!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 70 !!
वो ममता की मारी – मैया यशोदा
भाग 1
हे वज्रनाभ ! प्रेम के अनेक रूप है …….जैसे ईश्वर के अनेक रूप होते हैं ऐसे ही प्रेम के भी अनेक रूप हैं ।
प्रेमरस का एक रूप ये है – वात्सल्य ।
माँ का हृदय जब तड़फता है अपनें पुत्र के लिये ………..महर्षि नें अपनी बात पूरी नही की …………पता नही क्यों उन्हें आजकल “कथा” में ही प्रवेश करनें की लगी रहती है …………क्यों की ये सब लीलाएं महर्षि के हृदय में चल रही हैं …..महर्षि भाव सिन्धु में डूबे हुए हैं ।
उद्धव का रथ बृजपति नन्द के द्वार पर ही जाकर रुका था ।
खिरक से लौट रहे थे बृजपति …………उन्होंने रथ देखा ……..मुख मण्डल थोडा प्रसन्न हुआ था उन्हें लगा – कहीं ?
आँखों से कम दिखाई पड़नें लगा है बृजपति को …..वृद्ध तो इतनें नही हैं ……..पर कृष्ण के वियोग नें वृद्धावस्था को शीघ्र ही बुला दिया ।
उद्धव का रँग भी सांवला ही है ………..वस्त्र भी उन्हीं के पहनें हैं ……काँधे में काली कमरिया है …………….
बृजपति पास में आये ………और पास ……बड़े ध्यान से उद्धव के मुख को देखा था …….सायंकाल भी तो होनें को आया है ।
उद्धव पहचान गए थे ……………..तुरन्त रथ से उतरकर …….
“देवभाग का पुत्र बृहस्पति का शिष्य यादवों का महामन्त्री मैं उद्धव”
इतना कहते हुए बृजपति के चरणों में अपनें मस्तक को रख दिया था ।
पर कानों से भी अब कम सुननें लगे हैं……उठाकर अपनें गले लगाते हुये …….कौन मेरा श्याम ? गदगद् कन्ठ से बोले थे ।
नही …….मैं कृष्ण का सन्देश वाहक उद्धव……उद्धव जोर से बोले ।
कोई बात नही, तुम भी मेरे श्याम जैसे ही हो……
नेत्र आँसुओं से भर गए थे ।
उद्धव का कर बड़े प्रेम से पकड़कर भवन भीतर ले गए थे नन्द जी ।
यशोदा ! यशोदा ! देखो ….कन्हाई का मित्र आया है ।
बृजपति नें पुकारा था यशोदा मैया को ……..पर उस तरफ से कोई उत्तर नही आया ………..तब नन्द जी बोले –
तुम जाओ उद्धव ! …….भीतर जाओ ………कन्हाई की मैया बैठी है …..जाओ ! उसके लाला के बारे में बता दो उसे…….बेचारी यशोदा ! ……नन्द जी के नेत्र अब अच्छे से बहनें लगे थे ।
मैं स्नान करके सन्ध्या कर लेता हूँ ……..तब तक तुम यशोदा से बातें कर लो ……….उसे बहुत कुछ जानना है अपनें लाल के बारे में …….तुम्हे बताएगी भी वो ……सुन लेना उद्धव ! नन्द जी नें इतना कहकर उद्धव को भेज दिया था – जिस तरफ मैया यशोदा थीं ।
क्रमशः …
शेष चरित्र कल …….
