!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!
( सखीत्व ही साध्य है – “हौं बलि जाऊँ नागरी श्याम”)
गतांक से आगे –
रसोपासक को युगल सेवा में ही सुख मिलता है …सेवा से कुछ पाना इनका लक्ष्य नही है …अपितु सेवा से सेव्य को सुख पहुँचाना ही इनका लक्ष्य है । अपना सुख है ही नही …उनका सुख , सिर्फ उनका सुख । और उनके सुख में ही इनको अपार सुख मिलने लग जाता है । स्मरण रहे साधकों ! जिस दिन अपना सुख उनके सुख में मिल जाये तब समझना सखीत्व की प्राप्ति हो गयी ।
और ये भी है की सखीत्व की प्राप्ति ही साधक के लिए साध्य है ।
निष्कामता की चर्चा शास्त्रों में भरी पड़ी है …निष्काम कर्म , निष्काम योग , निष्काम भक्ति आदि आदि …निष्कामता का माहात्म्य बहुत गाया है शास्त्रों ने ….पर उस निष्काम के लिए कोई उदाहरण दिया ? हाँ। दिया तो है ….नारद जी महाराज ने । गोपियों का । कि निष्काम हैं गोपी और भक्ति होनी चाहिए गोपियों जैसी । पर रसोपासना कहती है – गोपियों के मन ये भावना तो है कि हम कन्हैया को चूमें , हम उन्हें हृदय से लगावें …किन्तु इन सखियों के मन में तो इतनी भावना भी नही है की वो हमें देखें भी ..इनके मन में भावना है ये एक दूसरे को ही देखें और आनन्द में रहें । हम तो इनकी खुशी में ही खुश हैं जी ! इस उपासना का तत्व बड़ा ही गम्भीर है …ये सामान्य नही है ….इस उपासना को वही समझ सकता है …जिसने इस श्रीवृन्दावन को समझा है …यहाँ के रस को जाना है …..
चलिए “सखीत्व” को समझते हैं …श्रीहित हरिवंश महाप्रभु के शब्दों में –
हे राधे ! यदि हमें आप रसमूर्ति की ….एकान्त दास्य सेवा प्राप्त हो जाए …तो फिर हमें धर्म से , देवताओं से , ब्रह्मा शंकर आदि से या फिर स्वयं श्याम सुन्दर से भी क्या प्रयोजन !
हे राधे ! श्याम सुन्दर भी हमें इसलिए प्यारे लगते हैं क्यों की वो आपके प्यारे हैं ।
“तत्सुख सुखित्वम्”…..इसी भाव का साक्षात् रूप हैं सखियाँ । इसलिए आशीर्वाद देती हैं युगल सरकार को , इतनी गदगद हो उठती हैं …कि आशीष के लिए ही इनके हाथ उठते हैं ।
आज का ये पद …आशीर्वादात्मक है । इसमें सखियों ने आशीष दिया है ।
यही है सखीत्व ।
बाबा ने आनंदित होकर आज का पद स्वयं गाया । बाबा बोले ….ये पद मुझे बहुत प्रिय है ….मैं आशीष दूँगा । राधा बाग में सब रसिक जन आह्लादित हो उठे ….वाद्य बज उठे …..आज तो वीणा भी बाबा ने लिया । बाबा ने छप्पनवाँ पद गाया । बाबा को राग रागिनी का अच्छा ज्ञान है ….ध्रुपद और ख़्याल का इनको गहरा ज्ञान है । राग – गौड़ मल्हार । बडे ही गम्भीर स्वर में मल्हार को गाया बाबा ने । जब बाबा गा रहे थे ….सब झूम उठे थे । उनकी गायकी अद्भुत थी ।
हौं बलि जाऊँ नागरी श्याम ।
ऐसे हीं रंग करौं निशि बासर , वृन्दा कुटी अभिराम ।।
हास विलास सुरत रस सींचन , पशुपति दग्ध जिवावत काम ।
श्रीहित हरिवंश लोल लोचन अलि , करहु न सफल सकल सुख धाम ।56 ।
हौं बलि जाऊँ नागरी श्याम ………..
इस पद का गायन बाबा ने एक घण्टे तक किया ….गायन आनन्द में डूब कर रहे थे ।
सबको बड़ा ही सुख मिल रहा था ….सब अपने आपको भी भूल गए थे ।
अब बाबा ध्यान करायेंगे । वीणा गौरांगी ने लेकर रख दी थी । सब लोगों ने अपने अपने नेत्र बन्द कर लिये थे । और अब ध्यान ।
!! ध्यान !!
उस वर्षा में दोनों युगल भींज रहे हैं ……बूँदें मन्द मन्द पड़ रही हैं । श्रीवन में हरीतिमा छा गयी है …कोयल बोल रही है ….पपीहा पुकार उठा है ….मोर नाच रहे हैं । युगल को एक दूसरे के स्पर्श से रोमांच हो रहा है । अब अधिकाधिक निकट आने का लोभ प्रकट होता जा रहा है ….कपोल को चूम रहे हैं , फिर अधरों के रस का पान करने लगे हैं ….फिर यह दूसरे में खो रहे हैं ….पूरा श्रीवन अति प्रेम रस के कारण उद्दीप्त हो चला है । वर्षा, उसके ऊपर शीतल हवा चलने के बाद भी दोनों रति के बढ़ जाने से तप्त हो रहे हैं । दोनों का मुखमण्डल लालिमा से भर गया ….इस समय सब बाधक ही हैं ….प्रिया जी के आभूषण सबसे बड़े बाधक हैं ….श्याम सुन्दर उन आभूषणों को उतार देते हैं …बिना आभूषण के जो सहज सौन्दर्य प्रिया जी का प्रकट हुआ वो तो और अद्भुत था । प्यारे प्रिया जी को अपलक देखते जा रहे हैं ….उनके पलक भी गिरने बन्द हो गए हैं …नेत्रों से अश्रु बहने लगे ….प्रिया ने समझ लिया कि अपलक मुझे देखने के कारण इनके अश्रु बह रहे हैं ….तो श्याम सुन्दर के नेत्रों को बन्द कर दिया अपने करों से । अब तो स्थिति और गम्भीर हो गयी । पहले तो नयनों से ही निहार रहे थे पर अब तो वो प्रिया का रूप-सौन्दर्य हृदय में चला गया …हृदय में रम गया । अब तो वहीं हृदय में ही विहार हो रहा है ….श्याम सुन्दर बड़े ही प्रसन्न हो रहे हैं …हाँ , ये प्यारी ! आपने बहुत अच्छा किया …बाहर सखियाँ हैं …चारों ओर से सखियाँ हमें देख रही थीं …इसलिये मिलन सम्भव नही होता । पर हृदय में कोई नही देख रहा …ये स्थान बहुत सुन्दर है और एकान्त भी है …यहाँ हमें कोई देख नही सकता ।
श्याम सुन्दर अपने हृदय भवन में विराजमान कराकर अपनी प्यारी से रति केलि करने लगे ।
पर ये सखी हैं …..इनकी पहुँच भी बहुत गहरी है । युगल के हृदय में क्या चल रहा है …ये युगल के श्रीअंग में हो रहे रोमांच से ही समझ रही हैं । ये श्रीअंग के सिहरन से ही समझ रही हैं कि प्यारे और प्यारी नेत्रों को मूँद कर भावना में ही उस रस केलि का सुख ले रहे हैं । जैसे – किसी योगी की समाधि लग जाती है …और वो स्व आत्म रति में लग जाता है …ऐसे ही ये भी आत्मरति में ही लीन हो गए हैं एक योगी की भाँति । श्रीजी इनकी आत्मा ही तो हैं ।
पर हित सखी हंसी …अन्य सखियों ने पूछा …क्यों हंस रही हो ?
तब हित ने उत्तर दिया …इनके श्रीअंगों को देखो …कैसे कंपित हो रहे हैं । इनके बन्द नयनों के कोरों को देखो वहाँ से अति प्रेम के कारण अश्रु बह रहे हैं ….ये प्रिया जी को आलिंगन करके अपने हृदय में ही लीला विलास कर रहे हैं । हे सखी ! मैं क्या कहूँ ? मैं स्वयं इनकी लीला देखकर देह भान भूल गयी हूँ ….मैं क्या कहूँ ? मैं तो यही कहती हूँ कि ये निस्संकोच ऐसे ही विहार करते रहें …ये कहते हुए भाव के अश्रु हित सखी भी बहाने लगी थी ।
हित सखी को भाव में डूबा देख सबने अपने अपने नेत्रों को मूँद लिये …और सब युगल किशोर के हृदय देश में चली गयीं …जहां ये रति केलि कर रहे थे ।
जय हो ! जय हो ! हे नागरी नागर !
आपकी रति केलि की कुशलता सच में अद्भुत है ।
हे युगल वर ! आप इस श्रीवृन्दावन के सुन्दर कुंजों में इसी प्रकार आनन्द करते रहो ।
हित सखी आनन्द में डूब कर बोल रही है …उसके नेत्र बन्द हैं ….उसे रोमांच हो रहा है ।
अपने हास परिहास से भगवान शंकर के द्वारा मारे गये कामदेव को फिर जीवित करते हुए रस केलि करो , रस केलि में उन्मत्त हो जाओ ।
हे सब सुख के धाम ! हम सखियों के नेत्र आपको इसी तरह विहार में रत देखना चाहती हैं …इसलिये आप इस विहार को और प्रकट करो । हे सुख निधान युगलवर ! आपको हम देख रही हैं ….आपके मुखमण्डल में आनन्द की तरंगे दिखाई दे रही हैं ….बहुत सुंदर ! बस हम यही चाहती हैं कि आपका ये विहार कभी न टूटे ! प्यारे ! इसी तरह सुखी रहो ! हे प्यारी ! तुम भी अपने प्रीतम में खोई रहो । हित सखी अपने हृदय में हाथ रखके बोलती है …..तुम दोनों ही एक दूसरे में मगन रहो । ये कहते हुए हित सखी आशीष के लिए अपने दोनों हाथों को उठाती है ….और फिर फिर कहती है …..इसी तरह आनन्द में डूबे रहो । यही शब्द सब सखियाँ भी अपने हाथों को उठाकर दोहराती हैं ……पर युगल अब एक ही होने लगे थे । ये दिव्यता थी । ये विलक्षणता थी इस दिव्य प्रेम की । अब एक हो गये थे ।
पागलबाबा कहते हैं – अपना सुख नही प्रीतम का सुख जब अपना सुख बने तब समझना सखीत्व हमारे अन्दर प्रकट हो रहा है । यही आवश्यक है इस रसोपासना के लिए ।
इसके बाद गौरांगी इसी पद को दोहराती है …गाती है ।
“हौं बलि जाऊँ नागरी श्याम”
आगे की चर्चा कल –
