!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 44 !!-महारास भाग 3 : Niru Ashra

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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 44 !!

महारास
भाग 3

मध्य में रसशेखर श्याम सुन्दर ……..अपनी “श्री जी” के साथ ठुमुक रहे हैं ……इतना ही नही …….बाँसुरी भी बजा रहे हैं …….और गा भी रहे हैं …….श्याम सुन्दर और उनकी श्रीराधारानी अन्य गोपियों की ये मण्डली इतनी सुन्दर लग रही थी कि देवों को भी देह सुध न रही ।

अप्सरायें उनकी चोटी ढीली हो गयी ………..उनमें से फूल गिरनें लगे ………साड़ी जो पहनी हुयी थीं………वो साड़ी खिसकनें लगी ।

उन सबका देह काँपने लगा था ।

इधर वृन्दावन में चाँदनी रात है ………….पूर्णिमा है, चन्द्रमा अपनी पूर्णता में खिला है ….यमुना का सुन्दर पुलिन है ………….

रासेश्वर नें सप्तम स्वर उठाया ………..और वह गूंजता चला गया ……सारे ब्रह्माण्डों को चीरता वह स्वर ब्रह्म लोक से भी आगे निकल गया था ।

गगन में सब स्तब्ध हो गए थे ……गायन अपनें चरम पर था ………सब नाच रही थीं गोपियाँ ……और द्रुत गति से नाच रही थीं …… साथ में गायन भी चल रहा था …………….

पर अब गायन को रोक दिया गया …….क्यों की ताल की गति तीव्रतम हो रही थी ……..अब बस नृत्य हो रहा है ……….बड़ी तेजी से सब नाच रहे हैं ………तीव्रता से नाचनें के कारण …….गोपियों के केश खुल गए हैं ………..बेणी से फूल झर रहे हैं……..तीव्रता से नाचनें के कारण गोपियों के वस्त्र भी इधर उधर हो रहे हैं……….उन गोपियों के कुण्डल उनके कपोल को छू रहे हैं …………गले की माला टूट कर इधर उधर बिखर गयी है …….अरुण मुख हो गया है सबका ।

हे वज्रनाभ ! इस महारास में सम्पूर्ण सृष्टि का कण कण अस्थिर हो उठा था ……..सब अणु अनन्त काल तक इस नृत्य वेग से नर्तन करते रहेंगें ………..इतना ही नही वायु ही क्यों ….ग्रहों की गति भी थकित हो गयी थी …….केवल कालिन्दी में ही उत्ताल तरंगें उठ रही थीं ।

यमुना का प्रवाह उलटा हो गया था ………..और अनन्त अनन्त कमलों को, लाकर किनारे में ढ़ेर लगा दिया था यमुना नें ।

चीत्कार कर उठीं थीं देव पत्नियाँ ………..ऋषि अंतरिक्ष से …….श्रीकृष्ण चन्द्र जू की जय जय ……..आल्हादिनी श्रीराधिका रानी की जय जय …….समस्त सखी वृन्द की ….जय जय ……श्रीधाम वृन्दावन की ….जय जय …………….

नृत्य अब बन्द हुआ !
…गोपियों नें प्रगाढ़ आलिंगन किया अपनें प्रिय को ।

एक गोपी नें आगे बढ़कर कृष्ण को चूम लिया ।

एक गोपी नें आगे बढ़कर अपनें द्वारा चर्वित पान कृष्ण के मुख में स्वयं मुख से ही दे दिया……..एक गोपी अधर रस का पान कर रही है ।

एक गोपी बस निहार रही है अपनें प्राणेश कृष्ण को ।

रासेश्वर नें अपनी रासेश्वरी की अलकें सुलझाईं ………उनके कपोल को पोंछे अपनें पटुके से ……फिर एक प्रगाढ़ आलिंगन किया ।

हे वज्रनाभ ! गोपियों से अब श्याम सुन्दर नें कहा ……..तुम लोग अपनें अपनें घर जाओ ……………

पर हमारे घर वाले ? गोपियों नें मना किया ।

नही ……उन्हें कुछ पता नही है …………उन्हें लग रहा है तुम उन्हीं के पास हो………इसलिये निश्चिन्त होकर तुम जाओ ……..

गोपियों को बड़े प्रेम से कृष्ण नें कहा …………गोपियाँ अपलक नेत्रों से देखती रहीं अपनें प्यारे को……..जानें की कहाँ इच्छा थी इनकी ।

ये महारास है वज्रनाभ ! ये दिव्य मधुरातिमधुर महारास है ।

ये योग, ज्ञान, कर्म ,और भक्ति से भी आगे की स्थिति है – महारास ।

ये प्रेम का एक अलग ही छलकता हुआ रूप है……….इसको वही जान या समझ पाता है ……जिसके ऊपर रासेश्वर या रासेश्वरी की कृपा हो…….बाकी तो नैतिकता के छूछे माप दण्ड में ही उलझे रहते हैं ।

इतना कहकर महर्षि उसी रस के,
महारास के अगाध सिन्धु में फिर डूब गए ।

शेष चरित्र कल ……🙏

🍃🌸 राधे राधे🌸🍃

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