!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 76 !!
आओ, प्रेम की सृष्टि में प्रवेश करें
भाग 2
प्रेम में हृदय कोमल हो जाता है……..क्यों की प्रेम अपनें आपमें ही कोमल है ……..और फिर उस कोमलता में प्रियतम की आकृति छपनें लग जाती है……..फिर प्रेम प्रगाढ़ होता चला जाता है ।
वज्रनाभ ! हृदय का पिघलना आवश्यक है…….पाप के कारण ही हृदय कठोर होता है……..इसलिये कोमल बनानें का प्रयास करो हृदय को……..अच्छा ! अपनें हृदय में आँखें बन्दकर के देखो …….तुम्हारा प्रियतम है वहाँ ?
आज महर्षि प्रेम जगत की कुछ रहस्यमयी बातें बता रहे थे ।
हे वज्रनाभ ! प्रेम के क्रमबद्ध स्वरूप का दर्शन करो …………
पहले है प्रेम, फिर उसके बाद है प्रणय , प्रणय के बाद है स्नेह, फिर मान, मान के बाद राग-अनुराग , फिर भाव, फिर महाभाव, और महाभाव के बाद आता है दिव्योन्माद…….हे यदुवीर वज्रनाभ ! प्रेम का अंतिम रूप है ………दिव्य उन्माद ।
ये ऊँची स्थिति है ………प्रेम में इससे ऊँची कोई स्थिती नही ।
इस स्थिति में प्रेमी को ऐसा लगनें लगता है कि ……मेरे प्रियतम ही सर्वत्र हैं …… आकाश में मेरा प्यारा है ……चन्द्रमा में मेरा प्रिय है …..इन फूलों में वही मुस्कुरा रहा है……फूलों में भँवरे के रूप में मेरा प्रिय ही है…….जल , थल , नभ सर्वत्र उसे अपना प्रियतम ही दिखाई देता है ……इतना ही नही ……..वो प्रेमी बादलों से ……पक्षियों से ……चन्द्रमा से…..बातें करनें लगता है……रूठता भी है फिर स्वयं मनाता भी है…….इसी का नाम है “दिव्योन्माद” , महर्षि बोले ।
क्रमशः …
शेष चरित्र कल –
