्वार्थ है वैष्णवों को सिर्फ श्रीप्रभु के सुख की ही चाह होती है।
🌺 (नवधा भक्ति) संयोगात्मक – वियोगात्मक प्रेम जिसमें आतुरता प्रभु तरस, प्यास, व्याकुलता बिना प्रभु भक्ति प्राप्त नहीं होती है।
भ्रमरगीत में ज्ञान और भक्ति की तुलना की गई है। ज्ञानी भक्त परोक्ष आत्मचिंतन से आनंद पाता है। परन्तु प्रेमी भक्ति भक्त को प्रभु प्रत्यक्ष मिले तो ही आनंद मिलता है।
🌻 भ्रमरगीत, दशम स्कंध में विरह विशेष काव्य है। जिसमें भक्ति, श्रृंगार, करुणा, वियोग, निर्गुण, सगुण प्रभावी उपासना समर एवं ज्ञान भक्ति का भंडार सागर है।
👉 अनेकों भक्ति भक्त कवियों ने भी भ्रमरगीत पर रचनाएं लिखी है।
भ्रमर माने उड़ने वाला छोटा सा जीव, जो भिनभिनाती आवाज के साथ उड़ते हुए पुष्पों पर इधर-उधर मंडरा कर पुष्पों का रसपान करता है। भँवरे को मधुम, षट्पद, चंचरीक, सारंग, भौरा नाम से भी जानते हैं।
प्रायः इसका रंग श्याम, मुख पीत होता है। श्री उद्धवजीने भी श्याम वर्ण, योगी पीत प्रसादी वस्त्र धारण किया है। श्रीकृष्ण श्याम वर्ण एवं पीतांबर धारण करते हैं अर्थात भ्रमरगीत के तीन मुख्य नायक श्रीकृष्ण, उद्धव एवं भंवरा !
🌸 श्री उद्धवजीने गोपियों द्वारा गाये गीतों को लक्ष में रख उन्हें भ्रमरगीत नाम दिया। श्रीकृष्ण वेणुनाद से गोपीजनों का मन मोहते वन में गौचारण समय वादन करते हैं। वैसे ही भंवरा फूलों पर गुंजन करते सभी का मन मोह पुष्परस चूस-चूस कर उडता रहता है। इसीलिये ये तीनों भ्रमरगीत नायक है।
भ्रम-भ्रमणा में जो रहते हैं, उसे भ्रमरगीत कहते हैं। जो विरही गोपियाँ श्रीकृष्ण को उलाहना देते गीत गाकर कह रही उसे उद्धव ऐसे समझे की गोपियाँ श्रीकृष्ण को कह रही है? अर्थात “भ्रम में डाले या भ्रम से बाहर निकाले उसे भ्रमरगीत कहा गया” जैसे जल भंवर में फसें व्यक्ति को भंवर से बहार निकलना मुश्किल कठिन होता है। उसी तरह उद्धव का स्वयं ज्ञान और योग भ्रम में होने से श्रीकृष्ण ने संदेश वाहक बना गोकुल गोपियों के पास भेजा। जिसे गोपियों ने ज्ञान रूपी भक्ति में से बाहर निकाला और उद्धव ने गोपियों को अपना गुरु माना है। उद्धव का उद्धार किया। पुष्टिमार्ग में आचार्य चरणों ने गोपीजनों को पुष्टिमार्ग का गुरु नवाजा है। उद्धव ज्ञानी को प्रेम भक्त बनाया।
🙏 “संयोग में प्रेम कम” किन्तु वियोग में प्रेमपुष्ट एकाग्र, तन्मयता होती है!
भ्रमरगीत हमें ज्ञान पर भक्ति की महिमा दिखाते हैं।
इसीलिए
भ्रमरगीत में गोपियाँ श्रीकृष्ण को निष्ठुर, चालबाज, छलिया, कपटी संबोधन करते विरह प्रेम भावरस हो आध्यात्मिक विचारों से भरपूर भक्तों को प्रभावित करने वाले गीतों को भ्रमरगीत कहते हैं।
🌺 प्रभु श्रीकृष्ण द्वारा उद्धव को गोकुल भेजना भी एक लीला है। गोपियों को विशिष्ट योग देने ब्रज पधारे। यह विरह जैसा योग का विशेष दान गोपियों को किया। इस विरह वियोग में डूबी गोपियाँ प्रेम की ध्वजा ही है जो श्याम श्रीकृष्ण में रंगी है जिन पर दूसरा रंग नहीं चढने वाला। इस प्रेम रंग में रंगने के लिए ज्ञानी उद्धव को ब्रज में भेजा ?
भ्रमरगीत में गोपियाँ संबोधन कर समझाती है। *प्रेमाशक्ति श्रीकृष्ण में है और कटाक्ष कृष्ण पर करते जो विरह व्यथा व्यक्त कर गीत गाती है, वही भ्रमरगीत है। उद्धव का ज्ञान से बड़ा प्रेम होता है, भ्रम दूर हुआ। सम्पूर्ण भ्रमरगीत प्रेमभाव रसमय आध्यात्मिक विचारों से भरा पूरा है। इसी कारण भावमय पुष्टि भक्त भ्रमर गीतों को श्रवण कर भक्ति में डूब प्रभावित होते हैं। भक्ति सत्संग कीर्तन नृत्य द्वारा श्रवण कर विश्वास को दृढ करती है।🌻 *विरही गोपी-४*
🌻क्रिष्णा🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷
