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November 21, 2024 1:06 pm

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!! उद्धव प्रसंग !!-{ कृष्ण के पिता नन्द जी का अद्भुत वात्सल्य }भाग-8 : Niru Ashra

!! उद्धव प्रसंग !!-{ कृष्ण के पिता नन्द जी का अद्भुत वात्सल्य }भाग-8 : Niru Ashra

!! उद्धव प्रसंग !!

{ कृष्ण के पिता नन्द जी का अद्भुत वात्सल्य }
भाग-8

अपि स्मरति नः कृष्णो मातरं सुहृदः सखिन् ।
(श्रीमद्भागवत)

लम्बी सफेद दाढ़ी… गठीला शरीर… हाथ में एक बड़ी-सी लाठी लिए हुए… सिर में पीली पगड़ी बाँधे…मस्तक में पीला चन्दन ।

यही तो हैं कृष्ण के पिता…नही नही… पिता तो वसुदेव हैं… ये हैं कृष्ण के “बाबा”… हाँ… पिता वसुदेव से भी वात्सल्य में बड़े – बाबा ! इनकी गोद में बैठ कर कृष्ण इनकी दाढ़ी से खूब खेलता रहता था… ये हैं महामना नन्दराज ।

हाँ उद्धव ! इनके समान कौन दयालु और कृपालु होगा… इस बृज मण्डल के मुखिया जी हैं ये… ।

उद्धव के सामने श्री नन्द बाबा जब पधारे… तब मनसुख ने उनका परिचय दिया ।

उनके साथ दो हृष्ट पुष्ट ग्वाले थे…।

यशोदा ! यशोदा !

दो बार आवाज लगाई थी महल में प्रवेश करते ही नन्दराय ने ।

बाबरी सी मैया… उठी… हाँ ..हाँ… आप आगये ?

हाँ…मैं आगया…तुमने माखन तो निकाला नही होगा… ?

यशोदा इतना ही बोलीं… मैंने दासियों से कहा था ।

कोई बात नही… वो सुबला का पति माखन निकाल कर ले आया था… नन्द महाराज ने सहजता से कहा ।

यहाँ रख दो माखन !…साथ में आये जो दो ग्वाले थे उनको नन्द जी ने माखन रख देने के लिये कहा ।

माखन रख कर वो लोग चले गए ।

यशोदा ने जल रख दिया था…नन्द राय ने पञ्च स्नान किया ।

अधोवस्त्र बदले… पीली रेशमी धोती पहन कर अपने पूजा घर में प्रवेश किया नन्द महाराज ने ।

उद्धव और मनसुख बगल में खड़े हो कर देख रहे हैं ।

यशोदा भी हाथ पैर धोकर आगयीं… और खड़ी रहीं… जब तक नन्दराय जी ने पूजा पूर्ण नही किया ।


चतुर्भुज नारायण का सुंदर विग्रह है… नन्द बाबा के पूजा गृह में ।

और एक छोटे से शालिग्राम भगवान भी हैं…

दही, दूध, शहद, घी, शक्कर… पंचामृत से स्नान कराने लगे थे… नन्द बाबा…।

मुँह में साड़ी का पल्लू डाले यशोदा हँस पड़ीं… नन्द जी ने यशोदा की ओर देखा… वो भी मुस्कुराये ।

कैसा ऊधम मचाता था ना कन्हैया ? नन्दराय ने इतना ही कहा ।

हँसी बन्द हो गयी थी अब… यशोदा की…

अब तो आँसू बरसने लगे थे… ।

नन्द राय ने यशोदा की ओर देखा… उनका हृदय भी चीत्कार कर उठा… कन्हैया !


अरे ! शालिग्राम भगवान कहाँ हैं ?

चारों ओर देखा… गायब !

कहाँ गए शालिग्राम ?

अभी तो मैंने पंचामृत से स्नान कराया था… चन्दन लगाया… फिर भोग लगा कर… ध्यान ही तो किया था, आँखें बन्द करके ।

इतनी देर में कौन ले गया… शालिग्राम को ?

नन्द महाराज के कुछ समझ में नही आरहा ।

बगल में बैठे हैं… 5 वर्ष के कन्हैया ।

और वो भी आँखें बन्द करके… ध्यान की मुद्रा में ।

कहीं इसने तो कुछ गड़बड़ नही की ! नन्द जी सोचते हैं ।

नही… ये क्या करेगा शालिग्राम जी का ।

पर गए कहाँ शालिग्राम जी ?

नन्द जी ने फिर अपने बगल में बैठे कन्हैया को देखा…

जब ध्यान से देखा तो… कन्हैया की एक तरफ की गाल फूल रही थी ।

कन्हैया ! ओ कन्हैया !

एक आँख खोली थी उस नटखट ने…और इशारे में ही पूछा था – क्या है ?

शालिग्राम जी को देखा क्या ? नन्द जी ने सहजता से पूछा ।

हाथ के इशारे से ही कह दिया… नही देखा ।

पर तू बोलता क्यों नही है ? नन्द जी ने फिर पूछा ।

ध्यान कर रहा हूँ… भगवान का भजन कर रहा हूँ… ये भी इशारे में ही बोल दिया ।

पर तेरी एक गाल क्यों फूल रही है ?

इसका कुछ उत्तर नही दिया… कृष्ण ने ।

चल मुँह खोल ! नन्द बाबा ने कहा ।

पर नही… कृष्ण मुँह खोलने को तैयार नही हैं ।

धीरे से गाल में चपत लगाई नन्द बाबा ने… उछलते हुए शालिग्राम जी सिंहासन में विराजमान हो गए ।

कान पकड़ लिये थे नन्द बाबा ने… क्यों रे ! तूने शालिग्राम भगवान को मुँह में डाल लिया !

बाबा ! आप इतने मीठे मीठे चीजों से नहला रहे थे… शालिग्राम को… शहद, दूध, दही, घी, शक्कर… ।

तो बाबा ! मैंने सोचा… ये स्वयं कितना मीठा होगा ना ?

इसलिये मैंने मुँह में रख लिया……

बाबा हँसते हुए पीटने के लिए दौड़े… कन्हैया भागते हुए अपनी मैया यशोदा की गोद में चढ़ गए थे ।


दूध दही घी शहद शक्कर… इन सबसे स्नान कराते हुए… आज रो गए नन्द महाराज ।

अपने आँसू पोंछते जा रहे हैं… और स्नान कराते जा रहे हैं ।

भोग लगाया… फिर आरती की…थोड़ी देर ध्यान किया…

फिर ध्यान से उठते हुये बोले… पता नही आज कल ध्यान में मन ही नही लगता… बस वही कृष्ण आँखों के सामने नाचता हुआ खेलता हुआ दिखाई देता है यशोदा !

“त्वमेव माता च पिता त्वमेव”

स्तुति बोली नन्द महाराज ने… इस स्तुति को कितने प्यार से बोलता था कृष्ण… फिर मेरे पैर छूता था… ये कहते भावुक हो गए थे ।

तभी उद्धव ने झुक कर नन्द बाबा के चरण छूए ।

अरे ! कौन हो भैया तुम ?

नन्द महराज उद्धव को बड़े ध्यान से देख रहे हैं… कौन हो तुम ?

ये कृष्ण का मित्र है… उद्धव नाम है इसका… बहुत अच्छा बालक है… यशोदा ने इतना ही कहा ।

किसके पुत्र हो ?

श्री मान् देवभाग… !

ओह ! वसुदेव के चचेरे भाई देवभाग ?

सिर झुकाकर उद्धव ने – हाँ… कहा ।

ओह !… बहुत सुंदर ।

तुम तो देवगुरु बृहस्पति के शिष्य हो ना ? नन्दराय सब जानते हैं ।

मथुरा में जाना आना लगा ही रहता था ना नन्दराय का ।

हाँ… मुझे मेरे मित्र वसुदेव ने एक बार बताया था कि… यदुवंश के भाग्य हैं कि पहली बार कोई मनुष्य देवगुरु बृहस्पति से शिक्षा लेने उन्हीं के लोक में जा रहा है… मुझे बताया था… ये कहते हुए यशोदा की ओर देखा नन्द ने ।

पर यशोदा कुछ और सुनना चाहती हैं ।

बहुत अच्छा हुआ तुम यहाँ आगये ?

अच्छा बताओ ना… मेरे मित्र वसुदेव कैसे हैं ? नन्द जी ने पूछा ।

ठीक हैं ।…और मेरी भाभी देवकी ? वो भी ठीक हैं ।

हाँ…अच्छा ! कंस के मरने से तुम यदुवंशियों को अच्छा हो गया ना !… नही तो तुम लोग बहुत दुःखी थे ।

हाँ… तात ! हम लोग बहुत दुःखी थे… उद्धव ने बताया ।

देखा यशोदा ! कंस के कारण सब दुःखी थे… अब ये मथुरा के लोग सब आनन्दित हैं । पर यशोदा के चेहरे में कोई भाव नही आरहा… ये सब सुनकर भी ।

उग्रसेन तो राजा बन गए…हाँ… ठीक ही हुआ…उन्हीं का अधिकार भी था… और किसी का अधिकार छीनना ये उचित भी नही है ।

वैसे मेरे मित्र वसुदेव ने…बहुत दुःख सहा है… लम्बे समय तक न जाने कितने कष्ट सहे…ओह !

और उद्धव ! एक बात बताऊँ… कोई भी पापी मरता है ना… तो उसका पाप ही उसे मारता है… कंस का पाप ही उसे ले डूबा ।

नन्द जी बोले जा रहे हैं… सज्जन को अगर कोई कष्ट दे… तो उसका फल भगवान देता ही है… दुर्जन का एक न एक दिन नाश होना ही है ।

और बताओ ? और सब कैसे हैं ? नन्द जी ने उद्धव से और भी जानकारी चाही ।

सुबुकने की आवाज सुनाई दी नन्द जी को…

यशोदा ! तुम रो रही हो ?

यशोदा ने रोते हुये कहा… आप को क्या लेना देना है वसुदेव से !

आपको क्या मतलब है उग्रसेन से ?

आपको क्या ख़ुशी है कि कंस मर गया !

अरे ! इस उद्धव से पूछो ना… कि हमारा कन्हैया कैसा है ?

इससे कुछ तो पूछो कि मेरा कन्हैया कितना खाता है… कब खाता है…कौन खिलाता है ?

वहाँ उसके साथ कौन सोता है ?… उसका ख्याल कौन रखता है ?

कुछ तो पूछो ।

यशोदा की बातें सुनकर… नन्द राय ने अपने हृदय के भाव व्यक्त किये ।

हम लोग पुरुष हैं ना… इसलिये दिखावे की जिंदगी जीते हैं ।

मन में कुछ है… पर पूछ कुछ और रहे हैं ।

व्यवहार को हम पुरुष लोग ज्यादा प्रधानता देते हैं ..उद्धव !

पर स्नेह व्यवहार से ऊँची वस्तु है… प्रेम इन सबसे परे है ।

उद्धव ! मुझे किसी ने बताया था कि… वसुदेव ने कृष्ण को गुरुकुल भेज दिया है… विद्याध्यन करने के लिये ।

और वह गुरुकुल भी कहीं पास में नही… सुदूर उज्जैन !

मेरा हृदय विदीर्ण हो गया था ये सुनकर… मैंने ये बात अपनी पत्नी यशोदा को भी नही बताई… क्यों कि इसका तो रो रोकर बुरा हाल ही हो जाता ।

ओह ! मेरे कोमल लाला को गुरुकुल में भेजा ! यशोदा को फिर उन्माद हो गया था ।

उद्धव ! तुम तो जानते ही हो… गुरुकुल में कितना कठोर अनुशासन होता है… भिक्षा मांग कर लानी पड़ती है ।

लकड़ियाँ काट कर लानी पड़ती हैं…

ओह ! मेरा दूध मुँहा कन्हैया… 11 वर्ष का भी पूरा नही हुआ है ।

उसे इतने कठोर तपश्चर्या के लिये उज्जैन भेजने की आवश्यकता क्या थी ?

नन्द राय के आँसू रुक ही नही रहे थे… बहते जा रहे हैं ।

पता है उद्धव ! हमें तो पहले इन अफवाहों पर विश्वास ही नही हुआ ।

कि मेरा मित्र वसुदेव इतना निष्ठुर और विचारहीन कैसे हो सकता है ?

फिर भी कृष्ण गुरुकुल गया, तो भी अब तो मथुरा लौट आया होगा ना ?

उद्धव ! सच सच बताओ…क्या वो नवजलधर श्याम अपनी मैया को याद करता है ?

उद्धव ! सच बताओ… मुझ बूढ़े बाबा की उसे याद आती है ?

अपने प्रिय सखाओं को वो याद करता है ?

गोपियां जो उसके लिये अभी भी माखन रख कर छुप जाती हैं… और ये सोचती रहती हैं कि आएगा… खायेगा… ।

क्या इन पगली गोपियों की, उसे याद आती है ?

गायों को वो कितना प्यार करता था…अपने हाथों से खिलाता था… दूध दुहता था… आज भी ये गौएँ अपने गोपाल को याद करके मथुरा की ओर देखते हुये अश्रु बहाती रहती हैं… क्या अपनी इन गायों की उसे याद आती है ?

इन वृन्दावन की लताओं से वह चिपका रहता था… यहाँ के कुञ्जों में वह अपना ज्यादा से ज्यादा समय व्यतीत करता था…

उद्धव ! क्या उसे यहाँ के कुञ्जों की याद आती हैं… ? यहाँ के वन… यहाँ की लताएँ… क्या उसके मन में हैं या वो भूल चुका है ?

नन्द महाराज बस बोले जा रहे हैं… ।

ये बूढ़ा नन्द उसकी याद में अब मृत-सा हो गया है…

क्या उसे इस बूढ़े पिता की याद आती है ?

ये कहते हुए… हिलकियों से रो पड़े थे नन्द महाराज !

यशोदा ने जल लाकर दिया… महाराज नन्द को ।

हृदय में विरह का दावानल धधक रहा है… नन्द महाराज के ।

इससे ज्यादा कुछ और बोलने की हिम्मत भी नही है नन्द बाबा की ।

उद्धव अब बोलना चाह रहे हैं… पर बोलें क्या ?

पर बोलना तो पड़ेगा ना ! सांत्वना तो देनी पड़ेगी ना ?

शेष चर्चा… कल…

प्रेम मगन जे साधू जन, तिन गति कही न जात
रोय-रोय गावत हँसत, दया अटपटी बात ।

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