!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 74 !!
श्रीराधा द्वारा “प्रेम सिद्धान्त” का निरूपण
भाग 2
..ओह ! ये हैं मेरे प्राण सखा की प्रिया ! उद्धव दर्शन करके आनन्दित हो गए थे ।
वाणी कितनी मधुर थी……पर इनकी वाणी से भी जो निसृत हो रहा था…..वो तो प्रेम के गूढ़ सिद्धान्त थे…..मैं धन्य हो गया था जो श्रीराधा रानी नें ललिता सखी को सुनाया – समझाया था, उसे सुनकर ।
सखी ! तुम ऐसी मूर्खता पूर्ण बातें क्यों कर रही हो ।
तुम्हे क्या लगा तुम्हारी बातें सुनकर मुझे प्रसन्नता होगी ?
अरे ! प्रेम को तुम अभी समझी नही……..प्रियतम की निन्दा करके तुम मुझे सुख पहुंचानें चली थीं……..नही सखी ! मेरे हृदय को चोट न पहुँचाओ……..वे मेरे जीवन धन है ……वे जहाँ भी रहें सुखी रहें ……प्रसन्न रहें …..।
उद्धव सुन रहे हैं – कितनें प्रेम से समझा रही थीं श्रीराधा रानी ।
मुझे अगर सच में तुम प्रेम करती हो…….तो मेरे प्रियतम के गुण का गान करो……उनकी कुशलता बताओ……वो सुखी हैं ये बताओ……वे मुझ से दूर रहें या निकट….पर वास्तविकता ये है सखी ! कि एक पल के लिए भी वे मुझ से दूर नही हैं…सखी ! वे मेरे हृदय में ही सदा रहते हैं ।
और हाँ एक बात और बता दूँ …….मैं रोती हूँ , बिलखती हूँ……पर हृदय में मेरे तनिक भी दुःख और सन्ताप नही है ………क्यों की सखी हृदय में ही तो वे बैठे हैं ना ! अगर हृदय में ताप होगा …..तो उन्हें कष्ट होगा ना ! सखी ! मैं बाहर से ही रोती हूँ ……हृदय मेरा शीतल है …….मैने हृदय को शीतल बनाकर रखा है……..उनको कहीं ताप न लगे इसलिये ।
उद्धव की आँखें खुली की खुली रह गयीं……..ऐसा विलक्षण प्रेम !
सखी ! प्रेम स्वयं के सुख का नाम नही है …………….श्रीराधा रानी फिर समझानें लगीं थीं ………….
वो सुखी हैं ना ? सखी ! अगर वे सुखी हैं ………तो हम क्यों दुःखी हों ……..उनके सुख में सुखी रहना ही तो प्रेम है ना !
क्रमशः …
शेष चरित्र कल –
